क्या अफगानिस्तान में शुरू हो गया गृह युद्ध, तालिबान और सरकार के सुरक्षा बल आमने-सामने
सुरक्षा और रणनीतिक मामले के जानकारों का कहना है कि अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों और तालिबान के बीच में यह आमने-सामने की लड़ाई की स्थिति ठीक नहीं है। इससे आगे न केवल शांति वार्ता प्रभावित होगी, बल्कि सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ती जाएंगी...
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क्या तालिबान के साथ शांति वार्ता पटरी से उतर गई है? क्या अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की शुरुआत हो गई? वहां के ताजा हालात तो कुछ इसी तरह की गवाही दे रहे हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को अब यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि पाकिस्तान ने तालिबान को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया है। इस समर्थन के बूते तालिबान के लड़ाके अब राष्ट्रपति अब्दुल गनी के नेतृत्व वाली सरकार के सुरक्षा बल से मोर्चा ले रहे हैं। उनके निशाने पर अफगानिस्तान के गांव और कस्बाई क्षेत्र के बाद देश के शहर हैं। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का भी कहना है कि धीरे-धीरे अफगानिस्तान में जटिलता बढ़ रही है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने भी अफगानिस्तान को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। बागची ने कहा कि अफगानिस्तान के साथ भारत का रिश्ता बृहद सोच और विकास, साझेदारी पर आधारित है। 2011 से भारत, अफगानिस्तान का रणनीतिक साझीदार देश है। हम वहां की सरकार, अफगानिस्तान की जनता, उनके हित, उम्मीद और शांतिपूर्ण, समृद्ध तथा भविष्य के अफगानिस्तान का समर्थन करते हैं। बागची ने कहा कि भारत अफगानिस्तान के हालात, सुरक्षा चिंता समेत तमाम पहलुओं पर गंभीरता से निगाह रख रहा है। बागची ने भी माना कि अफगानिस्तान में हिंसा और सुरक्षा की चिंता दोनों बढ़ी हैं।
लश्करागाह समेत अन्य हिस्से में जारी है संघर्ष
तालिबान ने काबुल में अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन वह बाल-बाल बच गए। इसी तरह से हेलमंद प्रांत के लश्करागाह में अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों के साथ भीषण जंग जारी है। अफगानिस्तान की सेना ने तालिबानी लड़ाकों पर हवाई हमले करके उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया है। जवाब में तालिबान ने भी रणनीति को बदलते हुए गुरिल्ला युद्ध पद्धति से जवाब देने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। सुरक्षा और रणनीतिक मामले के जानकारों का कहना है कि अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों और तालिबान के बीच में यह आमने-सामने की लड़ाई की स्थिति ठीक नहीं है। इससे आगे न केवल शांति वार्ता प्रभावित होगी, बल्कि सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बढ़ती जाएंगी। अफगानिस्तान में काफी समय तक रहकर लौटे सूत्र का कहना है कि तालिबान के साथ टकराव की यह स्थिति दक्षिण एशिया में सुरक्षा की चिंताओं को काफी बढ़ा सकती है।
यही तो गृह युद्ध है
विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि यही तो गृह युद्ध है। वहां तालिबान के लड़ाके प्रोफेशनल तरीके से अफगानिस्तान की सेना को जवाब दे रहे हैं। गंभीर सवाल यह भी है कि तालिबान के पास इतने खतरनाक हथियार आए कहां से? एसके शर्मा कहते हैं कि आतंकवादी के पास असाल्ट राइफल आदि हो सकती है। लेकिन तालिबानियों के पास हैवी मशीनगन और बड़े हथियार हैं। यह बिना किसी देश की सीधी मदद के संभव नहीं है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान के पास तालिबानियों से निपटने के लिए हवाई हमले की भी पर्याप्त क्षमता नहीं है। उनके पास चार के करीब हेलीकाप्टर हैं। उनके पास कुछ संसाधन अमेरिका सेना द्वारा छोड़े गए हैं। केवल इतने के बल पर तालिबान के लड़ाकों का मुकाबला मुश्किल लग रहा है।