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Jammu-Kashmir: 'G20' को दिखेगा नया कश्मीर, विधानसभा चुनाव से पहले हो सकती है सेना की वापसी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 22 Feb 2023 05:21 PM IST
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सार
Jammu-Kashmir: सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय राइफल्स 'आरआर' के जवानों की संख्या को एक चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सकता है। केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ', जो लंबे समय से आतंकियों और माओवादियों के खिलाफ जारी अभियानों में बढ़ चढ़कर भाग ले रहा है, उसे 'आरआर' जैसी भूमिका में आगे लाए जाने पर विचार हो रहा है...
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Jammu-Kashmir: G20 will see new Kashmir, army may withdraw before assembly elections
Jammu-kashmir: CRPF - फोटो : बासित जरगर

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में 'जी20' के दौरान नया कश्मीर देखने को मिलेगा। सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आने वाले अंतरराष्ट्रीय नेता, घाटी का दौरा करेंगे। संभव है कि इससे पहले जम्मू-कश्मीर से 'आर्मी' के राष्ट्रीय राइफल्स दस्तों को वहां से हटा लिया जाए। सुरक्षा की कमान एवं आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन, यह सब पूरी तरह से 'सीआरपीएफ' और जेकेपी के हवाले हो सकता है। राजनीतिक जानकार एवं सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक सार्थक कदम है। घाटी के हालात तेजी से सुधर रहे हैं। चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत जम्मू-कश्मीर से 'सेना' को हटाए जाने की तैयारी हो रही है। केंद्र सरकार, वैश्विक नेताओं को बताना चाहती है कि घाटी और दूसरे हिस्सों में हालात सामान्य हो चुके हैं। जानकारों का यह भी कहना है कि जम्मू-कश्मीर में जी20 सम्मेलन के बाद या लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं।

'एरिया ऑफ रिस्पांसिबिलिटी' पर हो रहा काम

सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय राइफल्स 'आरआर' के जवानों की संख्या को एक चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सकता है। केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ', जो लंबे समय से आतंकियों और माओवादियों के खिलाफ जारी अभियानों में बढ़ चढ़कर भाग ले रहा है, उसे 'आरआर' जैसी भूमिका में आगे लाए जाने पर विचार हो रहा है। जम्मू-कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ की बटालियनों को 'राष्ट्रीय राइफल्स' के पैटर्न पर 'एरिया ऑफ रिस्पांसिबिलिटी' (एओआर) यानी जिम्मेदारी का क्षेत्र तय करने के लिए कहा गया है। एक्सरसाइज के लिए श्रीनगर से कुछ बटालियनों को 'आरआर' की तैनाती वाले स्थानों पर भेजा जा रहा है। सीआरपीएफ को यह जिम्मेदारी सौंपने का मतलब, 'आंतरिक सुरक्षा ग्रिड' को मजबूती प्रदान करना है। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) बताते हैं, आर्मी को नियमित तौर पर आंतरिक सुरक्षा में नहीं लगाना चाहिए। यहां पर भी आर्मी को रेग्युलर आर्म्स फोर्स के तौर पर नहीं रखा गया। यही प्रयास हुआ कि इंफेंटरी को कम रखेंगे, नॉन फाइटिंग आर्म्स को ही ज्यादा तव्वजो दी जाएगी। आर्मी के टॉप लेवल पर भी कई अवसरों पर यह मुद्दा उठता रहा है कि आंतरिक सुरक्षा में सेना को नहीं आना चाहिए। उसे बॉर्डर पर ही तैनात किया जाए।

