अनुभव के बावजूद सर्वोच्च नायक की भूमिका में आने से चूक गए पासवान - प्रो. आनंद कुमार
- एक समय में प्रधानमंत्री की रेस में भी शामिल थे पासवान
- बिहार के मुख्यमंत्री बनने का सपना भी नहीं हो सका पूरा
विस्तार
पासवान का बिहार का मुख्यमंत्री या देश का प्रधानमंत्री न बन पाना उनके समर्थकों को बहुत अखरेगा। वे उस दौर के संपूर्ण क्रांति आंदोलन का हिस्सा रहे हैं। चाहे जेपी हों, राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा, वे इन सभी के करीबी रहे थे। जेपी के प्रबल अनुयायी के रूप में ही पासवान लोकदल के महासचिव बने थे।
पासवान के व्यक्तित्व की यह खास बात रही कि उन्हें चाहे किसी भी पार्टी और गठबंधन के साथ काम करना पड़ा हो, मगर वे सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते रहे। प्रो. आनंद कुमार ने कहा, यह बहुत कम लोगों के वश में होता है कि वह विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ रहते हुए अपने मूल मकसद को न केवल सजीव बनाए रखे, अपितु उसे आगे भी बढ़ाता रहे। पासवान में ये खूबी थी और उन्होंने सामाजिक न्याय की लड़ाई को अंतिम समय तक जारी रखा।
चाहे वाजपेयी का शासनकाल रहा हो या मौजूदा समय में नरेंद्र मोदी का, वे सामाजिक न्याय से नहीं हटे। जब कभी इस्तीफा देने की बात सामने आई, तो वे तुरंत आगे आ गए। विधानसभा हो या लोकसभा, उन्होंने पद छोड़ने में देरी नहीं की। वे कई बार ऐसी स्थिति में रहे कि लोगों ने उन्हें किंग मेकर तक कह दिया। आजादी के बाद उन्होंने एक महत्वपूर्ण दलित नेता और सामाजिक आंदोलन के अग्रणी व्यक्तित्व के रूप में खुद को भारतीय राजनीति के शिखर नेतृत्व में स्थापित करने की जगह बना ली थी।
पासवान ने कई दलों के साथ काम किया था। कई बार विचारधारा के टकराव जैसी स्थिति भी सामने आई, लेकिन उन्होंने बात आगे नहीं बढ़ने दी। यह उनका कुशल व्यक्तित्व ही था कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था की बदलती शर्तों के बीच काम करते रहे, लेकिन उन्होंने अपनी छवि को ठेस नहीं पहुंचने दी।
चाहे केंद्र में उन्हें किसी भी राजनीतिक दल के साथ काम करना पड़ा हो, पासवान ने अपनी छवि को सदैव स्थापित रखा। खास बात यह रही कि पासवान अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दो दशकों में आरएसएस के कटु आलोचक रहे थे। बाद में उन्होंने अपने रुख में बदलाव लाना शुरू किया। उन्होंने कई बार कहा, हिंदुत्ववादी संगठनों को दलितों के लिए अपनी छवि में परिवर्तन लाने की जरूरत है।