Khabron Ke Khiladi: क्या NDA में वाकई सब कुछ ठीक नहीं है, महाराष्ट्र-बिहार में क्या चल रहा है? जानें इसके पहलू
इस महीने की शुरुआत में लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित किए गए थे। भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में नाकाम रही, लेकिन उसके नेतृत्व वाले गठबंधन राजग ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। विपक्ष का आरोप है कि यह गठबंधन पांच साल नहीं टिक पाएगा। जानिए समीकरण क्या कहते हैं...
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विस्तार
नौ जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पूरे मंत्रिपरिषद ने शपथ ली। इस बीच, एनडीए के कुछ घटक दलों के बीच तनाव देखने को मिल रहा है। महाराष्ट्र और बिहार में आवाज उठ रही हैं कि शायद एनडीए लंबा सफर तय नहीं कर पाएगा? क्या है इस पूरे मामले के पीछे की कहानी? इन दावों में कितनी सच्चाई है? खबरों के खिलाड़ी में इस बार इसी विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, अवधेश कुमार, विनोद अग्निहोत्री, अनुराग वर्मा, समीर चौगांवकर और पूर्णिमा त्रिपाठी ने हिस्सा लिया। पढ़िए चर्चा के कुछ अहम अंश.....
समीर चौगांवकर
1984 के बाद किसी की पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनी थी। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहुमत मिला। भले ही भाजपा पिछले 10 साल कहती रही कि यह एनडीए की सरकार है, लेकिन पार्टी के पास बहुमत था। अब 2024 का जो परिणाम सामने आया है उससे सही मायने में कहा जा सकता है कि यह एनडीए की सरकार है। पीएम मोदी ने खुद माना है कि यह एनडीए की सरकार है।
अब जनता में उत्सुकता बनी हुई है कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार क्या करेंगे? महाराष्ट्र में अजित पवार क्या करेंगे? उद्धव ठाकरे से बातचीत की खबर आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नतीजे 90 दिन बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर कोई असर डालेंगे। कह सकते हैं कि अगर लोकसभा चुनाव के नतीजे असर डालते हैं तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता है। उद्धव से बातचीत की खबर आ रही है, तो लगता है यह सब ऐसे ही चलता रहेगा।
अगर नीतीश कुमार की बात करें कि वे चंद्रबाबू नायडू के शपथ ग्रहण समारोह में नहीं पहुंचे। सवाल उठा कि क्या वे नाराज हैं? तो ऐसा कुछ नहीं है। मुझे नहीं लगता कि कोई नाराजगी है। उनकी तबीयत सही नहीं रहती है। वहीं, चंद्रबाबू भी पीएम का साथ नहीं छोड़ेंगे। उनके कई प्रोजेक्ट हैं, जिन पर उन्हें काम करना है। वह केंद्र की सरकार में परेशानी नहीं पैदा करेंगे। अगर वह ऐसा करेंगे तो उनके लिए चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। भाजपा का प्रदर्शन पिछले बार की तरह नहीं रहा, पर सरकार नहीं गिरने वाली। यह ऐसे ही चलती रहेगी।
अवधेश कुमार
पहले की गठबंधन सरकारों के अनुभवों से तुलना करें तो पहले देखा जाता था कि साथी दलों का जो नेता नेतृत्व करता था, उस पर दबाव होता था। सबसे बड़ा दबाव तो मंत्री बनाने को लेकर होता था, लेकिन बीते 10 वर्षों में देश का मानस, आंतरिक प्रशासनिक संरचना का मानस, सत्ता से जुड़े या बाहर रहे लोगों का भी मानस बदला है। सभी समझ गए हैं कि देश एक दिशा में देश कैसे चलता है? हालांकि, पिछले दो बार की तुलना में इस बार विपक्ष मजबूत है। उसका अपना एजेंडा है कि छोटी बात को भी बढ़ाते रहो। जैसे- देखो-देखो नीतीश कुमार नाराज हो गए, यह शिंदे ने क्या बोल दिया.. अब तो सरकार गई।
मूल बात यह है कि नई सरकार से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक कोई ऐसा संकेत मिला है कि कोई सरकार से असंतुष्ट है। मंत्रिमंडल में अधिकतर वहीं चेहरे हैं, जो पहले थे। एनडीए के घटक दलों ने कोई विरोध नहीं किया। सभी मंत्री अपना अपना काम कर रहे हैं। राज्यमंत्रियों को पीएम मोदी के विजन पर भरोसा है। उन्हें उम्मीद है कि उनके राज्यों में भी अच्छा काम होगा। हां, यह बात अलग है कि साथी दल अपनी मांग रख सकते हैं, लेकिन फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है।
रामकृपाल सिंह
मेरा एक सवाल है कि भाजपा अगर हारी है तो जीता कौन है। अगर सब हारे हैं तो उसमें सबसे ज्यादा जिसने अंक पाए हैं, उन्हें तो जीता मानोगे न? पिछले दो बार के चुनावों में भी भाजपा के सामने कम चुनौतियां नहीं थीं। जो भी पार्टी आज की तारीख में राजनीति में है, उसके पास दूसरों के बारे में सोचने का समय नहीं है। कांग्रेस का अगर रिकॉर्ड देखा जाए तो वो दो अंकों से ऊपर कभी नहीं गई है। 2009 अपवाद है। पिछले 36 सालों यानी 1992 से आज जितनी भाजपा की सीटें हैं, उतनी कांग्रेस को कभी नहीं आईं। एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए यही चुनौती है कि वह तीन अंक पर नहीं जा पा रही।
