क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम हो रही है मोदी की लोकप्रियता?
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साल 2014 के आम चुनावों में धूमधड़ाके के साथ जीत दर्ज करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सितारा फरवरी 2015 तक जमकर चमका। तब तक जब तक कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में उनके विजय रथ को एक झटके में थाम नहीं दिया। इससे पहले मोदी चार राज्यों में अपने चेहरे के दम पर ही भाजपा की सरकार बनवा चुके थे। दिल्ली में लगा झटका उनके लिए काफी भारी साबित हुआ क्योंकि नौ महीने बाद ही बिहार में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने के उनके मंसूबों पर लालू नीतीश की जोड़ी ने पानी फेर दिया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले साल लगातार विदेशी दौरों से उन्होंने विश्व बिरादरी में अपने दोस्तों की संख्या काफी बढ़ाई और कुछ बड़ी कूटनीतिक सफलताएं भी हासिल कीं। अब घरेलू मोर्चे पर एक साथ कई मुद्दों से जूझ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कम होती नजर आ रही है।
इसकी एक बानगी प्रतिष्ठित फॉर्च्यून पत्रिका के ताजा अंक में देखने को मिली। पत्रिका ने विश्व के 50 ग्रेटेस्ट लीडर्स की सूची में से मोदी को बाहर कर दिया है। मोदी की साख के लिए यह दोहरा झटका है क्योंकि इसी सूची में वह बीते साल पांचवें स्थान पर थे। साख का सवाल इसलिए भी है दिल्ली में उन्हें पटखनी देने वाले केजरीवाल ने सालभर के अंदर ही इस लिस्ट में जगह बना ली है। दिल्ली को प्रदूषण और जाम से मुक्त करने के लिए ऑड इवन का फार्मूला लागू करने वाले केजरीवाल को अपने इस निर्णय के कारण लिस्ट में जगह दी गई है। लेकिन मोदी क्यों बाहर हुए यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आइए करते हैं उन कारणों की एक पड़ताल।
बिहार चुनावों में करारी हार ने बदला माहौल
मोदी के विरोधी उन पर आरोप लगाते हैं कि वो सालभर चुनावी मोड़ में रहते हैं। इसकी एक वजह भी है सत्ता में आने के बाद से वह आधा दर्जन से ज्यादा चुनावों में अपनी पार्टी का चेहरा बन चुके हैं जिनमें से चार में पार्टी या उसके सहयोग से सरकार भी बनी। लेकिन पहले दिल्ली और फिर बिहार में उनका यह विजय रथ पटरी से उतर गया। बिहार चुनावों में जिस तरह से मोदी के भरसक प्रयास के बाद भी लालू-नीतीश की जोड़ी ने उन्हें पटखनी दी इससे मोदी की साख को तगड़ा धक्का लगा। मोदी ने जिस तरह से बिहार की जनता के लिए सवा लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की उसके बाद भी लोगों का उन पर विश्वास न करना उनकी साख पर ही सवाल खड़े करता है। जबकि इसी साख और वादों के बीच मोदी ने लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की थी।
बीफ और बिसाहड़ा ने भी बिगाड़ी छवि
बिहार चुनाव से पहले ही बीफ और बिसाहड़ा के इखलाक की हत्या ने मोदी विरोध की हवा तैयार कर दी। एक तरफ गाय, घर वापसी और लव जिहाद के बहाने उग्र हिंदुत्व मोर्च की भूमिका तैयार हो रही थी तो दूसरी ओर इसके विरोध में असहिष्णुता और आरक्षण के मुद्दे को हवा दी जा रही थी। मोदी दोनों को ही समझने और थामने में नाकाम रहे। नतीजतन हिंदुत्व के मुद्दे पर भी वह सरकार का रुख स्पष्ट नहीं कर सके और सरकार को आलोचनाएं झेलनी पड़ी तो असहिष्णुता के मुद्दे पर वह देश दुनिया के बुद्धिजीवियों के निशाने पर आ गए। इससे देश में पहली बार अवार्ड वापसी का एक अभियान सा शुरू हो गया। मोदी चाहकर भी हिंदुत्व की आग नहीं थाम सके।
विदेशी मीडिया ने भी खड़े किए सवाल
दिल्ली में सरकार बनाने के बाद भारतीय मीडिया ने तो मोदी की तारीफों के पुल बांधे ही थे विदेशी मीडिया ने भी उन्हें हाथों हाथ लिया था। बड़े अखबारों और मीडिया हाउस ने मोदी की सफलता पर खूब कलम घिसी थी। लेकिन यह जादू जल्द ही टूटता नजर आया जब पहले असहिष्णुता फिर रोहित वेमुला की मौत पर मोदी जल्द ही विदेशी मीडिया के सवालों के घेरे में आ गए। रही सही कसर जेएनयू प्रकरण ने पूरी कर दी जहां छात्रसंघ के एक नेता ने मोदी की पूरी सत्ता को ही चुनौती दे डाली।
इन मुद्दों पर सरकार ने जिस तरह का लचर रवैया अपनाया उससे उसने दूसरों को खुद पर सवाल खड़े करने का अवसर दे दिया। विदेशी मीडिया ने भी सरकार के इस रुख पर आपत्ति जाहिर की। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और गार्जियन जैसे प्रमुख अखबारों ने धार्मिक आजादी, बीफ, असहिष्णुता का मुद्दा पर लगातार सरकार पर सवाल खड़े किए तो जेएनयू प्रकरण पर तो उसे आलोचना का भी सामना भी करना पड़ा।