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Jharkhand: सोरेन से सोरेन की लड़ाई में क्या झारखंड के हिमंत बिस्व सरमा बन पाएंगे चंपई?
सार
शिबू सोरेन और हेमंत के वफादार कोल्हार टाइगर चंपई सोरेन हाल ही मे झारखंड मुक्ति मोर्चा छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं। भाजपा के पास 81 सदस्यीय विधानसभा में 60 सीटों का लक्ष्य।
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चंपई सोरेन
- फोटो : AMAR UJALA
विस्तार
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के वफादार चंपई सोरेन ने उन्हें झटका दिया तो मुख्यमंत्री ने पूर्वी सिंहभूमि जिले को अहमियत देकर रामदास सोरेन को चंपई वाला रुतबा देने की पहल की है। कैबिनेट मंत्री बनाया। हेमंत के आत्मविश्वास में कोई कमी है। हालांकि, सोरेन से सोरेन की लड़ाई में भाजपा को जहां बड़ी उम्मीद दिखाई दे रही है, वहीं, कांग्रेस पूर्व अध्यक्ष अजोय कुमार इस बारे में टिप्पणी से बच रहे हैं। अजोय ने केवल इतना भर का कहा कि यह झामुमो का मामला है। झारखंड के कांग्रेस के एक और बड़े नेता हैं। केंद्रीय मंत्री रहे हैं। कहते हैं कि चंपई भाजपा के साथ जुडक़र असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा बनना चाहते हैं। मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भाजपा के झारखंड के प्रभारी हैं। उन्होंने असम में चुनाव से कुछ पहले कांग्रेस को छोडक़र भाजपा का दामन थामा था और इस समय राज्य के मुख्यमंत्री हैं। हिमंत ने चंपई को भाजपा से जोडऩे में अहम भूमिका निभाई है। भाजपा की नजर 2024 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में राज्य की 81 में से 60 सीटों को जीतने पर है। 2019 के चुनाव में भाजपा को 24 सीटें मिली थी, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन ने 47 सीटें जीतने में सफलता पाई थी। 2014 में झारखंड में भाजपा की सरकार थी और रघुबर दास (अब उड़ीसा के राज्यपाल) पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बने थे। रघुबर दास को भाजपा के बागी सरयू राय ने हरा दिया था। सरयू राय अब एनडीए के घटक दल जद (यू) के नेता हैं।
कितने दमदार हैं चंपई सोरेन और कैसा रहेगा हेमंत से मुकाबला?
चंपई सोरेन कोल्हार के टाइगर हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, आदिवासियों में गुरू जी के नाम से मशहूर और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के सिपाही हैं। 1991 में सरायकेला विधानसभा उपचुनाव से राजनीतिक कैरियर को ऊंचाई दी थी। शिबू, हेमंत और चंपई संथाल आदिवासी हैं। संथालियों में सबसे बड़े नेता अब भी शिबू सोरेन हैं। उनके बेटे हेमंत सोरेन हैं और राज्य के मुख्यमंत्री हैं। हेमंत सोरेन के भी वफादारों में चंपई भी थे और तभी मुख्यमंत्री ने इस्ताफा देकर अपनी कुर्सी चंपई को सौंपी थी। अभी हेमंत सोरेन चंपई की बगावत को लेकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। कोल्हार क्षेत्र में 14 विधानसभा सीटें आती हैं। इस क्षेत्र में चंपई गुरू जी के दमदार वफादार के रूप में सबको जोड़े रखते थे। क्षेत्र में अच्छी पकड़ रही है। 2019 में 13 सीटें जेएमएम ने इसी भरोसे पर जीती थी। हालांकि, इनमें से चंपई को छोडक़र शेष 12 विधायकों से हेमंत लगातार संवाद कर रहे हैं। एक विधायक ने अमर उजाला से भी कहा कि गुरू जी(शिबू) से विश्वासघात (शिबू) करने वाले को पता चल जाएगा। हेमंत सोरेन के बारे में कहा जा रहा है कि वह खामोश होकर नुकसान की भरपाई करने में जुटे हैं। हेमंत राजनीति को गहराई से समझते हैं। ऐसे में चंपई की हर गतिविधि पर नजर रखकर प्रस्तावित विधानसभा चुनाव की रणनीति बना रहे हैं। कांग्रेस के कोटे से झारखंड में मंत्री ने अमर उजाला को बताया कि चंपई बड़े नेता हैं। उनका असर है, लेकिन शिबू सोरेन और हेमंत से मुकाबले में उनके हाथ कुछ खास नहीं आएगा। बस देखते रहिए। जबकि भाजपा के झारखंड से दिल्ली से आने वाले नेता का कहना है कि चंपई के आने के बाद संथालियों के वोट बंटेंगे। हमें फायदा होगा। कोल्हार क्षेत्र में 41 फीसदी से अधिक आदिवासी हैं और इस बार वहां कमल खिलेगा।
