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क्या सरकार को पहचान पत्र मांगने का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
एजेंसी, नई दिल्ली
Updated Wed, 14 Feb 2018 04:39 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सवाल किया कि नागरिकों की पहचान के आधार पर ही यदि किसी योजना का लाभ दिया जा सकता है तो क्या सरकार को नागरिकों से पहचान पत्र दिखाने की मांग करने का अधिकार नहीं है।
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मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने यह भी कहा कि आधार योजना के पीछे यही मकसद हो सकता है कि लोगों के पास एक पहचान पत्र हो। पीठ ने सवाल किया, ‘जब आपकी पात्रता इसी बात पर निर्भर करती हो कि आप कौन हैं तो फिर क्या सरकार इसके लिए प्रमाण नहीं मांग सकती? क्या यह उचित नहीं है।’
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पीठ आधार योजना की संवैधानिक वैधता और इससे जुड़े 2016 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस एके सिकरी, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भान भी शामिल हैं। पीठ ने कहा कि यदि पात्रता निर्विवाद हो तो आपकी पहचान का प्रमाण दिखाने का एक न्यूनतम साधन तो होना ही चाहिए। यदि आपको संवैधानिक अधिकार से वंचित रखने के लिए इस पहचान की मांग की जाती है तब यह असंवैधानिक है।
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शीर्ष अदालत में उस व्यक्ति की प्रारंभिक स्थिति पर सवाल किया गया था कि जो नागरिक तो है लेकिन आधार कार्डधारक नहीं है। पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि नागरिकों को अपनी पहचान का प्रमाण देने या नहीं देने का विकल्प होना चाहिए। पहचान के प्रमाण को उस व्यक्ति की स्थिति से जोड़ा जाना चाहिए जिसके लाभ की पात्रता वह रखता है।
उन्होंने उदाहरण देकर पीठ को बताया कि यदि कोई महिला विधवा पेंशन की पात्रता रखती है तो उसे इसका लाभ देने के लिए उसकी स्थिति ही उसकी पात्रता है न कि उसका पहचान पत्र। सरकार उसे सिर्फ आधार के जरिये अपना पहचान प्रमाण दिखाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है।
उन्होंने अदालत को बताया, ‘मुझे अपनी नागरिकता का पहचान साबित करने के अलग-अलग विकल्प हो सकते हैं। आधार मेरी स्थिति तय नहीं कर सकता। यदि आपके पास कोई और पहचान प्रमाण नहीं है तो आप पहली बार आधार भी नहीं बनवा सकते हैं। इस मामले में अदालत जो भी फैसला करेगी वह मेरे, मेरे बच्चों, उनके बच्चों और भविष्य में जन्म लेने वाले बच्चों से जुड़ा होगा। हमारी मौलिक पहचान यही है कि हम भारत के नागरिक हैं। आधार कानून उसी तरह का है जैसे कोई व्यक्ति जब तक खुद को निर्दोष साबित न कर दे, उसे अपराधी ही माना जाएगा।’
चीफ जस्टिस ने सिब्बल से कहा कि आपसे एक मौलिक अधिकार के बदले दूसरा मौलिक अधिकार समर्पण करने या बदलने के लिए नहीं कहा जा सकता। इसके बाद एक अन्य वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि आधार योजना व्यक्ति को डिजिटल बनाने के लिए उसके सम्मान, स्वतंत्रता और और समानता का उल्लंघन करती है। मामले की अगली सुनवाई अब 15 फरवरी को होगी।