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Supreme Court News: अदालत ने कहा- बीमा अनुबंध होते हैं एकतरफा, उपभोक्ता के पास होते हैं बहुत कम विकल्प

Wed, 09 Nov 2022 10:58 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Wed, 09 Nov 2022 10:58 PM IST
सार

अदालत ने कहा कि उपभोक्ता को अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाता है। उसके पास बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर करने के अलावा अनुबंध की शर्तों पर बातचीत करने के लिए बहुत कम विकल्प होता है।

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Insurance contracts have very little option for consumers except to sign on dotted lines: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि बीमाकर्ता द्वारा तैयार किए गए बीमा अनुबंधों में उपभोक्ता के लिए बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर करने के अलावा बहुत कम विकल्प होते हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने यह टिप्पणी राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के उस आदेश को खारिज करते हुए की जिसमें एक दुकान में आग लगने की घटना के लिए मुआवजे की मांग की गई थी। 

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अदालत ने कहा, बीमा के अनुबंध बीमाकर्ता द्वारा एक मानक प्रारूप के साथ तैयार किए जाते हैं, जिस पर उपभोक्ता को हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाता है। उसके पास बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर करने के अलावा अनुबंध की शर्तों पर बातचीत करने के लिए बहुत कम विकल्प होता है। बीमाकर्ता, जो प्रमुख पक्ष होने के नाते अपनी शर्तों को निर्धारित करता है, इसे उपभोक्ता पर छोड़ देता है। ऐसे अनुबंध स्पष्ट रूप से एकतरफा होते हैं, उपभोक्ता की कमजोर सौदेबाजी की शक्ति के कारण बीमाकर्ता के पक्ष में होते हैं। 
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शीर्ष अदालत ने कहा कि बीमा के अनुबंध में अनुबंध की स्वतंत्रता की अवधारणा महत्व खो देती है। ऐसे अनुबंध निष्पक्षता के सिद्धांत के विभिन्न पहलुओं के रूप में बीमाकर्ता की ओर से बहुत उच्च स्तर की विवेक, सद्भावना, प्रकटीकरण होना चाहिए। इस मामले में अपीलकर्ता टेक्सको मार्केटिंग प्रा. लिमिटेड ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से एक पॉलिसी हासिल की और इसका उद्देश्य इमारत के बेसमेंट में स्थित एक दुकान को कवर करना था। हालांकि, अनुबंध के एक खंड में निर्दिष्ट किया कि यह बेसमेंट को कवर नहीं करता है। दुकान का उचित निरीक्षण किया गया था और न केवल अपीलकर्ता की इस दुकान, बल्कि इसी तरह स्थित एक अन्य दुकान का भी बीमाकर्ता द्वारा बीमा किया गया था।
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क्या न्यायमूर्ति बेदी समिति की रिपोर्ट पर किसी निर्देश की जरूरत है?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उसे यह गौर करने की जरूरत है कि क्या न्यायमूर्ति एच. एस. बेदी समिति द्वारा दायर रिपोर्ट पर कोई और निर्देश जारी करने की आवश्यकता है। समिति ने 2002 से 2006 के बीच गुजरात में कथित फर्जी मुठभेड़ों के कई मामलों की जांच की थी। न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की पीठ दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार बी. जी. वर्गीज और गीतकार जावेद अख्तर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच का अनुरोध किया गया है। 

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि इस मामले में कुछ भी नहीं बचा है क्योंकि रिपोर्ट सौंप दी गई है। पीठ ने कहा कि सिर्फ एक चीज यह है कि क्या रिपोर्ट के संबंध में कोई निर्देश पारित करने की जरूरत है। हम इस मामले को जनवरी, 2023 में सूचीबद्ध करेंगे ताकि यह देखा जा सके कि रिपोर्ट के संबंध में कोई और निर्देश जारी किया जाना है या नहीं। मेहता ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ता गुजरात के नहीं हैं और यह देखने की जरूरत है कि क्या ऐसे मामले में रिट याचिका दायर की जा सकती है। पीठ ने कहा कि अब काफी पानी बह चुका है और यह सवाल शुरुआत में उठना चाहिए था।

मेहता ने कहा कि याचिका में याचिकाकर्ताओं ने कथित फर्जी मुठभेड़ों को लेकर एक विशेष राज्य और एक विशेष राजनीतिक दल के कार्यकाल को निशाना बनाया है। पीठ ने कहा कि वर्गीज अब नहीं रहे और इसलिए मामले को यहीं पर छोड़ दिया जाना चाहिए। बेदी समिति का गठन 2019 में किया गया था। समिति ने जांचे गए 17 में से तीन मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की थी। उच्चतम न्यायालय में दाखिल अपनी अंतिम रिपोर्ट में न्यायमूर्ति बेदी ने कहा था कि गुजरात पुलिस के अधिकारियों ने प्रथम दृष्टया तीन लोगों- समीर खान, कसम जाफर और हाजी हाजी इस्माइल को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था।

विरोध नागरिक समाज के हाथों का एक उपकरण 

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि विरोध नागरिक समाज के हाथों का एक उपकरण है, जैसे हड़ताल कामगारों के हाथों में एक हथियार है। शीर्ष अदालत ने रवि नंबूथिरी द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिन्होंने केरल उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी, जिसने नवंबर 2015 में ग्राम पंचायत में पार्षद के रूप में चुनाव को रद्द करने के एक निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। पद के लिए उनका चुनाव इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि उन्होंने अपने नामांकन में एक आपराधिक मामले में अपनी संलिप्तता को दबा दिया था और एक भ्रष्ट आचरण किया था।

न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि केरल पुलिस अधिनियम औपनिवेशिक युग के कुछ पुलिस अधिनियमों का उत्तराधिकारी कानून था जिसका उद्देश्य स्वदेशी आबादी की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को खत्म करना था। जिस तरह हड़ताल श्रमिकों के हाथ में एक हथियार है और तालाबंदी श्रम कल्याण कानूनों के तहत नियोक्ता के हाथ में एक हथियार है, विरोध नागरिक समाज के हाथों का एक उपकरण है और पुलिस कार्रवाई सरकार के हाथ का एक उपकरण है।   

 
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