कानों देखी: ओम प्रकाश राजभर से लेकर राहुल गांधी तक, जानें सियासी गलियारे में क्या-क्या चल रहा
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जुलाई 2023 में सुभासपा के चीफ ओम प्रकाश राजभर एनडीए में लौटे थे। लौटने से पहले केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिले। बाद में कई बार मिल चुके हैं। कई बार घोषणा कर चुके हैं कि वह जल्द ही उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनने वाले हैं। दारा सिंह चौहान भी उम्मीद पाले बैठे हैं। यह लाइन केशव प्रसाद मौर्या ब्रिगेड की है। वह इनके पैरोकार भी हैं। राजभर उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक से भी खूब मिलते हैं। केन्द्र भी चाहता है कि दोनों की ताजपोशी हो जाए। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही हैं। अब तो ओपी राजभर यह भी कहने लगे हैं कि मंत्री नहीं बने, तो होली भी नहीं खेलेंगे।
मुख्यमंत्री योगी प्रदेश में भरोसे की राजनीति करना चाहते हैं। सरकार के साथ पार्टी का इकबाल बुलंद रखने के पक्षधर हैं। गोमती नदी का पानी पीने वाले बताते हैं कि देरी तो इधर से ही है। वैसे भी राजभर और दारा में बचा ही क्या है। मुख्यमंत्री कैंप के एक नेता कहते हैं कि चुके हुए नेता से क्या भला होगा? फिर यह तो वही नेता हैं जो 2022 में चुनाव से ठीक पहले करंट मार गए थे। इन्ही सब हेर-फेर में उ.प्र. सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार टलता जा रहा है। खैर, योगी जी को भी कोई जल्दी नहीं है। वह तो बिना पूर्णकालिक डीजीपी के इतने दिनों प्रदेश चला आए। चीफ सेक्रेटरी का सभी को पता है। अब तो उनके विश्वासपात्र संजय प्रसाद का जोश देखने के काबिल है।
मुश्किल में जयंत चौधरी, भाजपा आए लेकिन भेंट के लिए नहीं मिल रहा है टाइम
भाजपा गजब की राजनीतिक पार्टी है। विपक्ष के नेताओं को पहले दाना डालती है। फिर उन्हें अपने साथ लेती है। परखती है। इसके बाद अपने हिसाब से उसकी भूमिका तय करती है। ताकि भगवा खेमे में आने या भगवा पटका धारण करने के बाद कोई दग्ग न रहे। रालोद के जयंत चौधरी इसी दौर से गुजर रहे हैं। पीयुष गोयल के प्रयास फलीभूत हुए। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न(मरणोपरांत) से अलंकृत करने की घोषणा हुई। जयंत के दो बयान खूब छाए। पहला दिल जीत लिया और दूसरा किस मुंह से ना करूं। एनडीए में आ गए। जयंत के विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में वोट भी कर दिया। अगले महीने विधान परिषद के चुनाव में भी कर देंगे, लेकिन मुसीबत यह है कि लाख प्रयास के बाद भी न तो प्रधानमंत्री से मिलने का समय मिला और न अमित शाह से मिल पाए। सामने एक संकट और खड़ा है। जाटों में भी उनके एनडीए में जाने के निर्णय की आलोचना होने लगी है। मुसलमान भी ठगा सा महसूस कर रहा है। भाजपा भी सबकुछ बारीकी से देख रही है। क्या पता अगली शर्त रालोद के भाजपा में विलय की भी न आ जाए।
सपा नहीं बांध पाई विधायक और कांग्रेस ने नहीं दिया पल्लवी, स्वामी को भाव
नीतीश कुमार के जाने के बाद कांग्रेस थोड़ा संभल गई है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से बनने वाली बात लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी के कारण बेपटरी चल रही है। जयंत चौधरी भी छोड़कर जाने की घोषणा कर चुके हैं, लिहाजा कांग्रेस उ.प्र. में फूंक-फूंककर कदम रख रही है। स्वामी प्रसाद मौर्या समाजवादी पार्टी में हैं। ऊंचाहार और रायबरेली से खास लगाव है। उनकी बेटी को भी अपना राजनीतिक भविष्य देखना है। अब वह अपनी नई पार्टी भी बना चुके हैं।
बताते हैं तमाम पेंचीदिगियों में वह सपा को अपना मोल भाव बताना चाह रहे थे। कुछ इसी तरह से विधायक पल्लवी पटेल भी किसी मंशा से बनारस में पहुंची थी। राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल हुई थी। लेकिन बताते हैं कि कुछ आगे हो, इसके पहले अखिलेश यादव ने कांग्रेस के नेता राहुल को फोन लगाया। राहुल और उनके सलाहकारों ने भी थोड़ी समझदारी दिखाई। जो इधर उधर चल रहा था, उसका नतीजा आ गया है। असल की चिंता बस इतनी है कि पार्टी के विधायकों ने क्रास वोटिंग की। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा प्रत्याशी और पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन चुनाव हार गए हैं। कभी अखिलेश और मुलायम परिवार के साथ अच्छा रिश्ता रखने वाले भाजपा के प्रत्याशी संजय सेठ चुनाव जीत गए हैं।
संदीप, मोहित और तौकीर से प्रियंका गांधी को इतना प्रेम क्यों?
