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क्यों घिरी आर्ट ऑफ लिविंग संस्था: रविशंकर के आश्रम ने की सरकारी जमीन पर कब्जा, 290 एकड़ का पूरा सच क्या?
Wed, 22 Jul 2026 01:42 AM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, बंगलूरू।
पीटीआई, बंगलूरू।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 22 Jul 2026 01:42 AM IST
सार
कर्नाटक सरकार ने बंगलूरू के कागलीपुरा में 'द आर्ट ऑफ लिविंग' पर लगे 290 एकड़ से अधिक सरकारी जमीन और जल निकायों पर अवैध कब्जे की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया है। जहां एक तरफ सरकारी सर्वे में लीज खत्म होने और अवैध निर्माण की बात कही गई है, वहीं दूसरी तरफ संस्था ने इसे झूठा बताते हुए जबरन वसूली और साजिश का आरोप लगाया है।
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श्री श्री रविशंकर
- फोटो : @ANI/ अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कर्नाटक सरकार ने एक बहुत बड़ा और सख्त कदम उठाया है। सरकार ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की संस्था 'द आर्ट ऑफ लिविंग' के खिलाफ जांच बैठा दी है। संस्था और उससे जुड़ी कंपनियों पर सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे के गंभीर आरोप लगे हैं।
मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए सरकार ने एक विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन कर दिया है। एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपने का कड़ा निर्देश दिया गया है। दूसरी तरफ, आर्ट ऑफ लिविंग ने इस जांच का स्वागत किया है और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
क्या है सरकारी जमीन पर कब्जे का यह पूरा विवाद?
यह पूरा मामला बंगलूरू दक्षिण तालुक के कागलीपुरा गांव और उसके आसपास की जमीनों से जुड़ा हुआ है। राजस्व विभाग ने 17 जुलाई को कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम 1964 और कर्नाटक भूमि कब्जा निषेध अधिनियम 2011 के तहत जांच का आदेश जारी किया। अक्टूबर 2025 में कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देश पर भूमि अभिलेख सहायक निदेशक (एडीएलआर) की ओर से एक सर्वे कराया गया था। इस सर्वे की शुरुआती रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए।
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290 एकड़ से अधिक कब्जा: सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, आर्ट ऑफ लिविंग के ट्रस्टियों और कुछ अन्य लोगों ने मिलकर 290 एकड़ से अधिक सरकारी गोमाला (चरवाहों की) जमीन पर सीधा या अप्रत्यक्ष कब्जा कर रखा है।
लीज का नियम टूटा: साल 1985 में कागलीपुरा के सर्वे नंबर 46 की 41 एकड़ सरकारी जमीन संस्था को 40 साल के लिए लीज पर दी गई थी। इसका सालाना किराया मात्र 500 रुपये प्रति एकड़ था।
समय सीमा खत्म: यह लीज अवधि साल 2015 में ही समाप्त हो चुकी है। लीज का नवीनीकरण नहीं कराया गया, फिर भी जमीन पर कब्जा लगातार बरकरार है।
शर्तों का उल्लंघन: जिस मकसद और काम के लिए जमीन आवंटित की गई थी, वहां उसका इस्तेमाल उस काम के लिए नहीं किया जा रहा है।
एसआईटी जांच में किन बातों का रखा जाएगा ध्यान?
सरकार द्वारा गठित एसआईटी को इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं:
रिकॉर्ड्स की जांच: सरकारी और संस्थागत दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जाएगी।
फर्जी कागजात की पहचान: जमीन आवंटन की असली प्रतियों की जांच होगी ताकि जाली या फर्जी दस्तावेजों को पकड़ा जा सके।
जल निकायों का सर्वे: उपग्रह तस्वीरों यानी सैटेलाइट इमेज के जरिए पर्यावरण नुकसान, सरकारी झीलों और सार्वजनिक जमीनों का आकलन होगा।
अदालती मुकदमों की समीक्षा: अदालत में लंबित पड़े सभी पुराने मुकदमों की जांच की जाएगी।
समन जारी करना: संबंधित उत्तरदाताओं को पूछताछ के लिए समन भेजा जाएगा।
राजनहरों पर निर्माण: कागलीपुरा के सर्वे नंबर 160, 164/1, 164/2, 150 और 137 में सरकारी जमीन, तालाबों और राजकैलुवे (बारिश के पानी के नालों) पर अवैध निर्माण की जांच होगी।
फर्जी गांव का पता: कागजात में 'उदयापुरा' नाम का पता दिया गया है, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में इस नाम का कोई गांव ही मौजूद नहीं है।
यह भी पढ़ें: Congress Protest: दिल्ली पुलिस को CRPF की जेड प्लस सुरक्षा से क्यों जूझना पड़ा? राहुल की हिरासत पर कैसा संघर्ष
आर्ट ऑफ लिविंग ने क्या कहा?
