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कार्टोसैट रखेगा हर हलचल की जानकारी, आतंकियों का छिपना हुआ नामुमकिन!
एजेंसी, श्रीहरिकोटा।
Updated Fri, 23 Jun 2017 10:09 PM IST
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कार्टोसैट देगा हर गतिविधि की सटीक जानकारी, आतंकियों का छिपना हुआ नामुमकिन!
- फोटो : File Picture
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कार्टोसैट-2 सीरीज का प्रक्षेपित नया उपग्रह रक्षा बलों के लिए समर्पित है जो उनकी निगरानी प्रणाली को और मजबूती देगा। इसरो के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इसकी मदद से आतंकी शिविरों, दुश्मन के बंकरों और उनके ठिकानों की सटीक पहचान की जा सकती है। इसी वजह से इसको ‘अंतरिक्ष में भारत की आंख’ का नाम दिया जा रहा है।
इसरो अधिकारी ने बताया कि कार्टोसैट-2 सीरीज के तीसरे उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही भारत की ‘अंतरिक्षीय नजर’ और ‘अधिक पैनी’ व ‘व्यापक’ होने जा रही है। इस सीरीज के पिछले उपग्रह की विभेदन क्षमता 0.8 मीटर की थी। इससे ली गई तस्वीरों ने पिछले साल नियंत्रण रेखा के पार सात आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने में भारत की मदद की थी।
अधिकारी के मुताबिक अब जो हालिया रिमोट सेंसिंग उपग्रह लॉन्च किया गया है उसकी विभेदन क्षमता 0.6 मीटर बाई 0.6 वर्ग मीटर की है। इसका मतलब यह है कि इसकी क्षमता पहले के इस सीरीज के उपग्रहों से काफी बेहतर है। सूत्रों ने बताया कि जैसे ही यह उपग्रह काम करने लगेगा, उसे रक्षा बलों को सौंप दिया जाएगा। रक्षा बलों के पास अपना सेटअप है, जिसमें कई ग्राउंड स्टेशन और प्रशिक्षित लोग हैं, जो इस सीरीज के उपग्रहों के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं।
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ऐसे करता है काम
कार्टोसैट-2 रिमोट सेंसिंग उपग्रह है। यह सुरक्षा बलों और वैज्ञानिकों को चिह्नित स्थान का हाई रेजोलूशन तस्वीरें और दृश्य उपलब्ध कराता है। उपलब्ध कराई गई तस्वीरों का उपयोग कार्टोग्राफिक एप्लिकेशन के जरिए चिह्नित इलाके का नक्शा बनाने में किया जाता है। यही नहीं तस्वीरों और दृश्यों से डिफेंस सर्विलांस को विशिष्ट ठिकाने की सटीक जानकारी हो जाती है। इन आंकड़ों का इस्तेमाल आतंकियों के कैंप, बंकर्स और सैन्य ठिकानों की पहचान में किया जाता है। इसका इस्तेमाल तटीय भूमि उपयोग, जल वितरण, सड़क नेटवर्क की निगरानी में भी किया जाएगा।
कार्टोसैट की खास बातें...
* यह उपग्रह तस्वीरें और वीडियो दोनों उपलब्ध करा सकता है।
* यह धरती पर मौजूद 0.6 वर्ग मीटर तक की छोटी वस्तुओं की तस्वीरें ले सकता है।
* यह आपदा प्रबंधन से जुड़े अनुप्रयोगों में वैज्ञानिकों के लिए भी मददगार होगा।
* कार्टोसैट-2 श्रृंखला के नए उपग्रह का वजन 712 किलोग्राम है।
* मौसमी उपयोगों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
* भौगोलिक और मानव निर्मित भू-बदलावों की पहचान करने में सक्षम है।
* फसली क्षेत्रों की निगरानी में किया जा सकता है इस्तेमाल।
* 500 किलोमीटर की ऊंचाई से दुश्मन के टैंकों तक की गिनती करने में सक्षम।
स्मार्ट सिटी नेटवर्क की योजनाओं में भी निभा सकता है अहम भूमिका।
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इसरो अधिकारी ने बताया कि कार्टोसैट-2 सीरीज के तीसरे उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही भारत की ‘अंतरिक्षीय नजर’ और ‘अधिक पैनी’ व ‘व्यापक’ होने जा रही है। इस सीरीज के पिछले उपग्रह की विभेदन क्षमता 0.8 मीटर की थी। इससे ली गई तस्वीरों ने पिछले साल नियंत्रण रेखा के पार सात आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने में भारत की मदद की थी।
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अधिकारी के मुताबिक अब जो हालिया रिमोट सेंसिंग उपग्रह लॉन्च किया गया है उसकी विभेदन क्षमता 0.6 मीटर बाई 0.6 वर्ग मीटर की है। इसका मतलब यह है कि इसकी क्षमता पहले के इस सीरीज के उपग्रहों से काफी बेहतर है। सूत्रों ने बताया कि जैसे ही यह उपग्रह काम करने लगेगा, उसे रक्षा बलों को सौंप दिया जाएगा। रक्षा बलों के पास अपना सेटअप है, जिसमें कई ग्राउंड स्टेशन और प्रशिक्षित लोग हैं, जो इस सीरीज के उपग्रहों के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं।
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ऐसे करता है काम
कार्टोसैट-2 रिमोट सेंसिंग उपग्रह है। यह सुरक्षा बलों और वैज्ञानिकों को चिह्नित स्थान का हाई रेजोलूशन तस्वीरें और दृश्य उपलब्ध कराता है। उपलब्ध कराई गई तस्वीरों का उपयोग कार्टोग्राफिक एप्लिकेशन के जरिए चिह्नित इलाके का नक्शा बनाने में किया जाता है। यही नहीं तस्वीरों और दृश्यों से डिफेंस सर्विलांस को विशिष्ट ठिकाने की सटीक जानकारी हो जाती है। इन आंकड़ों का इस्तेमाल आतंकियों के कैंप, बंकर्स और सैन्य ठिकानों की पहचान में किया जाता है। इसका इस्तेमाल तटीय भूमि उपयोग, जल वितरण, सड़क नेटवर्क की निगरानी में भी किया जाएगा।
कार्टोसैट की खास बातें...
* यह उपग्रह तस्वीरें और वीडियो दोनों उपलब्ध करा सकता है।
* यह धरती पर मौजूद 0.6 वर्ग मीटर तक की छोटी वस्तुओं की तस्वीरें ले सकता है।
* यह आपदा प्रबंधन से जुड़े अनुप्रयोगों में वैज्ञानिकों के लिए भी मददगार होगा।
* कार्टोसैट-2 श्रृंखला के नए उपग्रह का वजन 712 किलोग्राम है।
* मौसमी उपयोगों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
* भौगोलिक और मानव निर्मित भू-बदलावों की पहचान करने में सक्षम है।
* फसली क्षेत्रों की निगरानी में किया जा सकता है इस्तेमाल।
* 500 किलोमीटर की ऊंचाई से दुश्मन के टैंकों तक की गिनती करने में सक्षम।
स्मार्ट सिटी नेटवर्क की योजनाओं में भी निभा सकता है अहम भूमिका।