क्या छल और निष्ठा में भेद नहीं कर पा रहा है गांधी परिवार?
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आपको ध्यान होगा कि 15 सितंबर 2014 को कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने सोनिया गांधी के नाम एक पत्र लिखा था। हालांकि इस पत्र में उनके इस्तीफे का जिक्र था, लेकिन उसमें एक लाइन ऐसी भी थी, जिसका मजमून था कि कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। द्विवेदी ने लिखा, 'ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सबको छल और निष्ठा में भेद करने का विवेक दे।'
तब से लेकर अब तक कांग्रेस पार्टी अपना जनाधार खोती जा रही है। लोकसभा की हार के बाद राहुल गांधी का इस्तीफा प्रकरण अभी तक चल रहा है। पार्टी को न तो नया अध्यक्ष मिल रहा है और न ही कोई यह बताने को तैयार है कि पार्टी किसके निर्देशन में चल रही है। दूसरी ओर कर्नाटक के सियासी संकट के बाद अब गोवा के कांग्रेसी विधायक भी भाजपा के पाले में चले गए हैं।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि द्विवेदी ने जब यह पत्र लिखा था तो उस वक्त भी कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। लगातार 10 साल तक सरकार में रहने के बाद कांग्रेस को हार का मुंह का देखना पड़ा। उस वक्त भी पार्टी की हार के लिए कांग्रेसियों ने एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ना शुरु कर दिया। द्विवेदी ने अप्रत्यक्ष तौर से सोनिया गांधी के करीबियों पर निशाना साधा था।
उनका कहना था कि कुछ ऐसे नेता हैं जो अपने स्वार्थवश सोनिया गांधी को घेरे रहते हैं। उनकी निष्ठा न तो कांग्रेस के प्रति है और न ही वे गांधी परिवार का भला चाहते हैं। ये केवल छल के आधार पर गांधी परिवार के करीबी बने हुए हैं। द्विवेदी की वे बातें 2019 में भी सही साबित हो रही हैं। टिकट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति बनाने तक, हर जगह छल और निष्ठा जैसा कुछ दिख रहा है।
चौकीदार चोर है, का नारा सुझाया गया, लेकिन भाजपा ने उसे किस तरह पलटा, इसका असर चुनावी नतीजों में देखने को मिला। पुराने कांग्रेसियों ने कार्यकर्ताओं को टिकट दिलाने की बजाए अपने अपने पुत्रों को आगे खड़ा कर दिया। लड़-झगड़ कर टिकट भी दिला दिया, मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा, एक दो पुत्रों को छोड़कर बाकी सब हार गए।
नए अध्यक्ष का न मिलना, क्या यहां पर भी छल और निष्ठा आड़े आ गई?
कांग्रेस पार्टी को नया अध्यक्ष क्यों नहीं मिल पा रहा है, इस पर पार्टी के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर भी सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह ने कहा, इसके लिए कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में यह बैठक हो। इसी में पार्टी के नए अध्यक्ष के नाम पर फैसला किया जाए।
भाजपा खेमे की ओर से भी हर दो-तीन दिन में कोई न कोई बयान आ जाता है। इसमें कहा जाता है कि कांग्रेस अपना घर संभाले। दो दिन पहले जनार्दन द्विवेदी भी बड़ी सहजता के साथ इस मामले में कूद गए। उन्होंने कहा, तकनीकी रूप से राहुल गांधी अभी भी कांग्रेस अध्यक्ष हैं। उन्हें इस्तीफा देने से पहले अपने उत्तराधिकारी का नाम सुझाने के लिए एक समिति का गठन करना चाहिए था।
हालांकि उन्होंने राहुल गांधी के इस्तीफे को अन्य कांग्रेसी नेताओं के लिए एक आदर्श बताया। जनार्दन द्विवेदी ने भी जल्द से जल्द सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाने की बात कही है। उन्होंने कहा, कांग्रेस पार्टी की हार का कारण भीतर है, बाहर नहीं। द्विवेदी की यही बात भले ही कुछ वरिष्ठ नेताओं को चुभन का अहसास दे गई हो, मगर उनके पत्र में लिखी छल और निष्ठा में भेद की बात को एक फिर से दोहरा गई। कांग्रेस पार्टी के अधिकांश नेता राहुल गांधी को अध्यक्ष पद पर देखना चाहते हैं तो वहीं कई नेता गैर गांधी को पार्टी की कमान सौंपने के पक्ष में हैं।