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25 Years Of Kargil: कारगिल में कैसे इन जुगाड़ों ने पाकिस्तान को दिया था चकमा? घी के डब्बों का किया था इस्तेमाल
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Kargil
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
कारगिल युद्ध में आर्टिलरी की भूमिका बेहद जबरदस्त रही थी। यह बोफोर्स तोपें ही थीं, जिन्होंने 17000 फीट की ऊंचाई पर भारतीय चोटियों पर कब्जा जमा कर बैठी हुई पाकिस्तानी सेना के मंसूबों पर घातक आघात किया था। वहीं रही सही कसर 8 माउंटेन डिवीजन और 3 इन्फैंट्री डिवीजन में तैनात बटालियनों ने निकाल दी थी। कारगिल की ऊंची चोटियों से गोलाबारी और कमजोर सप्लाई लाइनों का सामना कर रही भारतीय सेना ने इस जंग में कई बार 'जुगाड़बाजी' का भी सहारा लिया। न केवल आर्टिलरी बल्कि एयरफोर्स ने भी कारगिल युद्ध के दौरान 'जुगाड़' का इस्तेमाल करके पाकिस्तानी सेना को हक्का-बक्का कर दिया था।
दुश्मन के लिए काल साबित हुई थी बोफोर्स
1999 में हुए इस युद्ध में कभी एक समय घोटालों के आरोपों का सामना कर चुकीं 155 एमएम बोफोर्स तोपों ने दुश्मन पर इतना कहर बरपाया था कि पाकिस्तान को इस बात की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि यह तोप उनके लिए 'काल' साबित होने वाली है। जंग के दौरान बोफोर्स के खाली खोलों से न केवल बटालियनों के लिए मंदिर बनाए, बल्कि 16,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात जवानों के लिए भोजन जैसे अंडा करी और मीट खाली 81 मिमी मोर्टार शेल के खोल में पहुंचाए जाते थे। वहीं, एक खास जुगाड़ और बनाया गया। युद्ध में लकड़ी के तख्तों और खाली घी के डिब्बों से छह नकली बोफोर्स हॉवित्जर बनाईं गईं, ताकि दुश्मन का ध्यान भटकाया जा सके और वह अपने गोले इन पर बर्बाद कर सके।
खाली घी के डिब्बों से बनाई बैरल
108 मीडियम रेजिमेंट ने द्रास में ही बोफोर्स 155 मिमी हॉवित्जर की एक बैटरी (6 तोपें) तैयार की, ताकि दुश्मन को धोखा दिया जा सके। युद्ध के बाद रेजिमेंट को कारगिल थिएटर सम्मान और सीओएएस यूनिट प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। युद्ध के दौरान 108 मीडियम की कमान संभालने वाले रिटायर्ड कर्नल प्रभात रंजन (सेना मेडल) ने बताया कि उन्होंने नकली बोफोर्स को बनाने के लिए सूबेदार हरभजन सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई थी। हमने लकड़ी के बक्से का इस्तेमाल किया, जिसमें बोफोर्स के गोले भर कर आते थे। नकली बोफोर्स के बैरल को खाली घी के डिब्बों से बनाया गया था। बोफोर्स एम्युनिशन, बैली, रॉकेट एम्युनिशन के पैकिंग मैटेरियल का इस्तेमाल भी डमी बोफोर्स और सैनिकों को बनाने के लिए किया गया था। दुश्मन की गोलाबारी में नष्ट हुई भारतीय सेना की एक जीप और एक ट्रक भी इस नकली कार्रवाई का हिस्सा बने। साथ ही, इस नकली गन पोजिशन के पास एक ग्राउंड पोजिशन एंटीना भी लगाया गया था।
असली समझ कर लोग खा जाते थे धोखा
रिटायर्ड कर्नल प्रभात रंजन बताते हैं कि दुश्मन कुछ समय के लिए इन नकली बोफोर्स पर गोलीबारी करता और जैसे ही उसे लगता कि कुछ गड़बड़ है तो वह गोलीबारी बंद कर देता था। दुश्मन को चकमा देने के लिए हम हर 2-3 दिन में नकली बोफोर्स जगह बदल देते थे। वह बताते हैं कि हम यह पता चला था कि भारतीय सेना के मुकाबले पाकिस्तानी तोपखाने में न केवल तोपें कम हैं, बल्कि उन्हें गोलों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। उस दौरान जब भी भारतीय तोपें गोलीबारी करतीं थीं, तो पाकिस्तानी रडार उस जगह को पहचान लेते थे और जवाबी गोलाबारी शुरू हो जाती थी। इन नकली तोपों ने उस पाकिस्तान का ध्यान खूब भटकाया और हमारी असली बोफोर्स तोपें इस दौरान सुरक्षित रहीं। ये नकली बोफोर्स तोपें इतनी असली लगती थीं कि इनकी लोकेशन से महज 400-500 गज की दूरी पर स्थित राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले सैनिक और नागरिक भी धोखा खा जाते थे।
सुबह चार बजे होती थी तैनाती
