International Tiger Day: यूं ही नहीं कहते राष्ट्रीय पशु बाघ को 'धारीदार भिक्षु', जानें टाइगर की यह अनोखी खूबी
International Tiger Day: आईएफएस अधिकारी रमेश पांडेय का कहना है कि देश के लोगों को बाघों के प्रति बनाई गई खूंखार जानवर की छवि को बदलना ही होगा। क्योंकि वास्तव में बाघ न तो आदमखोर हैं और न ही वह खूंखार जानवर है...
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अगर अचानक हमारे और आपके सामने कोई बाघ आ जाए तो इसकी कल्पना करके ही रूह कांप जाती है। बाघ की एक बनी बनाई खूंखार तस्वीर आंखों के सामने छा जाती है और उसके बाद ऐसा लगता है कि भारत का राष्ट्रीय पशु न सिर्फ आदमखोर होकर हमला कर देगा बल्कि जान भी ले लेगा। लेकिन हकीकत में बाघ के साथ ऐसा नहीं है। आईएफएस अधिकारी रमेश पांडेय देश के बड़े टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट इलाके में बाघों के साथ तकरीबन डेढ़ दशक से ज्यादा का वक्त गुजार चुके हैं, उनका कहना है कि देश के लोगों को बाघों के प्रति बनाई गई खूंखार जानवर की छवि को बदलना ही होगा। क्योंकि वास्तव में बाघ न तो आदमखोर हैं और न ही वह खूंखार जानवर है। टाइगर मैन के नाम से जाने जाने वाले रमेश पांडे ने देश के बाघों के कुनबे को बढ़ाने में बड़ा योगदान भी दिया है।
"बाघ न तो आदमखोर है और न ही वह लोगों पर हमला करता है"
रमेश पांडे कहते हैं कि दुधवा नेशनल पार्क, पीलीभीत टाइगर रिजर्व पार्क और कतर्नियाघाट जैसे टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त तक करीब से उन्होंने बाघों के व्यवहार को नजदीकी से देखा है। उनका कहना है कि इस बात की पुष्टि हुई कि बाघ न तो आदमखोर है और न ही वह लोगों पर हमला करता है। वे कहते हैं कि अपने डेढ़ दशक से ज्यादा के घने जंगलों में काम करने के दौरान सैकड़ों फॉरेस्ट गार्ड और अधिकारियों ने बाघ को अपने बहुत करीब से न सिर्फ देखा है, बल्कि उनके लिए शेल्टर भी तैयार किया है। वह कहते हैं कि अगर बाघ इतना ही खूंखार होता तो वन विभाग के हर कर्मचारी अधिकारी और सुरक्षाकर्मी शायद जंगल में रहकर टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट इलाके में काम नहीं कर पाते।
वह बताते हैं कि बाघ का व्यवहार आक्रामक नहीं होता है। उनका कहना है कि देश के जितने टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट इलाके हैं वहां पर काम करने वाले सभी अधिकारी और कर्मचारियों समेत सुरक्षाकर्मी इस बात को न सिर्फ स्वीकार करते हैं बल्कि वह मानते हैं कि बाघ की बनी हुई आक्रामक छवि को बदलना चाहिए। उनका कहना है लोगों के मन-मस्तिष्क में बाघ की छवि आक्रामक बनी हुई है, इसीलिए जब वह उसको देखते हैं तो उसी तरीके से उसके साथ पेश आते हैं। रमेश पांडे कहते हैं कि घने जंगलों में दिन या रात की गश्त के दौरान कभी किसी सुरक्षा कर्मी ने इस बात की शिकायत नहीं की कि बाघ को देखने पर उसने हमला कर दिया। बल्कि यही बताया गया कि बाघ सुरक्षाकर्मियों को देखकर या तो जंगल की ओर चला गया या फिर वन कर्मियों द्वारा बनाए गए सेंटर में घुस गया।