द आर्ट ऑफ लिविंग ने सरकार के इस फैसले पर बेहद सकारात्मक रुख दिखाया है। संस्था का कहना है कि वे इस जांच से बिल्कुल भी डरते नहीं हैं। निष्पक्ष जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा।
द आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से कहा गया कि हमारे ऊपर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद हैं। कब्जे का सवाल ही पैदा नहीं होता। चार-पांच महीने पहले हुए सरकारी सर्वे में यह साबित हो चुका है कि सरकार द्वारा दी गई 60 एकड़ जमीन में से केवल 36 एकड़ ही हमारे पास है। बाकी 24 एकड़ जमीन तो सरकार ने आज तक हमें सौंपी ही नहीं है।
संस्था ने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ साजिश के तहत दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया जा रहा है। एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) अपने फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं, जिन पर खुद कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। संस्था के पास रंगदारी और ब्लैकमेलिंग की कॉल रिकॉर्डिंग भी मौजूद है, जिसे वे जांच टीम को सौंपेंगे।
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मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए सरकार ने एक विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन कर दिया है। एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपने का कड़ा निर्देश दिया गया है। दूसरी तरफ, आर्ट ऑफ लिविंग ने इस जांच का स्वागत किया है और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
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क्या है सरकारी जमीन पर कब्जे का यह पूरा विवाद?
यह पूरा मामला बंगलूरू दक्षिण तालुक के कागलीपुरा गांव और उसके आसपास की जमीनों से जुड़ा हुआ है। राजस्व विभाग ने 17 जुलाई को कर्नाटक भूमि राजस्व अधिनियम 1964 और कर्नाटक भूमि कब्जा निषेध अधिनियम 2011 के तहत जांच का आदेश जारी किया। अक्टूबर 2025 में कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देश पर भूमि अभिलेख सहायक निदेशक (एडीएलआर) की ओर से एक सर्वे कराया गया था। इस सर्वे की शुरुआती रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए।
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290 एकड़ से अधिक कब्जा: सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, आर्ट ऑफ लिविंग के ट्रस्टियों और कुछ अन्य लोगों ने मिलकर 290 एकड़ से अधिक सरकारी गोमाला (चरवाहों की) जमीन पर सीधा या अप्रत्यक्ष कब्जा कर रखा है।
लीज का नियम टूटा: साल 1985 में कागलीपुरा के सर्वे नंबर 46 की 41 एकड़ सरकारी जमीन संस्था को 40 साल के लिए लीज पर दी गई थी। इसका सालाना किराया मात्र 500 रुपये प्रति एकड़ था।
समय सीमा खत्म: यह लीज अवधि साल 2015 में ही समाप्त हो चुकी है। लीज का नवीनीकरण नहीं कराया गया, फिर भी जमीन पर कब्जा लगातार बरकरार है।
शर्तों का उल्लंघन: जिस मकसद और काम के लिए जमीन आवंटित की गई थी, वहां उसका इस्तेमाल उस काम के लिए नहीं किया जा रहा है।
एसआईटी जांच में किन बातों का रखा जाएगा ध्यान?
सरकार द्वारा गठित एसआईटी को इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए कई अहम जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं:
रिकॉर्ड्स की जांच: सरकारी और संस्थागत दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जाएगी।
फर्जी कागजात की पहचान: जमीन आवंटन की असली प्रतियों की जांच होगी ताकि जाली या फर्जी दस्तावेजों को पकड़ा जा सके।
जल निकायों का सर्वे: उपग्रह तस्वीरों यानी सैटेलाइट इमेज के जरिए पर्यावरण नुकसान, सरकारी झीलों और सार्वजनिक जमीनों का आकलन होगा।
अदालती मुकदमों की समीक्षा: अदालत में लंबित पड़े सभी पुराने मुकदमों की जांच की जाएगी।
समन जारी करना: संबंधित उत्तरदाताओं को पूछताछ के लिए समन भेजा जाएगा।
राजनहरों पर निर्माण: कागलीपुरा के सर्वे नंबर 160, 164/1, 164/2, 150 और 137 में सरकारी जमीन, तालाबों और राजकैलुवे (बारिश के पानी के नालों) पर अवैध निर्माण की जांच होगी।
फर्जी गांव का पता: कागजात में 'उदयापुरा' नाम का पता दिया गया है, जबकि राजस्व रिकॉर्ड में इस नाम का कोई गांव ही मौजूद नहीं है।
यह भी पढ़ें: Congress Protest: दिल्ली पुलिस को CRPF की जेड प्लस सुरक्षा से क्यों जूझना पड़ा? राहुल की हिरासत पर कैसा संघर्ष
आर्ट ऑफ लिविंग ने क्या कहा?
द आर्ट ऑफ लिविंग ने सरकार के इस फैसले पर बेहद सकारात्मक रुख दिखाया है। संस्था का कहना है कि वे इस जांच से बिल्कुल भी डरते नहीं हैं। निष्पक्ष जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा।
द आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से कहा गया कि हमारे ऊपर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से गलत और बेबुनियाद हैं। कब्जे का सवाल ही पैदा नहीं होता। चार-पांच महीने पहले हुए सरकारी सर्वे में यह साबित हो चुका है कि सरकार द्वारा दी गई 60 एकड़ जमीन में से केवल 36 एकड़ ही हमारे पास है। बाकी 24 एकड़ जमीन तो सरकार ने आज तक हमें सौंपी ही नहीं है।
संस्था ने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ साजिश के तहत दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया जा रहा है। एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) अपने फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं, जिन पर खुद कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। संस्था के पास रंगदारी और ब्लैकमेलिंग की कॉल रिकॉर्डिंग भी मौजूद है, जिसे वे जांच टीम को सौंपेंगे।