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International Tiger Day 2020: भारत में पांच गुना और बढ़ सकता है बाघों का कुनबा

Wed, 29 Jul 2020 04:26 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली
अमर उजाला रिसर्च टीम, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 29 Jul 2020 04:26 AM IST
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International Tiger Day 2020, Tigers can grow five times more in india
International tiger day 2020 - फोटो : pixabay

दुनिया के 70 फीसदी बाघों का घर भारत उनकी संख्या को पांच गुना तक और बढ़ा सकता है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, अधिक संरक्षित आवास के निर्माण, सुरक्षित गलियारे और संसाधनों पर खर्च के जरिये देश 10-15 हजार बाघों को रखने में सक्षम है।

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उनका कहना है कि हमें बाघों की घनी आबादी वाले कुछेक इलाकों पर ही ज्यादा ध्यान न देकर अन्य संभावित क्षेत्रों के विकास पर भी जोर देना चाहिए। वरना अभी की तरह 50 टाइगर रिजर्वों में से केवल 10 से 12 में ही बाघों की संख्या अधिक बनी रहेगी और बाकी पिछड़ते चले जाएंगे।
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विशेषज्ञों का कहना है कि अभी देशभर में बाघों के आवास गलियारों को हाईवे, सड़कों, बिजली लाइनों और खनन जैसी गतिविधियों से भारी खतरा रहता है। लिहाजा, सरकारों को विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की नीति को ज्यादा तवज्जो देनी होगी।
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सरकार द्वारा पेश किए 2018 की सर्वे रिपोर्ट में भी कहा गया है कि बाघों के अधिकांश आवासीय गलियारे संरक्षित क्षेत्र नहीं हैं। बढ़ते मानवीय उपयोग और विकास परियोजनाओं के कारण इनमें गिरावट आ रही है।

आवास का दायरा बढ़ाने की काफी गुंजाइश
ताजा सर्वे रिपोर्ट बताती है कि देश में करीब 3.81 लाख वर्ग किमी क्षेत्र बाघों के लिए उपयुक्त है, जबकि करीब 90 हजार वर्ग किमी क्षेत्र में ही बाघों की मौजूदगी है। यानी बाघों के आवास का दायरा बढ़ाने की काफी गुंजाइश है, जिससे इनकी तादाद में खुद ब खुद इजाफा होगा।

जानकारों के अनुसार, फिलहाल बाघ की भौगोलिक सीमा और गैर-संरक्षित जंगलों के प्रबंधन में भारत का प्रदर्शन ठीक नहीं है। बाघ संरक्षण की असली सफलता तब होगी, जब पिछली सदी की तरह देशभर के जंगलों में बाघों का राज हो।

पड़ोसियों के साथ साझेदारी की जरूरत
सरकार को बाघों में इजाफे के लिए बांग्लादेश, भूटान, इंडोनेशिया, मलयेशिया, थाईलैंड और कंबोडिया जैसे देशों के साथ साझेदारी करनी चाहिए। बांग्लादेश के साथ मिलकर काम करने से जलवायु परिवर्तन के  कारण सुंदरबन क्षेत्र में मंडरा रहे खतरे से रॉयल बंगाल टाइगर को बचाया जा सकता है।

कई देशों की रुचि

बाघ सिर्फ भारत ही नहीं, कई और देशों में भी आस्था का प्रतीक है। मलयेशिया और बांग्लादेश का भी राष्ट्रीय पशु बाघ ही है। चीनी संस्कृति में बाघ वर्ष (टाइगर ईयर)  मनाया जाता है।

बाघ खुश तो जैव विविधता खुशहाल
वन पारिस्थितिकी तंत्र में बाघ की सबसे अहम भूमिका है। विशेषज्ञ इसे वेल-वैदर वन्यजीव मानते हैं। यानी अगर जंगल में बाघ स्वस्थ और सुरक्षित है तो वहां की जैवविविधता भी खुशहाल होगी। भारत में बाघों की बढ़ती संख्या अच्छी जैवविविधता की निशानी है। इसका मानव जीवन पर भी अच्छा असर पड़ता है।

100 साल पहले थे एक लाख बाघ
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के अनुसार, दुनियाभर में पिछले साल तक 3,900 बाघ थे। 20वीं सदी की शुरुआत से बाघों की 95 फीसदी आबादी खत्म हो गई है। वाइल्डलाइफ फंड का अनुमान है कि 100 साल पहले धरती पर एक लाख बाघ थे। 1947 में अनुमानित तौर पर देश में बाघों की संख्या करीब 40,000 थी।

93 फीसदी बाघों के प्राकृतिक आवास खत्म
दुनियाभर में बाघों की आबादी कम होने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनके प्राकृतिक आवास का सीमित होना रहा है। एक अनुमान के अनुसार, विश्वभर में बाघों ने अपना करीब 93 फीसदी प्राकृतिक आवास गंवा दिया है।

औद्योगिकीकरण और विकास के नाम पर मानव ने जंगलों को नष्ट किया है। साथ ही वनों और घास के मैदानों का कृषि जरूरतों के लिए उपयोग होने लगा है। इसके चलते मानव और बाघ संघर्ष भी बढ़ा है। अकसर इंसानी क्षेत्र में बाघों के हमले की खबरें आती हैं, लेकिन असल में हम ही उनके क्षेत्र में घुसे हैं।

भारत ने 4 साल पहले ही हासिल किया लक्ष्य

2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में बाघों के संरक्षण के लिए सालाना अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाने का निर्णय हुआ था। तब से हर साल दुनियाभर में यह आयोजित किया जाता है। इस सम्मेलन में भारत समेत 13 देशों ने हिस्सा लिया था और 2022 तक बाघों की तादाद में दोगुनी बढ़ोतरी करने का लक्ष्य रखा गया था। भारत ने 2018 में ही अपना वादा निभाते हुए बाघों की तादाद दोगुनी कर ली है। तब भारत में 2,967 बाघों की मौजूदगी मिली।

35% बाघ अभी संरक्षित क्षेत्र से बाहर
2018 टाइगर रिपोर्ट के अनुसार, अभी कुल 2,967 बाघों में से 1,923 यानी 65 फीसदी बाघ ही संरक्षित क्षेत्र में हैं। शेष 35 फीसदी इनके दायरे से बाहर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में संरक्षित रिजर्व क्षेत्रों का समुचित इस्तेमाल न होने के कारण बाघ बाहर रहने को मजबूर हैं। इसके चलते लगातार मानव और बाघ के बीच संघर्ष भी बढ़ रहे हैं।

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