रमेश पांडे कहते हैं कि इस वक्त देश में टाइगर की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए अब ज़रूरी है कि देश के लोगों को बाघों के प्रति अपनाए जाने वाले व्यवहार और उसको देखकर किए जाने वाले रिएक्शन को भी बदलना चाहिए। वे कहते हैं कि देश में बाघों के हमलों पर शोध के दौरान यह पाया गया कि ज्यादातर में हमले की वजह उसका अपना व्यक्तिगत व्यवहार नहीं बल्कि क्रिया के बदले प्रक्रिया के तौर पर हुआ हमला ही सामने आया है। हालांकि उनका कहना है कुछ मामलों में जानवर अपना व्यवहार बदल देते हैं उसी तरीके से बाघ भी अपना व्यवहार बदलते हैं, लेकिन उसका प्रतिशत बहुत कम होता है। डेढ़ दशक के दौरान बाघों के साथ करीब से रहकर अध्ययन करने वाले रमेश पांडे कहते हैं बाघ की मानसिकता अकेले में रहने की होती है।
बाघों के नेचुरल हैबिटेट को प्रोटेक्ट किया गया
उत्तर प्रदेश में इस वक्त पीलीभीत टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में बाघों की संख्या तकरीबन 70 के करीब हो चुकी है। जबकि इसी इलाके के कतर्नियाघाट में भी बाघों की संख्या भी तकरीबन इतनी ही है। एक वक्त था जब कतर्नियाघाट में तो बाघों की संख्या महज एक या दो हुआ करती थी। इस वक्त तकरीबन दो सौ किलोमीटर लंबे कतर्नियाघाट, दुधवा नेशनल टाइगर पार्क और पीलीभीत टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में तकरीबन 300 बाघ हैं। बाघों के इस कुनबे को बढ़ाने के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भारतीय वन सेवा के अधिकारी रमेश पांडे के प्रयासों की सराहना भी की। वह कहते हैं कि बाघों की संख्या बढ़ी है। इसके लिए कई बिदुंओं पर काम किया गया है। सबसे पहले बाघों के कुनबे को बढ़ाने के लिए यह प्रयास किया गया कि जंगल के इलाके में बेवजह लोगों का हस्तक्षेप न हो। जंगलों का जो मूल स्वरूप है उसमें किसी भी तरीके की छेड़छाड़ का मतलब जानवरों की कमी ही होती है। वे कहते हैं उन्होंने बाघों के कुनबे को बढ़ाने के लिए जंगल के स्वरूप को जस का तस रहने के साथ-साथ उनके नेचुरल हैबिटेट को प्रोटेक्ट किया गया। ताकि बाघों की ब्रीडिंग हो सके, और नतीजा सबके सामने है। इस वक्त पूरे देश में तकरीबन तीन हज़ार के करीब टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट में बाघों की संख्या है। जो कि लगातार बढ़ रही है।
रमेश पांडे कहते हैं कि तराई के इलाकों में की जाने वाली एम स्ट्राइप सॉफ्टवेयर के माध्यम से जंगलों में बेहतर तरीके से काम्बिंग की गई। नतीजा हुआ कि इस प्रक्रिया को देश के सभी राज्यों में अपनाया गया। इस प्रक्रिया में जंगलों में काम्बिंग करने वाले कर्मचारियों की न सिर्फ रुटीन पता चलती थी बल्कि उनके द्वारा किए जाने वाले काम्बिंग का पूरा हिसाब-किताब भी रखा जाता था। वन कर्मियों की लगातार होने वाली काम्बिंग से जंगलों में बाहरी लोगों के न सिर्फ प्रवेश बंद हुए, बल्कि जानवरों की ब्रीडिंग भी बढ़नी शुरू हुई। ऐसे तमाम प्रयासों को अपनाकर देश में बाघों की संख्या ही नहीं बल्कि अन्य जानवरों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है।