उ.प्र. के तमाम कांग्रेसियों में संदीप सिंह, महेश पांडे और तौकीर की अच्छी धमक है। पूर्व अजय कुमार लल्लू तो कई बार इसमें से एक के सामने नर्वस हुए थे। बनारस के कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि इसमें संदीप सिंह तो जैसे खुद ही पार्टी लाइन हों। हों भी क्यों न? कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के प्रिय जो ठहरे। बताते हैं पार्टी के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे भी संदीप सिंह के मामले में सुनकर बस टाल जाते हैं। संदीप सिंह पहले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के साथ थे। वामपंथी स्टाइल में राहुल की छवि को रंगने की सलाह देने का श्रेय भी पार्टी के नेता उन्हीं को देते हैं। हालांकि, इस समय संदीप सिंह रायबरेली में प्रमुख जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं। उनके कंधे पर पार्टी की भावी प्रत्याशी प्रियंका गांधी को जिताने का जिम्मा है। अभी तक रायबरेली में कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी के लिए चुनाव प्रचार का जिम्मा संभालने वाले किशोरी लाल शर्मा भी इस पर बड़े करीब से निगाह गड़ाए हैं।
केरल में अमित शाह पका रहे हैं खास खिचड़ी, तैयारी 5 सीट की
जो भी हो करना पड़ेगा। राजनीति में सफलता के लिए जरूरत के हिसाब से बदलना पड़ेगा। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मास्टर लाइन पर बड़ा पड़ाव हासिल करने की कोशिश करते हैं। अमित शाह की एक खासियत और है। वह समय समय पर विपक्ष के सांसद को अपनी मर्यादा में फोन भी करते हैं। किसी को जन्मदिन की बधाई और किसी को शुभकामना। दरअसल शाह को पता है कि समय हाथ में नहीं। न जाने कब किसकी जरूरत पड़ जाए। केरल में भाजपा को कुछ ऐसे आपरेशन से खास उम्मीद है।
हाल में प्रधानमंत्री केरल में बड़ी घोषणा करके लौटे हैं। भाजपा ने भी पांच संसदीय सीटों को जीत लेने की उम्मीद पाल रखी है। दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर पूछिए तो कहते हैं कि सबकुछ हवा में नहीं है। प्रयास पिछले चार साल से चल रहा है। हम 5 लोकसभा जीतेंगे। हां, अपनी योजना बताई नहीं जाती। इसे अमली जामा पहनाया जाता है।
घबड़ाइए नहीं राहुल गांधी के पास है अमेठी का खास प्लान, क्या प्रियंका रायबरेली में उतरेंगी?
कांग्रेस के पास दो यक्ष प्रश्न खड़े हैं। पहला उ.प्र. में अपना जनाधार बढ़ाना। दूसरा अमेठी और रायबरेली की सीट को बनाए रखना। दोनों की अहमियत कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी काफी गहराई से समझ रही हैं। सूत्र बताते हैं कि प्रियंका गांधी ने अपने सिपहसालारों को सोनिया गांधी की इस भावना से अवगत करा दिया है। भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान भी राहुल गांधी ने अमेठी में देखा कि उनकी राजनीतिक जमीन सूखी नहीं है। जबकि पिछले पांच साल उन्होंने अमेठी को उसके हाल पर छोड़ रखा है। खबरची को पता लगा है कि अब राहुल गांधी अमेठी के लिए खास योजना बना रहे हैं। वहीं मोहित पांडे, तौकीर और संदीप सिंह ने रायबरेली में बैटिंग की तैयारी तेज कर दी है। किशोरी लाल शर्मा बोरिया बस्तर लेकर क्षेत्र में फिर जमने की तैयारी कर रहे हैं। गांव, ब्लाक, तहसील, जिला स्तर पर कार्य कर्ताओं में जोश भरने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। दोनों संसदीय क्षेत्र पर प्रियंका गांधी के बेटे रेहान की भी नजर है। वह अपने स्तर से जानकारी लेते रहते हैं।