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Kargil 25 Years: नेवी का अकेला अफसर जिसने कारगिल जंग में लिया था हिस्सा, दुश्मन के इलाके में उड़ाया था चीता

Sat, 20 Jul 2024 03:42 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Sat, 20 Jul 2024 03:42 PM IST
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सार
नौसेना ने सबसे पहले अपनी सालाना एक्सरसाइज को पूर्वी समुद्र तट से पश्चिमी समुद्र तट पर ट्रांसफर किया था। इसके लिए उसके पूर्वी बेड़े में तैनात युद्धपोतों को अरब सागर में भेजा गया, जिसके बाद ऑपरेशन तलवार की शुरुआत हुई। 
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kargil war 25 years indian navy officer utpal datta participate fly helicopter cheeta in enemy territory
कारगिल विजय के 25 साल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज से 25 पहले हुए कारगिल युद्ध में भारतीय थल सेना और भारतीय वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन कम ही लोगों को इस बात की जानकारी है कि इस युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना ने भी हिस्सा लिया था। भारतीय नौसेना ने उस दौरान ऑपरेशन तलवार चलाया था और पाकिस्तान को अरब सागर से बाहर धकेल दिया था। हालांकि उस युद्ध में नौसेना कारगिल में लड़ने तो नहीं गई थी, लेकिन उसका एक जांबाज अफसर ने न केवल 26400 फीट ऊंचाई तक हेलीकॉप्टर उड़ाया, बल्कि तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष जनरल वीपी मलिक ने उन्हें साहस की प्रशंसा भी की थी और उन्हें सम्मानित भी किया था। 


एक्टिव हो गई थी पाकिस्तानी नौसेना 
सैन्य शक्ति के तीन सिद्धांत हैं, भूमि, समुद्र और वायु। इनमें से वायु सेना सबसे तेजी से अभियान शुरू कर सकती है, जबकि इसमें नौसेना दूसरे स्थान पर आती है। लेकिन नेवी के मिशन हमेशा चलते रहते हैं, जिसकी वजह से कुछ नेवी शिप्स को हमेशा समुद्र में रहना पड़ता है। कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी नौसेना भी एक्टिव हो गई थी और अरब सागर में उसकी गतिविधियां बढ़ रही थीं। जैसे-जैसे कारगिल में ऑपरेशन की गति बढ़ी, वैसे-वैसे समुद्र में नौसेना की गतिविधियां भी बढ़ीं। भारतीय नौसेना ने अरब सागर में आक्रामक गश्त की। एक समय पर 30 से ज्यादा भारतीय नौसेना के जहाज कराची बंदरगाह के बाहर सिर्फ 13 समुद्री मील (24 किलोमीटर) की दूरी पर मौजूद थे, यानी पाकिस्तान के जल क्षेत्र से मजह 2 किमी से भी कम दूरी पर भारतीय नौसेना मौजूद थी। 


युद्धपोतों को अरब सागर में भेजा 
जब राष्ट्र, मीडिया और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान कारगिल पर था, तब नौसेना अपने काम में लगी थी। नौसेना ने सबसे पहले अपनी सालाना एक्सरसाइज को पूर्वी समुद्र तट से पश्चिमी समुद्र तट पर ट्रांसफर किया था। इसके लिए उसके पूर्वी बेड़े में तैनात युद्धपोतों को अरब सागर में भेजा गया, जिसके बाद ऑपरेशन तलवार की शुरुआत हुई। भारतीय नौसेना ऑपरेशन तलवार के तहत पाकिस्तान को अरब देशों से मिलने वाली रसद को रोकने के लिए अरब सागर में सभी सप्लाई लाइन्स को बंद कर रही थी। उस समय तत्कालीन लेफ्टिनेंट कमांडर और वर्तमान में कैप्टन उत्पल दत्ता एकमात्र नौसेना अधिकारी थे, जिन्होंने ऑपरेशन विजय में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

चेतक और चीता हेलीकॉप्टर उड़ाया
भारतीय नौसेना के हेलीकॉप्टर पायलट कैप्टन उत्पल दत्ता, फिलहाल गोवा स्थित नौसेना विमानन मुख्यालय में तैनात हैं। उन्होंने 4 जून से 22 जुलाई, 1999 के बीच ऑपरेशन विजय के अपने 77 घंटों के दौरान युद्ध में घायल हुए लोगों को घुमरी में बने एक अस्थाई अस्पताल तक पहुंचाने में मदद की थी और सैन्य सहायता जैसे रसद और गोला-बारूद सप्लाई करने में अहम भूमिका निभाई थी। यह कैप्टन दत्ता की पहली जंग थी। कैप्टन दत्ता ने उस दौरान चेतक और चीता हेलीकॉप्टर उड़ाया था। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वेद प्रकाश मलिक के साथ भी उन्होंने द्रास क्षेत्र में एक टोही उड़ान भी भरी थी। 

