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कानों देखी: नेता जी करम का फल तो भुगतना ही पड़ता है

Mon, 24 Sep 2018 10:16 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 24 Sep 2018 10:16 PM IST
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Kano dekhi: Mulayam Singh Yadav, Karamfal has to suffer

करम का फल तो भुगतना ही पड़ता है। नेता जी यानी मुलायम सिंह यादव के सामने अब सबकुछ गांठ खोलकर आ रहा है। भाई शिवपाल रोज एक गांठ खोल रहे हैं। उनके एक सलाहकार अमर सिंह भी हैं। अमर सिंह शिवपाल को भाजपा अध्यक्ष अमित भाई शाह से मिलवा चुके थे। अमर सिंह कभी सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के नाक के बाल हुआ करते थे। अब उन्होंने कॉरपोरेट डिजाइनर से समाजवादी होने के बाद भगवाई रंग धारण कर लिया है। जैकेट पहनकर चंदन भी लगाने लगे हैं। फिलहाल शिवपाल ने सीधे भाजपा की छतरी नीचे आने के बाद अलग पार्टी बना ली है। मुलायम सिंह अब भी चाहते हैं परिवार की दरार खत्म हो जाए। अगर शिवपाल को सपा महासचिव का पद मिल जाए तो सब ठीक हो सकता है। नेता जी तर्क भी है कि बिना पारिवार की एकता के पार्टी उ.प्र. में ताकत नहीं दिखा सकती। प्रो. राम गोपाल भी थोड़ा नरम हो रहे हैं, लेकिन टीपू (अखिलेश) की तलवार जल्दी हार नहीं मानती। 

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लिहाजा वह यादव परिवार की समझौते के बाबत उच्च स्तरीय बैठक में न तो पहुंचे और न ही समझौते के किसी फार्मूले पर अपनी सहमति दे रहे हैं। अब नेता जी बेचारे क्या करें? लाचार हैं। पहले वह चुपचाप लोगों के पर कतर दिया करते थे और अब अपने ही घर में अपनी ही इज्जत का पता नहीं है। किसी ने ठीक कहा है कि अब पछताए का होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत।
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राहुल से बात कीजिए

कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इस कदर खामोश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा न था। राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद वह खुद को लगभग समेट चुकी हैं। सोनिया राहुल के ऊपर काम का काफी बोझ बढ़ जाने के बाद केवल उनकी अनुपस्थिति में थोड़ा सहयोग देती हैं। सोनिया के इस रुख से तमाम नये, पुराने, टॉयर्ड, रिटायर्ड कांग्रेसी काफी परेशानी महसूस कर रहे हैं। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष नेताओं से मिलने-जुलने में भी कोई दिलचस्पी नहीं ले रही हैं। यहां तक कि महागठबंधन को लेकर दूसरे दलों के नेताओं से मिलने का सिलसिला भी ठंडा चल रहा है। जबकि सारे नेता अभी भी सोनिया गांधी से मिलना चाहते हैं। कई नीतिगत मामलों में पार्टी के निर्णय पर अपनी राय रखने या रणनीति को साझा करने में पार्टी के शुभ चिंतक असहाय से हैं। उन्हें सोनिया गांधी उपलब्ध नहीं हैं। वहीं सोनिया गांधी के दफ्तर का जवाब होता है कि पहले कांग्रेस अध्यक्ष के सामने बात रख ली जाए।

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इसका जवाब कांग्रेस देगी

बसपा के नेता खुश हैं। उनकी नेता मायावती बिल्कुल सोच-समझकर आगे चल रही हैं। बसपा के नेताओं को यह भी पता है कि उनकी नेता कई निर्णय क्यों ले रही हैं। अब पार्टी के राजस्थान के एक बड़े नेता की सुनिए। सूत्र का कहना है कि राजस्थान में बसपा को लेकर कांग्रेस का नजरिया अब तक साफ नहीं हो पाया है। यही स्थिति छत्तीसगढ़ और म.प्र. में है। इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का शुरू से एक ही जवाब रहा। राहुल कहते रहे कि जैसा प्रदेश कांग्रेस और पार्टी के राज्य प्रभारी सुझाएंगे, वह पहली वरीयता में उसे रखकर चलेंगे। बताते हैं इसी के चलते छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी के साथ बसपा ने जाने का निर्णय ले लिया। म.प्र. में गेंद कांग्रेस पार्टी के हाथ में है। कांग्रेस संभली तो ठीक नहीं तो समय को कोई नहीं रोक पाया है। रहा सवाल लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन का तो यह भी कांग्रेस से ही पूछिए। बसपा का तो पुराना नारा है- जहां जैसी हिस्सेदारी, वहां वैसी भागेदारी।

