Karnataka: हिंदुत्व की आंधी में इतिहास बनने से बच गए विपक्षी दल, कांग्रेस की जीत से नवीनीकरण की शुरुआत
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विस्तार
देश की राजनीति में करीब एक दशक से 'हिंदुत्व' कार्ड की जबरदस्त आंधी चली है। राजनीति में क्षेत्रीय विषमता और अस्मिता, दोनों को समेटने के लिए भाजपा ने 'हिंदुत्व' का कार्ड खेला। काफी हद तक उसे कामयाबी भी मिल गई। कुछ समय पहले तक यही माना जा रहा था कि भाजपा के सफल होने का एक बड़ा कारण दिशाहीन 'कांग्रेस' पार्टी भी है। जहां भी चुनाव होता, वहीं इस दल के कई गुट नजर आने लगते। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं राजनीतिक विश्लेषक डॉ आनंद कुमार कहते हैं, वोटरों को लगने लगा था कि कांग्रेस पार्टी किसी भी वर्ग के लिए उपयोगी साबित नहीं हो रही। विपक्ष को भी साथ नहीं ले पा रही। इन सबके चलते भाजपा ने तो यह मान लिया था कि 'कांग्रेस मुक्त भारत' मिशन खत्म हो चुका है, अब राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दलों की बारी है। यह सवाल भी उठने लगा कि विपक्षी दलों का नवीनीकरण हो पाएगा या वे इतिहास बन कर जाएंगे। कर्नाटक की जीत ने कम से कम विपक्षी दलों, खासतौर पर कांग्रेस के नवीनीकरण की राह प्रशस्त की है। हालांकि अभी ये शुरुआत भर है।
कई उतार चढ़ावों से गुजरी है कांग्रेस ...
बता दें कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद से ही पार्टी में विरोध के स्वर उठने शुरु हो गए थे। राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, मगर पार्टी में उनकी खिलाफत करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। पार्टी के भीतर जुदा राय रखने वाले नेताओं का 'जी23' समूह बन गया। गुलाम नबी आजाद का इस्तीफा, कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद नेताओं के मनमर्जी वाले बयान सामने आने लगे। ये कहा गया कि आगे भी वरिष्ठ नेता पार्टी से किनारा कर सकते हैं। कई मुद्दों पर पार्टी के सांसद मनीष तिवारी ने अपनी अलग राय रखी। आनंद शर्मा को लेकर भी सहमति और असहमति जैसा कुछ सामने आने लगा।
कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेता 'सपा' की मेहरबानी से राज्यसभा में चले गए। एक बार ये कहा जाने लगा कि कांग्रेस, भटकाव की स्थिति में है। भारत जोड़ो यात्रा से पहले पार्टी में खूब उथल पुथल हुई। ये भी कहा गया कि सोनिया गांधी, दोराहे पर हैं। वे पार्टी को खुश रखने के साथ-साथ राहुल की ढाल बनी हुई हैं। वे किसी भी हाल में 'राहुल' को कमजोर नहीं होने देना चाहती।
विपक्ष को और ज्यादा करीब से समझना शुरु कर दिया ...
दूसरी तरफ 'हिंदुत्व' कार्ड को लेकर आंधी की तरह चारों दिशाओं में आगे बढ़ रही भाजपा ने अब नया मिशन हाथ में ले लिया था। प्रो. आनंद ने कहा कि भाजपा यह मान चुकी थी कि उसका 'कांग्रेस मुक्त भारत' मिशन खत्म हो चुका है। अब उसका निशाना, राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दलों को जमीन पर लाना है। देश की एक बड़ी पार्टी 'कांग्रेस' का इस तरह से ढहना, राजनीतिक पतन की निशानी थी। किसी को नहीं मालूम था कि विपक्षी दलों का नवीनीकरण हो पाएगा या नहीं। क्या विपक्षी दल इतिहास बन जाएंगे। राजनीति में क्षेत्रीय विषमता और अस्मिता, दोनों को समेटने के लिए भाजपा ने 'हिंदुत्व' का कार्ड खेला। उसे कामयाबी मिलती चली गई। इस बीच राहुल गांधी ने जब 'भारत जोड़ो यात्रा' शुरु की तो न केवल कांग्रेस, बल्कि विपक्ष को भी संजीवनी का अहसास हुआ। राहुल ने कह दिया, समान विचारधारा वाले दल एक साथ चलेंगे। मानहानि मामले में सांसदी गई तो राहुल ने विपक्ष को और ज्यादा करीब से समझना शुरु कर दिया। प्रियंका गांधी ने भी पार्टी में अपनी सक्रियता बढ़ाई। गैर गांधी मल्लिकार्जुन खरगे को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया।
भाजपा के 'हिंदुत्व' को करारा जवाब ...
कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस ने एकजुटता का परिचय दिया। लंबे समय बाद कर्नाटक में भाजपा के 'हिंदुत्व' को करारा जवाब दिया गया। अगर खरगे ने जहरीले सांप वाला बयान दिया तो पार्टी ने पीएम मोदी द्वारा अतीत में दिए गए बयानों की लिस्ट निकाल ली। खरगे ने खुद को कर्नाटक पुत्र कह कर वोट मांगे। पीएम मोदी ने गालियों वाला बयान दिया तो प्रियंका गांधी ने उसकी काट निकालने में देर नहीं लगाई। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी अपनी राह से नहीं भटकी। अगर पार्टी को अपनी विचारधारा से भटक कर वोटों का लालच होता तो वह अपने घोषणा पत्र में 'बजरंग दल' पर प्रतिबंध लगाने की बात न कहती। कांग्रेस को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई के मुताबिक, कांग्रेस ने इस बार एकजुटता और अनुशासन का परिचय दिया है। कर्नाटक में बिल्कुल सधे हुए अंदाज में चुनाव प्रचार को आगे बढ़ाया। पार्टी ने भाजपा को न तो हिमाचल प्रदेश में और न ही कर्नाटक में 'राहुल बनाम मोदी' करने का अवसर दिया। पार्टी ने स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ा। बजरंग दल के मामले में जब भाजपा ने बजरंग बली जी को शामिल किया तो पार्टी ने उसका करारा जवाब दिया। कांग्रेस ने 40 प्रतिशत वाली सरकार, बेरोजगारी और दूसरे मुद्दों से ध्यान नहीं भटकने दिया। कांग्रेस नेता, कर्नाटक के लोगों को बराबर पांच गारंटियों की याद दिलाते रहे।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है ...
हालांकि 2024 तक पार्टी के लिए चुनौतियां भी कई हैं। राजस्थान का संकट पार्टी के सामने है। सचिन पायलट अलग राह पर चलने की सोच रहे हैं। संभव है कि अब कांग्रेस पार्टी, दो नहीं, किसी एक राह पर चलना पसंद करेगी। बहुत जल्द इस बारे में पार्टी कोई बड़ा निर्णय ले सकती है। अब ये भी स्पष्ट हो गया है कि राम मंदिर, जम्मू कश्मीर और बजरंग बली जैसे मुद्दे, पार्टी को सदैव कामयाबी नहीं दिला पाएंगे। महंगाई, बेरोजगारी व सांप्रदायिकता जैसे सवालों का जवाब, उक्त तीन मुद्दों के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। 'भारत जोड़ो यात्रा' से राहुल का कद, पार्टी के भीतर और बहार, बढ़ा है। अब कांग्रेस पार्टी, पहले के मुकाबले कहीं बेहतर तरीके से लोगों की भाषा समझ रही है। आने वाले समय में विपक्ष को साथ लेकर चलना, कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कर्नाटक में जीत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मुल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, ये आपके मुद्दों की जीत है। ये देश को जोड़ने वाली राजनीति की जीत है। प्रियंका गांधी ने भी अपने ट्वीट में लिखा, कांग्रेस पार्टी पूरी लगन के साथ कर्नाटका की जनता को दी गई गारंटियों को लागू करने का काम करेगी।