ऑब्जर्वेशन पोस्ट की ड्यूटी निभाई, बोफोर्स को हुई आसानी
नौसेना मेडल से सम्मानित कैप्टन उत्पल दत्ता ने पूर्व में अमर उजाला को बताया था कि कैसे उनके स्क्वाड्रन को गंभीर रूप से घायल लोगों को निकालने और सैनिकों को पानी, रसद और गोला-बारूद उपलब्ध कराने का काम सौंपा गया था। सेना की कमान के तहत, कैप्टन दत्ता ने चीता को सर्वाधिक ऊंचाई पर 26,400 फीट पर उड़ाया था और एक ऑब्जर्वेशन पोस्ट की अपनी ड्यूटी निभाई थी। जिसके बाद ही बोफोर्स तोपों को दुश्मन की चौकियों पर गोलाबारी करने में आसानी हुई थी। उन्होंने बताया था कि इससे पहले उस इलाके में कभी किसी ने इतनी ऊंचाई पर दुश्मन के इलाके में हेलीकॉप्टर उड़ाते नहीं देखा था। 

COAS प्रशस्ति पत्र और नौसेना मेडल से किया सम्मानित
कारगिल युद्ध के दौरान घायल हुए जवानों को घुमरी में बने एक अस्थाई अस्पताल तक पहुंचाते थे, जिन्हें बाद में एमआई-17 हेलिकॉप्टरों से श्रीनगर पहुंचाया जाता था। कैप्टन दत्ता के मुताबिक चूंकि रात में उड़ान भरने की अनुमति नहीं थी, इसलिए हम दिन की पहली किरण का इंतजार करते थे, जब सूचना दी जाती थी, तो फिर से उड़ान भरना शुरू कर देते थे। उस दौरान पूरे दिन में केवल चार-पांच घंटे ही सो पाते थे। लगातार हो रही गोलाबारी के बीच और किसी भी चीज के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता था। उस समय द्रास और कारगिल में नियंत्रण रेखा के पास 130 किलोमीटर से अधिक लंबे युद्ध क्षेत्र में सप्लाई के लिए केवल हेलीकॉप्टर पर निर्भर थे और यही एकमात्र लाइफलाइन थी। कैप्टन उत्पल दत्ता को वीरता के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ प्रशस्ति पत्र और नौसेना मेडल से भी सम्मानित किया गया था।

ऐसे की पाकिस्तानी नौसेना की नाकेबंदी
वहीं, ऑपरेशन तलवार में पूरी तरह से हथियारों से लैस नेवी के जहाज, पनडुब्बी और विमान तैनात किए गए थे। इसके अलावा, नौसेना दुश्मन के युद्धपोतों और पनडुब्बियों की स्थिति का पता लगाने में भी जुटी हुई थी। समुद्री टोही (एमआर) विमानों ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने दुश्मन की टोह लेने के अलावा अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा का काम संभाला। एक समय में जब भारतीय नौसेना एक नौसैनिक नाकाबंदी की तैयारी कर रही थी, तो इस बीच, पाकिस्तानी नौसेना ने भी भारतीय नौसैनिक बलों की जगहों और ताकत का पता लगाने के लिए एमआर सॉर्टी शुरू कर दी थी। जिसके बाद पाकिस्तानी नेवी को अहसास हुआ कि अगर उन्होंने कुछ एडवेंचर किया, तो यह उन पर कितना भारी पड़ सकता है। 

चीन नहीं भेज पाया मिसाइल स्पेयर पार्ट्स
पाकिस्तानी नौसेना पूरी तरह से डिफेंसिव हो गई थी। कराची में बचे हुए पाकिस्तानी युद्धपोतों को भी भारतीय जहाजों से सीधे टकराव से बचने के लिए बंदरगाह नहीं छोड़ने का आदेश दिया गया था, जो भारत के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत थी। वहीं चीन ने भी पाकिस्तान तो हथियार सप्लाई करने की कोशिश की थी, तो उसे भी मुंह की खानी पड़ थी। एक ऑपरेशन में, नौसेना ने पाकिस्तान के लिए मिसाइल स्पेयर पार्ट्स (चीन से भेजे जा रहे) ले जा रहे उत्तर कोरियाई मालवाहक जहाज को रोका। उस समय भारत का एकमात्र विमानवाहक पोत, आईएनएस विराट की मरम्मत चल रही थी, इसलिए नौसेना ने कंटेनर जहाजों से सी हैरियर फाइटर एयरक्राफ्ट उड़ा कर उनका ट्रायल किया था। उस दौरान नौसेना के इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (ईडब्ल्यू) विमान नियंत्रण रेखा पर एयर ऑपरेशंस को मजबूती देने का काम कर रहे थे। दुश्मन की तोपों के ठिकानों का पता लगाने के लिए भारत की विशेष हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण टीमों को सेना की तोपखाना इकाइयों के साथ जोड़ा गया था। 

चारों तरफ से फंस गया था पाकिस्तान
भले ही भारतीय नौसेना ने कारगिल जाकर दुश्मन से सीधे मोर्चा न लिया हो, लेकिन ऑपरेशन तलवार का ऐसा असर हुआ कि पाकिस्तान को समुद्र में मुश्किलें पैदा हो गई थीं। अनौपचारिक "नाकाबंदी जैसी स्थिति" और अपने आयात के लिए समुद्र पर निर्भरता का मतलब था कि पाकिस्तान चारों तरफ से फंस गया था। भारतीय नौसेना समुद्री मोर्चे खोलने के लिए तैयार थी, लेकिन पाकिस्तान हालात की गंभीरता को समझ गया था। बाद में खुद नवाज शरीफ ने माना था कि अगर भारत के साथ पूरी तरह युद्ध छिड़ जाता, तो पाकिस्तान के पास केवल छह दिनों का ईंधन बचा था।
 
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