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अमर सिंह और प्रो. राम गोपाल बस समय-समय की बात
शशिधर पाठक/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 26 Oct 2016 09:42 PM IST
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पिछले करीब छह साल से अमर सिंह ने सार्वजनिक तौर पर समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव राम गोपाल यादव को कुछ नहीं कहा था, लेकिन आनंद बाजार पत्रिका को दिए साक्षात्कार में अमर सिंह ने राम गोपाल को नपुंसक बताया है। अमर सिंह ने कहा कि वह राम गोपाल के बारे कुछ नहीं कहना चाहते। वह उनके बारे में केवल इतना कह रहे हैं कि राम गोपाल नपुंसक हैं। कभी वह दिन भी था जब समाजवादी पार्टी की धुरी कहे जाने वाले अमर सिंह तब इससे बाहर किए गए थे, जब उन्हें दूर-दूर तक इसका कोई इल्म नहीं था। आज वही स्थिति प्रो. राम गोपाल की है।
राम गोपाल के इशारे पर न केवल उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चल रहे थे और अभी चल रहे हैं बल्कि पार्टी में प्रोफेसर साहब के नाम से मशहूर राम गोपाल का समाजवादी पार्टी में काफी कद बढ़ गया था। वह दिल्ली में बैठकर लखनऊ की शिवपाल ब्रिगेड पर पूरी निगाह रखते थे और उनकी मर्जी के बगैर बमुश्किल पत्ता हिल पाता था। एक स्थिति यह भी थी कि रामगोपाल यादव की हरी झंडी मिलने के बाद पार्टी में नेता जी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव निर्णय लेने में देर नहीं लगाते थे। अब उसी राम गोपाल से नेता जी बात नहीं करना चाहते।
संसद भवन की वह शाम
छह-सात साल पहले शाम करीब कोई छह बजे का समय था। जब तत्कालीन समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह संसद भवन के पार्टी के कार्यालय में बैठ गए थे। जयाप्रदा और जया बच्चन भी साथ थी। अमर सिंह नाराज थे और रामगोपाल उनके निशाने पर थे। जया का गुस्सा देखने लायक था। नाराजगी इतनी बड़ी थी कि मुलायम सिंह को मनाने के लिए आना पड़ा। मुलायम आये, कुछ देर बाद बाहर निकले। राम गोपाल और अमर सिंह साथ थे।
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संसद भवन की सीढिय़ों पर मुलायम सिंह पार्टी महासचिव अमर सिंह की नाराजगी दूर होने का मीडिया को भरोसा दिला रहे थे। तब अपनी सफाई में अमर सिंह ने कहा था कि वह मुलायम सिंह यादव के दर्जी हैं। जो नेता जी कहते हैं वह कपड़ा काटकर तैयार कर देते हैं। कुछ भी अपने मन से नहीं करते, लेकिन राम गोपाल की आंखों में चमक कुछ और ईशारा कर रही थी। इसके कुछ समय बाद पता चला कि अमर सिंह को खुद मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से निकालने का ऐलान कर दिया।
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राम गोपाल के इशारे पर न केवल उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चल रहे थे और अभी चल रहे हैं बल्कि पार्टी में प्रोफेसर साहब के नाम से मशहूर राम गोपाल का समाजवादी पार्टी में काफी कद बढ़ गया था। वह दिल्ली में बैठकर लखनऊ की शिवपाल ब्रिगेड पर पूरी निगाह रखते थे और उनकी मर्जी के बगैर बमुश्किल पत्ता हिल पाता था। एक स्थिति यह भी थी कि रामगोपाल यादव की हरी झंडी मिलने के बाद पार्टी में नेता जी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव निर्णय लेने में देर नहीं लगाते थे। अब उसी राम गोपाल से नेता जी बात नहीं करना चाहते।
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संसद भवन की वह शाम
छह-सात साल पहले शाम करीब कोई छह बजे का समय था। जब तत्कालीन समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह संसद भवन के पार्टी के कार्यालय में बैठ गए थे। जयाप्रदा और जया बच्चन भी साथ थी। अमर सिंह नाराज थे और रामगोपाल उनके निशाने पर थे। जया का गुस्सा देखने लायक था। नाराजगी इतनी बड़ी थी कि मुलायम सिंह को मनाने के लिए आना पड़ा। मुलायम आये, कुछ देर बाद बाहर निकले। राम गोपाल और अमर सिंह साथ थे।
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संसद भवन की सीढिय़ों पर मुलायम सिंह पार्टी महासचिव अमर सिंह की नाराजगी दूर होने का मीडिया को भरोसा दिला रहे थे। तब अपनी सफाई में अमर सिंह ने कहा था कि वह मुलायम सिंह यादव के दर्जी हैं। जो नेता जी कहते हैं वह कपड़ा काटकर तैयार कर देते हैं। कुछ भी अपने मन से नहीं करते, लेकिन राम गोपाल की आंखों में चमक कुछ और ईशारा कर रही थी। इसके कुछ समय बाद पता चला कि अमर सिंह को खुद मुलायम सिंह यादव ने पार्टी से निकालने का ऐलान कर दिया।
छह साल बाद अमर सिंह की आंखों में आई रौनक
