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Khabaron Ke Khiladi: ईरान-इस्राइल संघर्ष से लेकर जी-7 तक, खबरों के खिलाड़ी बता रहे भारत की कूटनीति कितनी कारगर

Sat, 21 Jun 2025 05:02 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 21 Jun 2025 05:02 PM IST
सार

इस्राइल-ईरान संघर्ष के बीच दुनिया के मौजूदा हालात का भारत पर कैसा असर पड़ सकता है। इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई।

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Khabaron Ke Khiladi Israel Iran Conflict G7 US Role India Diplomacy PM Modi analysis news
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ईरान और इस्राइल के बीच चल रहे संघर्ष को हफ्तेभर से ज्यादा हो चुका है। दोनों देश एक-दूसरे पर जबरदस्त हमले कर रहे हैं। इसका असर कनाडा में हुई जी-7 की बैठक में भी दिखा। दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड बीच में ही बैठक छोड़कर अमेरिका लौट गए। जी-7 की बैठक में भारत ने जिस तरह से अपना पक्ष रखा उसकी भी चर्चा हो रही है। दुनिया के मौजूदा हालात और उसका भारत पर कैसा असर पड़ सकता है। इसी पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकर, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी और अवधेश कुमार मौजूद रहे। 
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रामकृपाल सिंह: जी-7 की बैठक से पहले बहुत सी बातें हो रही थीं, भारत को बुलाया जाएगा या नहीं बुलाया जाएगा। इस सबके बीच भारत को बुलाया गया। प्रधानमंत्री मोदी वहां गए। भारत ने जी-7 में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की डोनाल्ड ट्रंप से पहलगाम हमले के बाद बात हुई थी। इसके बाद आपसे मेरी अब बात हो रही है। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान से संघर्ष के दौरान ट्रंप से पीएम मोदी की कोई बात नहीं हुई। कुल-मिलाकर के यह कहा जा सकता है कि आदमी ज्यादा बोलने से तकलीफ उठाता है। जिस तरह का माहौल हो रहा है। जी-7 ने माना कि दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 

अवधेश कुमार: ईरान-इराक युद्ध जब हुआ था तब कोई परिणाम नहीं आया था। इस बार जो युद्ध हो रहा है उसका परिणाम जरूर आएगा। इस्राइल वही कर रहा है जो करना चाहिए। युद्ध की रणनीति देख लीजिए। इस्राइल का निशाना ईरान के डिफेंस सेंटर हैं। वो उन्हें खत्म करने की कोशिश कर रहा है। ईरान के ज्यादातर हमले नागरिक क्षेत्रों में हो रहे हैं। ईरान के सेना और सुरक्षा से जुड़े 14 अहम लोग मारे जा चुके हैं।  
 
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पूर्णिमा त्रिपाठी: जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान आया है, उससे यह बात साफ हो गई है कि भारत ने किसी के दबाव में संघर्षविराम का फैसला नहीं किया। यह कदम देर आए दुरुस्त आए वाला कदम है। भारत ने खुलकर किसी भी ब्लॉक के साथ खुद को खड़ा नहीं किया है। प्रधानमंत्री का ट्रंप का न्योता ठुकराना और उसके बारे में बताना भी बड़ा कदम रहा है। ईरान का खुलकर भारत ने भले साथ नहीं दिया, ईरान में फंसे भारतीयों के लिए उसने अपना एयरस्पेस खोल दिया। इससे पता चलता है कि भारत की बैक चैनल डिप्लोमेसी बेहतर काम कर रही है। 

विनोद अग्निहोत्री: इस्राइल के साथ हमारा झुकाव नरसिम्हा राव सरकार के दौर से स्पष्ट रूप से सामने आया। उसके बाद अटल सरकार में आगे बढ़ी। अब मोदी सरकार में ये झुकाव साफ दिखता है। यह सही है कि इस्राइल और ईरान दोनों भारत के लिए अहम हैं। पहले ईरान प्रो-पाकिस्तान था। ईरान की क्रांति के बाद ईरान ने बैलेंसिंग एक्ट किया। इस्राइल और ईरान दोनों हमारे लिए जरूरी हैं। बैक चैनल डिप्लोमेसी काम कर रही है। इसका श्रेय मैं प्रधानमंत्री मोदी को दूंगा। जिसकी वजह से हम दोनों देशों के साथ रिश्तों को बैलेंस कर पा रहे हैं। रूस, चीन के साथ जा रहा है। रूस, पाकिस्तान से सौदा कर रहा है, ये हमारे लिए चिंता का विषय है। ये भारतीय कूटनीति के सामने बड़ी चुनौती है। 

समीर चौगांवकर: मुझे नहीं लगता है कि रूस के साथ हमारा कोई मनमुटाव हो गया है या कोई दूरी आई है। भारत अपने स्टैंड पर क्लियर रहा है। रूस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगने के बाद भी भारत उसके साथ व्यापार कर रहा है। अमेरिका के साथ खास तौर पर ट्रंप के व्यवहार ने रिश्तों को जरूर पेचीदा बना दिया है। जी-7 की बात करेंगे तो यह कोई विश्वसनीय मंच अब नहीं रहा है। रूस जब इसमें था तो जी-8 था। उसके हटने के बाद यह जी-7 हो गया है। उसी के सदस्य आपस में टकरा रहे हैं। हालांकि, काफी बड़े देश इसके साथ हैं।
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