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असल की लड़ाई भाजपा बनाम हेमंत सोरेन की रहेगी
सुनील सन्याल झारखंड से आते हैं। कहते हैं कि झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जेल भेजने को झारखंड मुक्तिमोर्चा ने बड़ा मुद्दा बना रखा है। जनता में हेमंत को इसकी सहानुभूति मिल सकती है। सन्याल कहते हैं कि चंपई का झामुमो को छोडऩा, मंत्री समेत सभी पदों से इस्तीफा देना विश्वासघात करने से जोड़ा जा सकता है। झामुुमो इसे इसी रूप में आदिवासियों के बीच में जा सकती है। भाजपा के रणनीतिकार सब समझ रहे हैं। इसीलिए झारखंड में भाजपा खुलकर बोल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी भाजपा में लौट आए हैं। वह खुलकर कह रहे हैं हेमंत सोरेन कोई स्वतंत्रता संग्राम में जेल नहीं गए थे। बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए थे। उन्हें अदालत से क्लीनचिट नहीं मिली है। भाजपा के सांसद निशिकांत दूबे समेत अन्य भी इसी अंदाज में मोर्चा खोले रहते हैं। सान्याल कहते हैं कि भाजपा की समस्या इस समय दूसरी है। भाजपा के नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पकड़ काफी कमजोर है। दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा हैं। इनका भी जनाधार बहुत अच्छा नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास अब राज्यपाल हैं। इस स्थिति में भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिसकी पूरे झारखंड में और हर तबके में मजबूत पकड़ हो। इसमें चंपई ही मजबूत चेहरा हैं। दूसरी बात, भाजपा को लोकसभा चुनाव 2024 में अकेले 44 प्रतिशत वोट मिला। 14 लोकसभा में 8 भाजपा ने जीत ली है। गैर आदिवासी इलाके में भाजपा का समर्थन बढ़ा है। इसलिए चंपई के पार्टी में आने से भाजपा को कोई नुकसान नहीं है। नुकसान झारखंड मुक्तिमोर्चा को ही होगा। कितना होगा? यह विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेगा।
क्या झारखंड के हिमंत बिस्व सरमा बन पाएंगे चंपई?
विप्लव भाजपा की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि भाजपा दावेदार चेहरे से अलग चेहरे को नेतृत्व सौंपती है। म.प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़ का उदाहरण हमारे सामने है। झारखंड में भी किसी ने रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बारे में नहीं सोचा था। न हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को बनाए जाने की उम्मीद थी। अभी सैनी मुख्यमंत्री हैं। उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी हैं। इनके बारे में भी लोगों के अनुमान गलत साबित हुए थे। भाजपा की दूसरी रणनीति चुनाव से पहले प्रतिद्वंदी दलों के बड़े चेहरे को पार्टी में शामिल कराना है। उ.प्र., म.प्र., राजस्थान,बिहार,महाराष्ट्र समेत हर राज्य में यह ट्रेंड देखने को मिला है। बाहर से आए लोगों को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लेने में संकोच करती है। इसलिए चंपई के झारखंड में हिमंत बिस्व सरमा बन पाने की राह बहुत आसान नहीं है।
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भाजपा के झारखंड के प्रभारी हैं। उन्होंने असम में चुनाव से कुछ पहले कांग्रेस को छोडक़र भाजपा का दामन थामा था और इस समय राज्य के मुख्यमंत्री हैं। हिमंत ने चंपई को भाजपा से जोडऩे में अहम भूमिका निभाई है। भाजपा की नजर 2024 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में राज्य की 81 में से 60 सीटों को जीतने पर है। 2019 के चुनाव में भाजपा को 24 सीटें मिली थी, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन ने 47 सीटें जीतने में सफलता पाई थी। 2014 में झारखंड में भाजपा की सरकार थी और रघुबर दास (अब उड़ीसा के राज्यपाल) पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बने थे। रघुबर दास को भाजपा के बागी सरयू राय ने हरा दिया था। सरयू राय अब एनडीए के घटक दल जद (यू) के नेता हैं।
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कितने दमदार हैं चंपई सोरेन और कैसा रहेगा हेमंत से मुकाबला?