द्रास स्थित घुमरी से आगे राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे एक जगह पर इन नकली तोपों को लगाया जाता था, यहीं पर आर्टिलरी रेजिमेंट की तैनाती भी थी। सुबह 4 बजे तक, इन नकली तोपों को तैनात कर दिया जाता था। जैसे-जैसे दिन चढ़ता, पाकिस्तानी ओपी नकली तोपों की तैनाती की सूचना अपनी तोपों को बताते थे और सुबह करीब 7.30 बजे इन नकली बोफोर्स पर गोलाबारी शुरू हो जाती थी। नकली तोपें उस वक्त दुश्मन को ज्यादा धोखा देती थीं, जब हमारी असली तोपें फायरिंग कर रही होती थीं और दुश्मन इस चाल में फंस जाता था। और वह इन पर गोलाबारी शुरू कर देता था, ताकि असली फायरिंग पोजिशन पर जवानों, एम्युनिशन और तोपों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। हमारी असली बोफोर्स तोपें अपने गोले दागती थीं और कवर पोजिशन लेने के लिए अपनी जगह से पीछे हट जाती थीं। इस तरह से नकली बोफोर्स की मदद से दुश्मन के तोपखाने का बहुत सारा गोला-बारूद बर्बाद किया गया।
निश्चय विजय और फाइनल ब्लो का प्रहार
108 मीडियम रेजिमेंट को मई 1999 में द्रास-मश्कोह सेक्टर में तैनात किया गया और 26 मई के आसपास इसने पाकिस्तानी बंकरों पर गोलीबारी शुरू कर दी। इस रेजिमेंट की दो बोफोर्स तोपों ने पहली बार 6 जून 1999 को तोलोलिंग कॉम्प्लेक्स में 6 नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के बरबाद बंकर पर डायरेक्ट-फायर मोड में गोलीबारी की थी। उस डायरेक्ट-फायर हिट्स से वरिष्ठ अफसरों को भरोसा हुआ कि बोफोर्स तोपें इस जीत में अहम भूमिका निभा सकती हैं। 12 जून 1999 को 108 मीडियम रेजिमेंट ने कोडनेम 'निश्चय विजय' के तहत तोलोलिंग पर जबरदस्त गोलाबारी की, उसके बाद तीन जुलाई 1999 को टाइगर हिल (कोडनेम फाइनल ब्लो) पर गोलाबारी करके दुश्मन के पांव उखाड़ दिए थे।
इस्राइल ने इस तरह की जुगाड़ ने मदद
वहीं वायुसेना भी इस युद्ध में जुगाड़ में पीछे नहीं रही थी। ऑपरेशन सफेद सागर में मिराज 2000H की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। कारगिल में भारतीय वायुसेना के लिए कड़ी चुनौती थी। किसी भी वायुसेना ने 14,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर लक्ष्य पर बमबारी करने का काम पहले कभी नहीं किया था। क्योंकि वहां टारगेट को पहचानने में कई मुश्किलें थीं। साथ ही, नियंत्रण रेखा को पार न करने के निर्देश भी थे। कारगिल युद्ध के दौरान टाइगर हिल पर लेजर गाइडेड बम का इस्तेमाल किया गया था।
लेकिन ये बात बेहद कम लोग जानते हैं कि उस हमले में जुगाड़ का इस्तेमाल किया गया। दरअसल 1997 में कारगिल युद्ध से 2 साल पहले भारत ने इस्राइली पॉड के लिए एक समझौता किया था। इनमें से 15 पॉड भारत के जगुआर विमान और 5 मिराज 2000 फाइटर जेट में लगाए जाने थे। इन्हें फ्रांस के सप्लाई किए गए लेजर गाइडेड बम के साथ इस्तेमाल किया जाना था। लेकिन 1998 में पोखरण परमाणु टेस्ट के चलते अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए और फ्रांस ने वह तकनीक देने से इनकार कर दिया।
टाइगर हिल पर पाकिस्तानी बंकरों को किया तबाह
इस समस्या को हल करने के लिए इस्राइल ने भारत की मदद की। इस्राइली एक्सपर्ट्स ने भारतीय विशेषज्ञों के साथ मिलकर कारगिल में अमेरिकी लेजर गाइडेड बम में इस्राइली पॉड को लगाया। इस लड़ाई में भारतीय मिग-27 और मिग-21 विमानों को सटीक तरीके से कारगिल की चोटियों पर हमला करने में दिक्कत आ रही थी। पाकिस्तानी सैनिक कंधे पर रखकर फायर की जाने वाली सतह से हवा में मार करने वालीं स्टिंगर मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहे थे। जिसकी चपेट में भारतीय वायुसेना का एक मिग-21 फाइटर जेट और एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर भी आ गए थे।
इस्राइल की मदद से बेंगलुरु में मिराज जेट को अपग्रेड किया गया और उसने लगातार हमले करने शुरू कर दिए। 24 जून 1999 को पंजाब के आदमपुर से 3 मिराज फाइटर जेट ने उड़ान भरी, जिनके निशाने पर टाइगर हिल था। इस्राइली लाइटनिंग पॉड से 50 किमी की दूरी से टाइगर हिल नजर आ रही थी। टाइगर हिल 16,600 फुट की ऊंचाई पर थी और भारत को उसे कब्जा करने में दिक्कत आ रही थी। हमले के लिए मिराज विमानों ने कम ऊंचाई पर उड़ानें भरीं। पाकिस्तानी स्टिंगर मिसाइलें भी उस समय बड़ी खतरा थीं।
इसके बाद भी वायुसेना की टीम ने टाइगर हिल के पास जाकर पाकिस्तानी सेना के ठिकानों को तबाह कर दिया। इन हमलों के दौरान 5 लेजर गाइडेड बम गिराए गए। बम टाइगर हिल पर बने दुश्मन के बंकर पर लगे। ऐसा ही एक हमला कारगिल के पूर्वी सेक्टर में स्थित मंथो धालो पर किया गया। यहां पाकिस्तानी सेना का सप्लाई डम्प था। चार मिराज-2000 ने सिंगल अटैक में 250 किलो के 6 बम यहां गिराए थे। इस तरह जुगाड़ ने कारगिल युद्ध में भारत की जीत सुनिश्चित की थी।