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Alert: इन्सान के दिमाग तक पहुंच जाए अमीबा तो जान बचाना मुश्किल, केरल में तीन मामले सामने आए; लड़की की मौत

Wed, 20 Aug 2025 06:21 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Wed, 20 Aug 2025 06:21 AM IST
सार

केरल में कुएं के पानी से नेग्लेरिया फाउलेरी अमीबा के कारण नौ साल की बच्ची की मौत हो गई। यह अमीबा नाक के रास्ते मस्तिष्क में जाकर गंभीर सूजन और ऊतकों को नुकसान पहुंचाता है। पीएएम नामक दुर्लभ बीमारी के लक्षण शुरुआती दौर में सामान्य बुखार-जैसे होते हैं, जिससे पहचान मुश्किल होती है।

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Kerala three cases of amoeba 9-year-old girl dies infection suspected to be from well water News In Hindi
अमीबा - फोटो : istock

विस्तार

सामान्यत: पानी में पाया जाने वाले एक बेहद सूक्ष्म एककोशिकीय जीव अमीबा अगर इंसान के दिमाग तक पहुंच जाए तो जान बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है। नेग्लेरिया फाउलेरी या दिमाग खाने वाले अमीबा से होने वाली इस दुर्लभ बीमारी को प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएंसेफलाइटिस (पीएएम) कहा जाता है। प्रारंभिक अवस्था में सिरदर्द, बुखार, मितली आने जैसे लक्षणों के कारण आमतौर पर इस बीमारी का जल्द पता नहीं लग पाता। केरल में हाल ही में इसके तीन मामले में आए हैं, जिसमें नौ वर्षीय एक लड़की की मौत हो गई। उसे कुएं का पानी पीने के कारण संक्रमण होने की आशंका है। क्योंकि कुएं के पानी की जांच में उसमें अमीबा पाया गया है।
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राज्य के स्वास्थ्य विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मामले कोझिकोड जिले के अलग-अलग गांवों से सामने आए हैं, जिससे इनमें कोई समानता नहीं दिखती। भारत में पीएएम का पहला मामला 1971 में सामने आया था, और केरल में 2016 में पहली बार ये सामने आया। पिछले साल केरल में ऐसे 36 मामले सामने आए और नौ मौतें हुईं।
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नेग्लेरिया फाउलेरी मस्तिष्क के ऊतकों को कर देता है नष्ट
पीएएम का कारण बनने वाला नेग्लेरिया फाउलेरी अमीबा दुनियाभर में गर्म, मीठे पानी और मिट्टी में पाया जाता है। 46 डिग्री सेल्सियस तक का उच्च तापमान इसके विकास के लिए अनुकूल होता है और यह गर्म वातावरण में थोड़े समय के लिए जीवित रह सकता है। नेग्लेरिया फाउलेरी आमतौर पर तैरते समय नाक के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है। फिर मस्तिष्क तक पहुंचता है, और मस्तिष्क ऊतकों को नष्ट करके सूजन बढ़ा देता है।
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दुनिया में 97% लेकिन केरल में 25% है मृत्यु दर
वैश्विक स्तर पर इस बीमारी से होने वाली 97 प्रतिशत मृत्यु दर की तुलना में केरल में यह सिर्फ 25 प्रतिशत है। जुलाई 2024 तक भारत में दर्ज सभी मामलों में मरीज की मृत्यु हुई थी लेकिन कोझिकोड जिले का एक 14 वर्षीय लड़का इस बीमारी से बचने वाला पहला भारतीय बना। वह दुनिया में पीएएम से बचने वाला केवल 11वां इंसान है।


अभी तक खोजा नहीं जा सका कोई पुख्ता इलाज
अभी तक इस बीमारी का कोई प्रभावी उपचार नहीं हैं। डॉक्टर अभी इसका इलाज एम्फोटेरिसिन बी, एजिथ्रोमाइसिन, फ्लुकोनाजोल, रिफैम्पिन, मिल्टेफोसिन व डेक्सामेथासोन जैसी दवाओं से करते हैं। प्रारंभिक अवस्था में सिरदर्द, बुखार, मितली जैसी दिक्कतें होती हैं और बाद में मरीज की की गर्दन में अकड़न होने, दौरे पड़ने या मतिभ्रम की स्थिति आने की संभावना रहती है।

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पांच दिन में गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है मरीज
अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के मुताबिक, पीएएम पीड़ित अधिकांश लोग लक्षण शुरू होने के 1 से 18 दिनों के भीतर मर जाते हैं। आमतौर पर यह पांच दिनों के बाद कोमा और मृत्यु का कारण बनता है। यह संक्रमण इंसानों से इंसानों में नहीं फैलता है।
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