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संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक: एफसीआरए संशोधन विधेयक पर मंथन शुरू, शीतकालीन सत्र में आएगी रिपोर्ट

Fri, 18 Sep 2026 04:20 PM IST
अमन तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अमन तिवारी Updated Fri, 18 Sep 2026 04:20 PM IST
सार

एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 की समीक्षा के लिए 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति की पहली बैठक शुक्रवार को हुई। विधेयक विदेशी फंडिंग और एनजीओ पर निगरानी से जुड़े प्रावधानों में बदलाव प्रस्तावित करता है।

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JPC on FCRA amendment bill meets first time to examine threadbare
केंद्रीय गृह मंत्रालय - फोटो : ANI

विस्तार

देश में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और विदेशी फंडिंग पर सरकारी निगरानी को कड़ा करने वाले अहम विधेयक की पड़ताल के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की पहली बैठक शुक्रवार को आयोजित की गई। भाजपा सांसद संजय जायसवाल के नेतृत्व वाली इस 31 सदस्यीय समिति को 'विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए), 2026' के प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन करके अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। समिति को संसद के शीतकालीन सत्र 2026 के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट लोकसभा में पेश करने का निर्देश मिला है।
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प्रस्तावित विधेयक का मुख्य उद्देश्य विदेशी धन और एनजीओ पर सरकारी नियंत्रण को मजबूत करना है। साथ ही, अगर किसी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होता है, तो उसकी संपत्तियों की देखरेख और निपटारे के लिए एक अधिकृत प्राधिकरण गठित करने का प्रस्ताव है। यह विधेयक इसी साल 25 मार्च को लोकसभा में रखा गया था और विपक्ष की लगातार मांग के बाद 12 अगस्त को इसे जेपीसी के पास भेजा गया था।
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विधेयक पेश करते समय केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि इस कानून का मकसद विदेशों से मिलने वाले पैसों के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना है। विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा था कि यह विधेयक उन लोगों के लिए 'सचमुच खतरनाक' है जो विदेशी चंदे से जबरन धर्मांतरण कराते हैं या पैसों का निजी इस्तेमाल करते हैं। सरकार ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोपों को नकारते हुए विपक्ष को चुनौती दी कि वे ऐसा एक भी प्रावधान दिखाएं जो भेदभाव करता हो। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने आरोप लगाया कि कुछ वर्गों को भड़काने के लिए गलत अभियान चलाया जा रहा है।
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वहीं कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि यह कानून अल्पसंख्यकों और एनजीओ को प्रताड़ित करने के लिए लाया गया है और विपक्ष इसे मौजूदा रूप में पास नहीं होने देगा। विपक्ष का दावा है कि इससे अल्पसंख्यक संस्थानों और ईसाई एनजीओ की वैध फंडिंग रुक जाएगी। एनसीपी (एसपी) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने भी कहा कि हर विदेशी फंडिंग को अविश्वास से नहीं देखा जाना चाहिए।

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मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने इस विधेयक को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त समिति को भेजने की मांग की थी। लालदुहोमा ने ईसाई संगठनों के साथ गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर अपनी आपत्तियां रखी थीं। मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा ने भी केंद्र के सामने चिंता जताई थी। इसके अलावा डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने विधेयक को वापस लेने की मांग की, जबकि डीएमके सांसद पी विल्सन ने चर्च प्रतिनिधियों के साथ गृह मंत्री से मुलाकात कर विधेयक वापस लेने और मौजूदा कानून की धारा 15 को निरस्त करने की मांग उठाई थी।

अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के प्रमुख जेम्स रिश सहित कई अमेरिकी सांसदों ने भी इस पर चिंता जताई थी। हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसे भारत का आंतरिक विधायी मामला बताते हुए आलोचना को खारिज कर दिया था। इस बीच, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बुधवार को राज्यसभा सदस्य जावेद अली खान और जेम्स पांगसांग कोंगकल संगमा को जेपीसी में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में नामित किया है।
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