सीआरपीएफ, कंट्रोल करने में सक्षम है

बतौर अनिल गौर, सीआरपीएफ को वहां पर कुछ अतिरिक्त बटालियन लगानी होंगी। यह बल आतंकी वारदातों पर नकेल कसने में सक्षम है। लंबे समय से जेके में तैनात है। आतंकियों के खिलाफ नियमित तौर पर चलाए जा रहे ऑपरेशनों में शामिल है। आंतरिक सुरक्षा में इस बल की प्रभावी भूमिका है। आर्मी को उसकी प्राइमरी ड्यूटी यानी बॉर्डर पर ही तैनात किया जाए। मौजूदा परिस्थितियों में 2024 से पहले विधानसभा चुनाव संभव नहीं है। केंद्र सरकार, जी20 के आयोजन से पहले चुनाव कराने के मूड में नहीं है। लोकसभा इलेक्शन के दौरान चुनाव संभव हैं। कई दशकों बाद जेएंडके में ग्राउंड स्थिति बेहतर हुई है। लाल चौक से जन्माष्टमी का जुलूस निकलना छोटी बात नहीं है। भारत जोड़ो यात्रा भी वहां पहुंची है। घाटी के अधिकांश स्कूलों में राष्ट्रीय झंडा फहराया गया।

सीआरपीएफ और जेकेपी, स्थिति को संभाल सकती है

जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डीजीपी एसपी वैद भी मानते हैं कि जम्मू कश्मीर से अगर सेना की वापसी होती है तो वह एक सराहनीय कदम है। घाटी में अब स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है। सीआरपीएफ और जेकेपी, दोनों मिलकर घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को संभाल सकते हैं। जितना जल्द हो, केंद्र सरकार को यह कदम उठाना चाहिए। वैद ने कहा, आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी सीआरपीएफ की है। वह जेकेपी के साथ मिलकर इसे अच्छे से पूरा कर सकती है। दोनों बलों में अच्छा तालमेल है। अब बॉर्डर पर टाइट सिक्योरिटी की आवश्यकता है। अगर वहां से घुसपैठ जीरो हो जाए, तो आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सौ फीसदी पुख्ता बनाने में देर नहीं लगेगी।

मौजूदा समय में जेएंडके में सीआरपीएफ की लगभग 70-80 बटालियन तैनात हैं। इन्हें कई तरह की जिम्मेदारी प्रदान की गई है। कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा में ही करीब 40 कंपनी तैनात हैं। राजौरी क्षेत्र में भी तीन बटालियन ड्यूटी पर हैं। सीआरपीएफ के कंधे पर आंतरिक सुरक्षा ग्रिड को मजबूती प्रदान करने की जिम्मेदारी है। बल ने आतंकियों एवं नक्सलियों के खिलाफ अभियान, कानून व्यवस्था, उत्तर पूर्व के उग्रवाद प्रभावित कई हिस्सों में सफल टास्क और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। सीआरपीएफ को अन्य ड्यूटी की बजाए पूरी तरह से आंतरिक सुरक्षा की तरफ शिफ्ट करना होगा। अपनी नई जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए सीआरपीएफ को कम से कम आठ नई बटालियन खड़ी करनी होंगी।

आतंकियों पर कसा जा रहा है शिकंजा

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ विभिन्न अभियानों में केंद्रीय सुरक्षा बलों को खासी सफलता मिल रही है। जेएंडके में लंबे समय से कश्मीर घाटी एवं दूसरे हिस्सों में 'राष्ट्रीय राइफल्स', सीआरपीएफ और जम्मू कश्मीर पुलिस, ऑपरेशन कर रही हैं। पिछले वर्ष मारे गए कुल आतंकियों की संख्या देखें तो वह 187 थी। साल 2018 में 257, 2019 में 157, 2020 में 221 और 2021 में 180 आतंकी मारे गए थे। आतंकी घटनाओं में 2018 में 39, 2019 में 39, 2020 में 37, 2021 में 41 और 2022 में 31 नागरिक मारे गए थे। इसी तरह सुरक्षा कर्मियों की शहादत का आंकड़ा देखें तो वह साल 2018 में 91, 2019 में 80, 2020 में 62, 2021 में 42 और 2022 में 31 रहा है। आतंकवाद रोधी अभियानों की संख्या 2018 में 100, 2019 में 74, 2020 में 100, 2021 में 95 और 2022 में 111 रही है।

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