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कथक गुरु बिरजू महाराज बोले : आधुनिक दौर में भी शास्त्रीय नृत्य को आगे ले जाने वालों की कमी नहीं
Thu, 02 Dec 2021 06:24 AM IST
Kuldeep Singh
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Thu, 02 Dec 2021 06:24 AM IST
सार
पद्म विभूषण सम्मान प्राप्त 83 वर्षीय कथक गुरु बिरजू महाराज का कहना है कि फौरन ख्याति और संतुष्टि पाने की चाहत वाले आधुनिक दौर में भारत में ऐसे कई युवा हैं, जो शास्त्रीय नृत्य की परंपरा को आगे ले जा रहे हैं।
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कथक की जानकारी देते पं बिरजू महाराज।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कठोर रियाज और समर्पण के चलते भले ही हर कोई शास्त्रीय नृत्य का रुख न करता हो, पर खुद कथक गुरु बिरजू महाराज इस स्थिति से हताश नहीं हैं। उनका कहना है कि फौरन ख्याति और संतुष्टि पाने की चाहत वाले आधुनिक दौर में भी ऐसे कई युवा हैं, जो शास्त्रीय नृत्य की परंपरा को आगे ले जा रहे हैं।
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अपने शिष्यों द्वारा प्यार से पंडित जी कहे जाने वाले पद्म विभूषण सम्मान प्राप्त 83 वर्षीय बिरजू महाराज के मुताबिक, युवा पीढ़ी के पास हमारी तुलना में सीखने के ज्यादा अवसर हैं। लेकिन यह भी सही है कि उनके सामने व्यवधान भी बढ़ गए हैं।
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आधुनिक दुनिया में फौरन आनंद और ख्याति युवाओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि, जो कलाकार जुनून के साथ परंपरा को आगे ले जाने का काम करते हैं, वे किसी भी कला और उसकी विरासत के सही वाहक हैं। शास्त्रीय नृत्य जैसी मजबूत परंपरा के साथ खड़े रहने के लिए काफी काम और समर्पण की दरकार होती है लेकिन इसका भविष्य उज्ज्वल है। एजेंसी
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मुझे नहीं लगता कि कथक से बेहतर मैं जीवन में कुछ कर सकती हूं : रागिनी
25 वर्षीय रागिनी के मुताबिक, मुझे नहीं लगता कि कथक से बेहतर मैं जीवन में कुछ कर सकती हूं। उनका कहना है, इस कला को सीखने के लिए किसी का संगीत या नृत्य घराने से होना जरूरी नहीं है। मैं ऐसे कई लोगों और मित्रों को जानती हूं, जो किसी घराने से नहीं आते पर वे इस क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि उन्होंने संगीत और नृत्य को गंभीरता से सीखा।
20 वर्षों से सीख रही पोती
महाराज की पोती और कथक नृत्यांगना रागिनी का कहना है, घुंघरू, संगीत और नृत्य की आवाज हमारे परिवार में भाषा की तरह है। इन आवाजों से ही हम आपस में बात कर सकते हैं। घर में इस तरह ही हमारा नृत्य का सफर शुरू होता है। तीन साल की उम्र से ही कथक का प्रशिक्षण शुरू करने वाली रागिनी 20 वर्षों से यह कला सीख रही हैं। परिवार ने इसके लिए उन पर कोई दबाव नहीं बनाया। किशोरावस्था में ही उन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाने की ठान ली थी।