करीब छह साल बाद वही चमक अमर सिंह की आंखों में है। तब अमर सिंह ने सार्वजनिक स्तर पर काफी कुछ कहा था। खुद को पार्टी से निकाला जाना अपनी पीठ में छूरा भोंकना बताया था। तब अमर सिंह बीमार थे। सिंगापुर किडनी ट्रांसप्लांट कराकर लौटे थे। आज उसी रास्ते पर राम गोपाल हैं। वह अमर सिंह को खुल्लम-खुल्ला राजनीतिक दलाल कह रहे हैं और अमर सिंह कुछ शब्द बोलकर खामोश हैं। तब मुलायम सिंह यादव रामगोपाल और अमर सिंह के विरोधी नेताओं के साथ थे। अमर सिंह के कारण ही आजम खां ने पार्टी छोड़ दी थी। राज बब्बर भी समाजवादी पार्टी से अलग हुए थे। बेनी प्रसाद वर्मा भी सिंह से नाराज थे और छोटे लोहिया के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्र के पास केवल एक सधा सा वाक्य होता था। अमर सिंह दूसरे स्कूल से आया है, जरा तेज चलता है, लेकिन जनेश्वर को भी इल्म नहीं था कि सिंह इतनी आसानी से पार्टी से बाहर हो जाएंगे।
समय की सूई
समय की सूई उसी अंदाज में घूमी है। बिना अमर, बेनी के पार्टी युवा अखिलेश के भरोसे पूर्ण बहुमत से उ.प्र. सरकार बनाने में सफल रही। अमर सिंह को पसंद न करने वाले बेनी, आजम, रामगोपाल समेत सभी नेता स्थायी भाव में थे और सबके न चाहते हुए अमर सिंह पार्टी में शामिल हुए। राज्यसभा सदस्य बने। साथ में जया प्रदा उ.प्र. फिल्म विकास बोर्ड की चेयरमैन बनाई गई। अमर सिंह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं और प्रो. राम गोपाल को मुलायम सिंह के मौखिक आदेश पर शिवपाल सिंह यादव ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फर्क इतना है कि तब उ.प्र. में राज्य विधानसभा चुनाव में डेढ साल का समय था और अब चार-पांच महीने का है।
दोनों ने रखी कंधे पर बंदूक
राम गोपाल ने अमर सिंह को निशाना बनाने के लिए 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजे, 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजे, पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कुछ आंतरिक वजहों को आधार बनाया था। वहीं, अखिलेश और राम गोपाल के आरोपों से छनकर निकल रहे तथ्यों से साफ है कि अमर सिंह ने नेता जी का विश्वास जीतने के साथ-साथ उनके भाई और उ.प्र. सरकार के कबीना मंत्री शिवपाल तथा दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का सहारा लिया। बस गोट और मोहरें बदलकर अखिलेश के बाहरी आदमी ने चाल चल दी।
रिशेप्सन में मिल रही थी हवा
शिवपाल के बेटे का कुछ महीने पहले दिल्ली में भगवानदास रोड पर रिशेप्सन था। इसके केन्द्र में अमर सिंह थे। रामगोपाल का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। इसमें नेता जी और अखिलेश भी आए थे, लेकिन मतभेद से लेकर मनभेद की कहानी काफी कुछ संकेत दे रही थी। तभी से चर्चा तेज थी कि शिवपाल और अखिलेश में सबकुछ सामान्य नहीं है।
समय की सूई
समय की सूई उसी अंदाज में घूमी है। बिना अमर, बेनी के पार्टी युवा अखिलेश के भरोसे पूर्ण बहुमत से उ.प्र. सरकार बनाने में सफल रही। अमर सिंह को पसंद न करने वाले बेनी, आजम, रामगोपाल समेत सभी नेता स्थायी भाव में थे और सबके न चाहते हुए अमर सिंह पार्टी में शामिल हुए। राज्यसभा सदस्य बने। साथ में जया प्रदा उ.प्र. फिल्म विकास बोर्ड की चेयरमैन बनाई गई। अमर सिंह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं और प्रो. राम गोपाल को मुलायम सिंह के मौखिक आदेश पर शिवपाल सिंह यादव ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फर्क इतना है कि तब उ.प्र. में राज्य विधानसभा चुनाव में डेढ साल का समय था और अब चार-पांच महीने का है।
दोनों ने रखी कंधे पर बंदूक
राम गोपाल ने अमर सिंह को निशाना बनाने के लिए 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजे, 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजे, पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कुछ आंतरिक वजहों को आधार बनाया था। वहीं, अखिलेश और राम गोपाल के आरोपों से छनकर निकल रहे तथ्यों से साफ है कि अमर सिंह ने नेता जी का विश्वास जीतने के साथ-साथ उनके भाई और उ.प्र. सरकार के कबीना मंत्री शिवपाल तथा दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का सहारा लिया। बस गोट और मोहरें बदलकर अखिलेश के बाहरी आदमी ने चाल चल दी।
रिशेप्सन में मिल रही थी हवा
शिवपाल के बेटे का कुछ महीने पहले दिल्ली में भगवानदास रोड पर रिशेप्सन था। इसके केन्द्र में अमर सिंह थे। रामगोपाल का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। इसमें नेता जी और अखिलेश भी आए थे, लेकिन मतभेद से लेकर मनभेद की कहानी काफी कुछ संकेत दे रही थी। तभी से चर्चा तेज थी कि शिवपाल और अखिलेश में सबकुछ सामान्य नहीं है।