नीतीश जी हड़बड़ाइए मत

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार काफी हड़बड़ाहट में लग रहे हैं। वह चार राज्यों के चुनाव के पहले भाजपा के साथ लोकसभा में सीटों का तालमेल चाहते हैं। प्रशांत किशोर को भी उन्होंने जद(यू) का सक्रिय सदस्य बना दिया है। इस सप्ताह उन्होंने अचानक दिल्ली आने का फैसला कर लिया। फैसला तो खुद का पूरे शरीर का चेकअप कराने से जुड़ा था लेकिन इसके अंदर के तार अमित शाह भेंट-मुलाकात तक जुड़े थे। नीतीश चाहते थे कि इसकी भनक मीडिया को न लगे। इसलिए वह आए और एम्स में भर्ती हो गए। पूरा शरीर का चेक-अप कराया। आंखों की समस्या को छोडक़र नीतीश को स्वास्थ्य के बाबत परेशान होने जैसा कुछ नहीं है। इस बीच वह भाजपा के शीर्ष नेताओं से मिले, लेकिन अभी खिचड़ी पक नहीं पाई है। लेकिन नीतीश को दो भरोसा हो चुका है। पहला तो यह भाजपा, जद(यू) के साथ बिहार में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल से इच्छुक है। भाजपा के नेता बिहार की जमीनी सच्चाई को स्वीकारने लगे हैं। दूसरा भरोसा अब एक दर्जन से अधिक लोकसभा सीटों के मिलने का हो गया है। बताया जा रहा है कि नीतीश अब 15-16 सीट तक जद(यू) के खाते में लेने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

रॉफेल.....रॉफेल.....रॉफेल

रॉफेल को लेकर इस कदर तूफान खड़ा होने का अंदाजा रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को भी नहीं था। भाजपा के कई केन्द्रीय मंत्री भी इसकी गंभीरता को नहीं समझ पा रहे थे, लेकिन बताते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसकी पड़ताल में बड़ी सफलता पा ली है। यूरोप यात्रा के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष की मुलाकात कई लोगों से हुई हैं। इस दौरान एक शख्स से उन्हें राफेल लड़ाकू विमान के सौदे के बारे में अहम जानकारी मिली है। कुछ सबूत भी आने वाले हैं। कांग्रेस अध्यक्ष इन मसाले के हाथ में आने का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच वह लगातार पार्टी के नेताओं आदि से मशविरा कर रहे हैं। वह तकनीकी बारीकियों को भी समझ रहे हैं। पार्टी के एक बड़े नेता के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के सामने आने के बाद राहुल जल्द ही मोदी सरकार के कामकाज से जुड़ा एक और धमाका करने वाले हैं। बस देखते जाइए।

रॉफेल केवल एक राजनीतिक घोटाला

रॉफेल केवल परसेप्शन पर असर डालने वाला एक राजनीतिक घोटाला है। यह हम नहीं बल्कि इस पर नजर वाले विशेषज्ञ प्रकृति के लोगों का दावा है। वायुसेना के एक बड़े अधिकारी का कहना है कि यदि इसे घोटाला मानकर पूरे प्रकरण की जांच की जाए, तब भी किसी को सजा देने वाला ऐसा कोई तथ्य हाथ में नहीं लगने वाला है। कानूनी रूप से यह बेहद कमजोर केस है। वजह पूछने पर सूत्र बताते हैं कि रॉफेल लड़ाकू विमान का सौदा भारत और फ्रांस की सरकार के बीच में हुआ है। फ्रांस अपने देश की कंपनी डास्सो एविएयेशन द्वारा तैयार 36 लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना को देगी। दो सरकारों के बीच होने वाले सौदे में रिलायंस डिफेंस कहीं है ही नहीं। रिलायंस डिफेंस तो डास्सो एवियेशन द्वारा ऑफसेट क्लॉज के तहत चुनी गई है। यह डास्सो एवियेशन की स्वतंत्रता है कि वह सौदे की 50 फीसदी वैल्यू की कीमत भारत में किस कंपनी के साथ साझा करना चाहती है।

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