चंपई सोरेन कोल्हार के टाइगर हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, आदिवासियों में गुरू जी के नाम से मशहूर और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के सिपाही हैं। 1991 में सरायकेला विधानसभा उपचुनाव से राजनीतिक कैरियर को ऊंचाई दी थी। शिबू, हेमंत और चंपई संथाल आदिवासी हैं। संथालियों में सबसे बड़े नेता अब भी शिबू सोरेन हैं। उनके बेटे हेमंत सोरेन हैं और राज्य के मुख्यमंत्री हैं। हेमंत सोरेन के भी वफादारों में चंपई भी थे और तभी मुख्यमंत्री ने इस्ताफा देकर अपनी कुर्सी चंपई को सौंपी थी। अभी हेमंत सोरेन चंपई की बगावत को लेकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। कोल्हार क्षेत्र में 14 विधानसभा सीटें आती हैं। इस क्षेत्र में चंपई गुरू जी के दमदार वफादार के रूप में सबको जोड़े रखते थे। क्षेत्र में अच्छी पकड़ रही है। 2019 में 13 सीटें जेएमएम ने इसी भरोसे पर जीती थी। हालांकि, इनमें से चंपई को छोडक़र शेष 12 विधायकों से हेमंत लगातार संवाद कर रहे हैं। एक विधायक ने अमर उजाला से भी कहा कि गुरू जी(शिबू) से विश्वासघात (शिबू) करने वाले को पता चल जाएगा। हेमंत सोरेन के बारे में कहा जा रहा है कि वह खामोश होकर नुकसान की भरपाई करने में जुटे हैं। हेमंत राजनीति को गहराई से समझते हैं। ऐसे में चंपई की हर गतिविधि पर नजर रखकर प्रस्तावित विधानसभा चुनाव की रणनीति बना रहे हैं। कांग्रेस के कोटे से झारखंड में मंत्री ने अमर उजाला को बताया कि चंपई बड़े नेता हैं। उनका असर है, लेकिन शिबू सोरेन और हेमंत से मुकाबले में उनके हाथ कुछ खास नहीं आएगा। बस देखते रहिए। जबकि भाजपा के झारखंड से दिल्ली से आने वाले नेता का कहना है कि चंपई के आने के बाद संथालियों के वोट बंटेंगे। हमें फायदा होगा। कोल्हार क्षेत्र में 41 फीसदी से अधिक आदिवासी हैं और इस बार वहां कमल खिलेगा।
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असल की लड़ाई भाजपा बनाम हेमंत सोरेन की रहेगी
सुनील सन्याल झारखंड से आते हैं। कहते हैं कि झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जेल भेजने को झारखंड मुक्तिमोर्चा ने बड़ा मुद्दा बना रखा है। जनता में हेमंत को इसकी सहानुभूति मिल सकती है। सन्याल कहते हैं कि चंपई का झामुमो को छोडऩा, मंत्री समेत सभी पदों से इस्तीफा देना विश्वासघात करने से जोड़ा जा सकता है। झामुुमो इसे इसी रूप में आदिवासियों के बीच में जा सकती है। भाजपा के रणनीतिकार सब समझ रहे हैं। इसीलिए झारखंड में भाजपा खुलकर बोल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी भाजपा में लौट आए हैं। वह खुलकर कह रहे हैं हेमंत सोरेन कोई स्वतंत्रता संग्राम में जेल नहीं गए थे। बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में जेल गए थे। उन्हें अदालत से क्लीनचिट नहीं मिली है। भाजपा के सांसद निशिकांत दूबे समेत अन्य भी इसी अंदाज में मोर्चा खोले रहते हैं। सान्याल कहते हैं कि भाजपा की समस्या इस समय दूसरी है। भाजपा के नेता और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पकड़ काफी कमजोर है। दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा हैं। इनका भी जनाधार बहुत अच्छा नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास अब राज्यपाल हैं। इस स्थिति में भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिसकी पूरे झारखंड में और हर तबके में मजबूत पकड़ हो। इसमें चंपई ही मजबूत चेहरा हैं। दूसरी बात, भाजपा को लोकसभा चुनाव 2024 में अकेले 44 प्रतिशत वोट मिला। 14 लोकसभा में 8 भाजपा ने जीत ली है। गैर आदिवासी इलाके में भाजपा का समर्थन बढ़ा है। इसलिए चंपई के पार्टी में आने से भाजपा को कोई नुकसान नहीं है। नुकसान झारखंड मुक्तिमोर्चा को ही होगा। कितना होगा? यह विधानसभा चुनाव के बाद पता चलेगा।
क्या झारखंड के हिमंत बिस्व सरमा बन पाएंगे चंपई?
विप्लव भाजपा की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि भाजपा दावेदार चेहरे से अलग चेहरे को नेतृत्व सौंपती है। म.प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़ का उदाहरण हमारे सामने है। झारखंड में भी किसी ने रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बारे में नहीं सोचा था। न हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को बनाए जाने की उम्मीद थी। अभी सैनी मुख्यमंत्री हैं। उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी हैं। इनके बारे में भी लोगों के अनुमान गलत साबित हुए थे। भाजपा की दूसरी रणनीति चुनाव से पहले प्रतिद्वंदी दलों के बड़े चेहरे को पार्टी में शामिल कराना है। उ.प्र., म.प्र., राजस्थान,बिहार,महाराष्ट्र समेत हर राज्य में यह ट्रेंड देखने को मिला है। बाहर से आए लोगों को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लेने में संकोच करती है। इसलिए चंपई के झारखंड में हिमंत बिस्व सरमा बन पाने की राह बहुत आसान नहीं है।