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खबरों के खिलाड़ी: चुनावी बॉन्ड पर रोक के बाद अब कैसे चंदा जुटाएंगी पार्टियां, आखिर क्यों बनी थी यह व्यवस्था?
Sat, 17 Feb 2024 04:59 PM IST
गुलाम अहमद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गुलाम अहमद
Updated Sat, 17 Feb 2024 04:59 PM IST
सार
लोकसभा चुनाव से ऐन पहले चुनावी चंदे की व्यवस्था चुनावी बॉन्ड को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बता दिया है। आखिर यह व्यवस्था क्यों बनी? अब जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो पहले क्यों नहीं उठे? चुनावी साल में इसका क्या असर होगा? इन सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई।
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Khabaron ke Khiladi
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इस हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले का असर राजनीतिक पार्टियों पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड पर रोक लागने का आदेश दे दिया। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले चुनावी चंदे की इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बता दिया है। आखिर यह व्यवस्था क्यों बनी? अब जो सवाल खड़े हो रहे हैं वो पहले क्यों नहीं उठे? चुनावी साल में इसका क्या असर होगा? इन सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, प्रेम कुमार, राकेश शुक्ला मौजूद रहे।
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क्या इस मामले में सभी राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं?
प्रेम कुमार: अगर राजनीतिक दलों ने इलेक्टोरल बॉन्ड से चंदा लिया है तो सब बराबर के भागीदार हैं। भले किसी को कम चंदा मिला हो या किसी को ज्यादा चंदा मिला हो। अगर आप इसके खिलाफ थे तो आपने इस तरीके से चंदा लेने से मना कर दिया होता, लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया। इसलिए मैं इसमें सभी पार्टियों को भागीदार मानता हूं। बीते पांच-छह साल में इलेक्टोरल बॉन्ड के कारण कुछ पार्टियों को नुकसान हुआ तो कुछ को काफी फायदा हुआ। वो सत्ताधारी दल, जिनके पास कुछ देने की ताकत होती है, उन्हें इसका फायदा ज्यादा हुआ।
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अवधेश कुमार: यह कहना कि केवल भाजपा को इससे चंदा मिला है, यह सही नहीं है। एक-एक राज्य की पार्टियों को भी काफी चंदा मिला है। हमारे देश में चुनाव का खर्च धीरे-धीरे बढ़ता गया है। चुनाव आयोग ने भी खर्च की सीमा बढ़ाते-बढ़ाते चालीस लाख कर दी है। आज की तारीख में आम आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता है।
जो कॉर्पोरेट हैं, जो कंपनियां हैं, वो नहीं चाहती हैं कि उनका नाम प्रकट हो। उन्हें लगता है कि अगर यह सामने आ गया है कि हमने कांग्रेस को ज्यादा चंदा दिया, भाजपा को कम और भाजपा सत्ता में आ गई तो मुझे इसका नुकसान होगा। लंबे समय से चुनावी चंदे पर चर्चा होती है। यह एक व्यावहारिक समस्या है। संवैधानिक तरीका चंदे का क्या होगा, यह बताना भी आवश्यक हो जाता है। आगे चुनाव लड़ने के लिए पार्टियां किस तरह चंदा लेंगी यह बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है।
रामकृपाल सिंह: हम एक बदलते-विकसित होते समाज में हैं। कभी भी कोई भी चीज सौ फीसदी सही नहीं हो सकती है। जब इलेक्टोरल बॉन्ड नहीं थे, तब क्या होता था? सारा काला धन आता था। जब तकनीक उन्नत हो रही है, तब कालेधन पर अंकुश लगाया जा सकता है। जो गोपनीयता की बात है, यह सिर्फ इलेक्टोरल बॉन्ड के लिए नहीं है। बैंको की गोपनीयता की बात भी है। बैंकों के ग्राहकों की गोपनीयता की भी बात है। सभी जानते हैं कि कोई भी जितना चुनावी खर्च दिखाता है, वह उससे काफी ज्यादा है। मान लिया कि 100 डिग्री पर भाप नहीं बन रही तो पानी को गर्म करते तो रहिए।
राकेश शुक्ला: सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, वह अपनी सुविधा के मुताबिक उसे लागू करने पर सहमत या असहमत होता है। इसमें सभी राजनीतिक दल सहमत थे कि हमें मिलने वाले चंदे की जानकारी बाहर नहीं जानी चाहिए। सुधार एक सतत प्रक्रिया है। पहले नकदीकरण था, फिर इलेक्टोरल बॉन्ड आया। अब आगे भी कोई न कोई बेहतर रास्ता आएगा।
विनोद अग्निहोत्री: यह बात सही है कि चुनाव सुधारों को लेकर बड़ी मांग है। हमेशा सत्ताधारी दल के पास एक बढ़त होती है। गोपनीयता की जहां तक बात है तो जैसे ही कोई ट्रांजेक्शन होता है, वह सरकार की नजर में आ जाता है। अगर कोई उद्योगपति यह सोचे कि उसने फलां पार्टी को ज्यादा चंदा दिया और फलां को कम और वह सरकार को पता नहीं चलेगा तो वह गलतफहमी में होगा। जैसे ही चंदा आपने दिया वह सरकार की नजर में आ जाएगा।
जनता की जहां तक बात है तो अगर वह जानना चाहे तो वह जानकारी उसके पास उपलब्ध हो। सुप्रीम कोर्ट कानून की व्याख्या करते हुए किसी चीज को यह बता सकता है कि यह संवैधानिक है या असंवैधानिक। व्यवस्था बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। मेरा सुझाव है कि एक कॉर्पस फंड बने। जिसमें हर कोई चंदा दे सकता हो। उसका पार्टी के हिसाब से बंटवारा हो।