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जय श्रीराम कहकर पत्रकार ने बचाई परिवार की जान

Sun, 02 Jul 2017 07:04 PM IST
एम. अतहरउद्दीन मुन्ने भारती
एम. अतहरउद्दीन मुन्ने भारती Updated Sun, 02 Jul 2017 07:04 PM IST
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Journalist says Jai Shriram slogan for life of the rescued family
मुन्ने भारती
मैं दिल्ली में 26 साल से पत्रकारिता कर रहा हूँ। मैं अपने 91 वर्षीय अब्बू, 85 साल की अम्मी, अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ 28 जून 2017 को बिहार के वैशाली जिले के करनेजी गाँव से अपने ननिहाल समस्तीपुर जिले के रहीमाबाद गाँव के लिए निकला था।  मुजफ्फरपुर नेशनल हाईवे 28 के टोल टैक्स बैरियर से लगभग एक किलोमीटर दूर मारगन चौक का रास्ता जाम था। एक तरफ ट्रक सहित अन्य वाहन कतार में थे, मैं दूसरी तरफ ख़ाली जगह से अपनी कार लेकर बढ़ रहा था, मैंने देखा कि बीच रोड पर एक बड़ा ट्रक खड़ा कर किया गया है।
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अचानक एक नवयुवक ने आगे बढ़कर कार को गौर से देखा, मैंने उससे पूछा रास्ता क्यों जाम है। मेरे ऐसा पूछते ही उसने कहा जल्दी निकलो वरना आपकी गाड़ी फूंक देंगे। मैंने पूछा कौन लोग हैं, जवाब मिला बजरंग दल के लोग हैं, मैं दहशत में गाड़ी मोड़ने की कोशिश कर ही रहा था कि केसरिया गमछा पहने 4-5 लाठी से लैस लोग कार की तरफ बढ़े।
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उन लोगों ने कार के अंदर बैठी मेरे मां-बाप और मेरी पत्नी पर नजर डाली। चूँकि, मेरे पिता जी की दाढ़ी है और पत्नी नक़ाब पहनती हैं। इन्हें देखते ही 'जय श्रीराम' के नारे तेज हो गए। वो लोग लगातार लाठियां सड़क पर पटक रहे थे। मैं और मेरा परिवार किसी आशंका की दहशत से कांप रहा था। जब तक कुछ समझ में आता तो दो लोग मेरी गाड़ी के शीशे पर आकर चीखे, 'बोलो जय श्रीराम वरना कार फूंक देंगे'। दूर खड़े ट्रक के पास से काले धुंए का गुबार भी नजर आ रहा था, मानो वहां किसी की गाड़ी जला दी गई हो। लेकिन संकट सामने था, लिहाजा मैं और मेरे परिवार के सभी लोगों ने जय श्रीराम के नारे लगाए।
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दहशत भरे वो पल

Journalist says Jai Shriram slogan for life of the rescued family

मैं दिल से श्रीराम का सम्मान करता हूं और उनकी जय में मुझे कोई एतराज भी नहीं होता लेकिन जिस दहशत में मुझे श्रीराम कहना पड़ा ये मुझे अच्छा नहीं लगा। हालांकि, जैसे-तैसे कार को पीछे मोड़कर हम अपनी जान बचाने में कामयाब रहे। कुछ दूर जाने के बाद मैंने ट्विटर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को टैग करते हुए ट्वीट किया। इसके साथ ही जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार और स्थानीय राजद विधायक अख्तरूल इस्लाम शाहीन को फोन करके मामले की जानकारी दी।

मैंने अनुरोध किया कि इस मामले में तत्काल रूप से पुलिस मुस्तैदी के साथ सक्रिय करें ताकि किसी के साथ कोई अप्रिय घटना न घटे, किसी को नुक़सान ना हो, चूंकि मेरा ये सफ़र मां को उनके बीमार भाई यानी मामा से मिलवाने के लिए था, लिहाजा मैं बैरियर के पास से दूसरे रास्ते से ननिहाल के लिए निकल पड़ा। रास्ता अलग होने की वजह से काफी फासला तय करने के बाद मैं ननिहाल पहुँचा, उसी रात मुझे वापस वैशाली लौटना भी था। लिहाजा मिलने के बाद रात आठ बजे मैंने फिर राजद के समस्तीपुर के विधायक अख़्तरूल इस्लाम शाहीन साहब को फोन लगाकर उस रास्ते पर मौजूद तनाव की जानकारी चाही।

मजहब के नाम पर तनाव
थोड़ी देर बाद उन्होंने फोन करके बताया कि रोड तो चालू है लेकिन इलाके में तनाव है. इसके बाद तो मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं परिवार को लेकर उसी रास्ते से वैशाली जाऊँ. लिहाज़ा, मैंने अपना प्रोग्राम कैंसिल दिया। इसके बाद शाहपुर बधौनी इलाके के मुजीब साहब के घर रात बिताकर 29 जून को वैशाली के लिए रवाना हुआ, लेकिन दहशत ज़हन मे आज भी बरक़रार है कि आख़िर कुछ लोगों को मज़हब के नाम पर मौत बाँटने की हिम्मत कैसे मिल गई है।

इसके साथ-साथ क्या इलाके का प्रशासन सोता रहता है जिसको कान मे ज़ू तक नही रेंगती, मेरे ज़हन मे एक सवाल गूंज रहा है कि क्या नीतिश कुमार की क़यादत वाली सरकार फ़ेल हो रही है या फिर नौकरशाही ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है? या फिर महागठबंधन आखिरी दौर में है? लेकिन इससे बड़ा सवाल ये है कि मैं अपने ननिहाल बचपन से ही आता-जाता रहा हूं और कभी ऐसा उन्माद मुझे सड़कों पर नहीं दिखा।सवाल ये भी है कि हमारे समाज को क्या होता जा रहा है, किसकी नज़र लग गई है? एक बात और है, आज भी मेरे दिल मे राम जी को प्रति आस्था कम नहीं हुई। इस अनुभव से बढ़ी है, ये भी नहीं कह सकता।
 

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