जदयू के सामने अस्तित्व की लड़ाई है। अगर वो एनडीए गठबंधन का साथ छोड़ेंगे तो ज्यादा समय तक नहीं रह पाएंगे। अगर आज विपक्ष में कोई अच्छा विकल्प होता तो मोदी पीएम नहीं बन पाते। विपक्ष मजबूत नहीं है इसलिए आज मोदी प्रधानमंत्री के पद पर हैं। नौ जून को दो चीजें देखने को मिलीं। पहली- शपथ समारोह और दूसरा- भारत-पाकिस्तान का मैच। पाकिस्तान ने 19 ओवर में भारत की टीम को ऑल आउट कर दिया था, लेकिन अंत में भारत ने छह रन से मैच जीत लिया। पूरे देश में कोई नहीं कह रहा कि टीम का प्रदर्शन खराब था। सब वाहवाही कर रहे हैं।
वहीं, इंडी गठबंधन की कुल सीटों और भाजपा में छह सीट का अंतर है, लेकिन सब कह रहे हैं कि मोदी हार गए। भाजपा ने ब्लंडर किया था दो चीजें करके। आरक्षण और संविधान को लेकर उठाए गए मुद्दे से भाजपा को नुकसान पहुंचा है। विपक्ष जब यह सब बातें उड़ा रहा था तो भाजपा को इसे खत्म करने के लिए काम करना चाहिए था। आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर यही कहूंगा कि उनके बयान को पूरा सुनना चाहिए। वो अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर रहे थे।
पूर्णिमा त्रिपाठी
सरकार चलेगी तो कुछ समस्याएं तो आएंगी, लेकिन यह कोई बड़ी परेशानी नहीं है। चंद्रबाबू नायडू की तरफ से कोई खतरा नहीं है। उन्हें अपनी परियोजनाएं पूरी करनी हैं तो वो केंद्र से लड़ाई नहीं करेंगे। हालांकि, नीतीश कुमार पर सवाल खड़ा हो सकता है, मगर उनके जाने से कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा। यह सबको ही पता है। इसलिए सरकार के गिरने का कोई खतरा नहीं है। रही बात पार्टी के अंदर की तो आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत और संघ के नेता इंद्रेश कुमार सवाल उठा रहे हैं तो चर्चा होगी, पर इसका कुछ बहुत असर नहीं पड़ेगा। बिना नाम लिए जो संघ के प्रमुख ने कहा है वो साफ है कि सेवकों को नहीं, बल्कि पीएम मोदी को संकेत दिया जा रहा था। हां, हो सकता है कि इस टिप्पणी से मोदी को मार्गदर्शन को मिले। वो शायद बदलने की कोशिश करें। हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा निकलेगा।
अनुराग वर्मा
आज से तीन महीने पहले संविधान बदलने की अफवाह फैलाई जा रही थी। अब कहा जा रहा है कि सरकार नहीं चल पाएगी। यह विपक्ष का नरेटिव है, जो चलाया जा रहा है। सत्ता पक्ष से किसी भी तरह का ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा है कि सरकार नहीं चलेगी या गिरने वाली है। गठबंधन की राजनीति पहले से ज्यादा परिवक्व हो गई है। 2024 की राजनीति की तुलना 1996 से नहीं की जा सकती। आज की और उस समय की राजनीति में काफी अंतर है। भाजपा ऐसी पार्टी है, जिसे बहुमत में आने के लिए बहुत कम सीटें चाहिए। इसलिए घटक दल पहले की तरह कोई हरकत नहीं कर पाएंगे। जैसे- टीडीपी ने जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मांगे रखी थीं, वो अब संभव नहीं है। जेडीयू और टीडीपी में अब बदलाव आ गया है। उन्हें पता है कि भाजपा के साथ रहकर क्या फायदा है। कहा जा रहा है कि मोदी काम नहीं कर पाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं है। पीएम ने बहुत बड़े-बड़े फैसले लिए हैं, तो अब भी उनका व्यक्तित्व नहीं बदलेगा। वो ऐसे ही फैसले लेते रहेंगे।
विनोद अग्निहोत्री
चुनौतियां दोनों खेमे में हैं। पीएम मोदी के सामने गठबंधन की सरकार चलाने की और राहुल-खरगे के सामने विपक्षी एकता को बनाए रखने की। महाराष्ट्र में महायुति बनी रहे यह भी चुनौती है। दूसरी बात यह है कि पीएम मोदी ने खुद माना कि एनडीए सरकार है। चंद्रबाबू नायडू और नीतीश अलग हो जाएंगे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। चिराग पासवान, अजित पवार, शिंदे एनडीए को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। हालांकि, कमजोर होना भी सही होता है। भाजपा ने इस बार 240 सीटें जीती हैं, जो उसे थोड़ा कमजोर करने के लिए काफी है। वहीं, आरएसएस प्रमुख के बयान की बात करें तो हो सकता है कि कार्यकर्ताओं के लिए कह रहे हैं। हालांकि, पहले की तरह कम प्रचार ही दिखा। अगर संघ के कार्यकर्ताओं ने प्रचार किया और फिर भी कम वोट आए तो सोचने वाली बात है। संघ भाजपा के खिलाफ कभी नहीं खड़ा होगा।