जेएनयू मामला : 36 माह जांच के बाद भी 36 के खिलाफ पुलिस के हाथ खाली
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जेएनयू में देश विरोधी नारेबाजी विवाद में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने करीब तीन साल की जांच के बाद आरोप पत्र तो दाखिल कर दिया, लेकिन 36 ऐसे छात्र रहे, जिनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं जुटा सकी। इन संदिग्धों के खिलाफ साक्ष्य न मिलना स्पेशल सेल की जांच पर सवाल खड़े करता है। दिल्ली पुलिस ने अपने आरोप पत्र में कहा कि ऐसे 36 लोग हैं, जिन पर संदेह है, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका। इसलिए इन लोगों को संदिग्ध के तौर पर आरोपित किया गया है। इनमें जेएनयू की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला रशीद, अपराजिता, रामा नागा, आशुतोष कुमार, इशान व एक प्रोफेसर शामिल हैं।
इस मामले की जांच स्पेशल सेल को तब सौंपी गई थी जब इस नारेबाजी के तार कश्मीर से जुड़े थे और सरकार व एजेंसियों को इसके पीछे कश्मीर के आतंकियों की साजिश का अंदेशा हुआ था। इसके बाद केस की जांच स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर उमेश बर्थवाल कर रहे थे और जांच की निगरानी एसीपी गोविंद शर्मा के साथ डीसीपी प्रमोद कुशवाहा व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के जिम्मे थी।
नारेबाजी से बिगड़ा था माहौल
देश विरोधी नारेबाजी के बाद जेएनयू कैंपस में छात्रों के बीच मुनमुटाव व गुटबाजी बढ़ी थी। इस घटना के बाद वामपंथी छात्रों को शक की निगाह से देखा जाने लगा था। मामले में शिकायत करने वाले एबीवीपी के सदस्यों की माने तो वामपंथी छात्र आतंकियों के पक्षधर हैं और इसलिए अफजल गुरु की फांसी के विरोध में हर साल कार्यक्रम करते थे। उनके मुताबिक उन्हें देश की संसद पर हमले के दोषी की फांसी की बरसी नहीं मनानी चाहिए थी। दूसरी ओर वामपंथी विचारधारा वाले छात्र व अध्यापक फांसी की सजा को गलत बताते रहे थे और इसका विरोध करते थे।
कोर्ट परिसर में छात्रों व पत्रकारों पर हुआ था हमला
पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया कुमार को 16 फरवरी 2016 को पेश किया जाना था। देश विरोधी नारों के विरोध में राजधानी के वकील लामबंद हो गए थे। सुनवाई शुरू होने से पहले ही वकीलों ने जेएनयू के छात्रों व अध्यापकों से मारपीट व धक्का-मुक्की शुरू कर दी थी। इन लोगों को पुलिस ने किसी तरह बचा कर कोर्ट से बाहर निकाला था। वकीलों ने वहां मौजूद पत्रकारों से भी मारपीट की थी।
नारेबाजी के आठ माह बाद गायब हुआ था नजीब
नारेबाजी के बाद जेएनयू कैंपस का माहौल काफी खराब हुआ था। छात्रों के गुटों के बीच कहासुनी आम बात हो गई थी। नारेबाजी की घटना नौ फरवरी 2016 को हुई थी और इसके आठ महीने बाद पीएचडी का छात्र नजीब अहमद 15 अक्तूबर 2016 को गायब हो गया था। उसके गायब होने के पीछे एबीवीपी के नौ छात्रों का हाथ होने का आरोप लगा था। नजीब की मां फातिमा नफीस व अन्य का आरोप था कि नजीब का एबीवीपी से जुड़े नौ छात्रों से झगड़ा हुआ था।
इस मामले की जांच पहले दिल्ली पुलिस ने की थी। फातिमा नफीस ने याचिका दायर कर नजीब केस की जांच सीबीआई से करवाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सीबीआई को मई 2017 में जांच सौंपी थी। सीबीआई भी करीब दो साल की जांच के बाद भी नजीब को तलाश करने में नाकाम रही थी। हाईकोर्ट की अनुमति के बाद सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी।