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Hindi News ›   India News ›   Indo-China Relations: Is era of better relations with China going to start once again

Indo-China Relations: क्या चीन के साथ एक बार फिर शुरू होने जा रहा है बेहतर रिश्तों का दौर?

Sat, 14 Sep 2024 05:34 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sat, 14 Sep 2024 05:34 PM IST
सार

Indo-China Relations: अक्तूबर में रूस के कजान शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाकात संभव है। बफर जोन के रास्ते लद्दाख में समाधान का रास्ता खोजा जा सकता है। 

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Indo-China Relations: Is era of better relations with China going to start once again
पीएम मोदी और शी जिनपिंग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी विदेश नीति में कारोबारी रिश्ते को बड़ा कूटनीतिक हथियार मानते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भी यह बात सही साबित होती दिख रही है। भारत और चीन चार साल से अधिक समय के कड़वाहट भरे रिश्ते के बाद अब एक बार फिर बेहतर संबंधों की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जर्मनी से इसकी शुरुआत की। फिर मॉस्को में चीन के विदेश मंत्री और एनएसए वांग यी से एनएसए अजीत डोभाल की मुलाकात हुई। संकेत हैं कि अक्टूबर से दोनों देश सहयोग और सौहार्दपूर्ण रिश्ते का संदेश देने लगेंगे।
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल से भेंट के दौरान अपने मित्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में पूछा। प्रधानमंत्री मोदी 22 अक्टूबर को रूस के कजान शहर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जाएंगे। वहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति पुतिन के अलावा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी होगी। समझा जा रहा है कि इस दौरान भारत और चीन के रिश्तों पर जून 2020 से जम रही बर्फ भी पिघलनी शुरू हो जाएगी।
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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी दो दिन पहले इसके संकेत दिए थे। पहली बार जयशंकर ने कहा है कि लद्दाख क्षेत्र में विसैन्यीकरण (डिसइंगेजमेंट, सेना को पीछे ले जाने की भारत की मांग) का मुद्दा 75 प्रतिशत तक सुलझ चुका है। जून 2020 में भारत और चीन के सैनिकों में खूनी झड़प हुई थी। इस झड़प के होने तक चीन की सेनाएं लद्दाख के भारतीय क्षेत्र गलवां वैली, गोगरा पोस्ट के हॉट स्प्रिंग, डेमचोक और डेपसांग इलाके में घुस आई थी। इसके बाद भारत ने चीन के राष्ट्रपति के साथ मुलाकातें रोक दीं। चीन से आयात होने वाले सामानों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। चीन की कंपनियों का भारत में काम करना मुश्किल होने लगा। भारत का कहना था कि दोनों देशों के रिश्ते असामान्य दौर से गुजर रहे हैं। भारत का साफ संदेश था कि जब तक चीन लद्दाख क्षेत्र में अपने सैनिकों को 2020 से पहले वाली स्थिति में पीछे नहीं लाता, उसके साथ संबंध सामान्य होना मुश्किल है।
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डेपसांग, डेमचोक पर फंसा है पेंच
15 जून 2020 को गलवां घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने चीन के साथ सैन्य विसैन्यीकरण के उद्देश्य को हल करने के लिए बफर जोन के उपाय पर सहमति बनाई। इसके अंतर्गत वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत की जमीन पर बफर जोन बनाए जाने की सहमति बनी। चीन के सैनिक बफर जोन के उस पार चले गए और हमारे इस पार। यह सहमति गलवां वैली के अलावा सितंबर 2022 में गोगरा हॉटस्प्रिंग के पेट्रोलिंग प्वाइंट 15 पर भी बनी। इसी आधार पर दोनों देशों के सैनिक पीछे हटे। पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारे के पेट्रोलिंग प्वाइंट को इसी बफर जोन के माध्यम से सुलझाया गया। 

वर्तमान में जो सबसे बड़ा पेंच फंसा है, वह डेमचोक और डेपसांग में चीन की सेना की मौजूदगी का है। चीन रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में बना रहना चाहता है और पीछे जाने के सवाल को टाल देता है। चीन का दौलत बेग ओल्डी के करीब से गुजरने वाला हाई-वे इस क्षेत्र से सटा हुआ है और चीन नहीं चाहता कि भारत के सैनिक इस क्षेत्र में पेट्रोलिंग करके उसके हाई-वे पर निगाह रखें। माना जा रहा है कि दोनों देश के रणनीतिकार इस विवाद का हल निकालने में लगे हैं। संभव है कि इसके लिए भी कोई बफर जोन बनाए जाने का प्रस्ताव अमल में आए।

चीन से मधुर रिश्ते में भारत की मजबूरी क्या है?
यह बड़ा सवाल है। चीन की नजर भारत के बाजार पर है। जून 2020 के बाद से चीन की कंपनियों की इसके बाबत छटपटाहट भी साफ देखी गई, लेकिन भारत में भी एक मैन्यूफैक्चरिंग और चीन से सामानों (खासकर कच्चे, अर्ध निर्मित) के आयात की लॉबी है। इस लॉबी का लगातार तर्क है कि चीन से सामानों के आयात में लगाए गए शुल्क बाधा बन रहे हैं। इससे भारत की कंपनियों में बन रहे सामान की लागत और उत्पादन मूल्य बढ़ जा रहे हैं। इसके चलते विदेशों में हमारा सामान मंहगे मूल्य पर जा रहा है और इसका असर कुल निर्यात पर पड़ रहा है। 

इस लॉबी का यह भी कहना है कि चीन से द्विपक्षीय व्यापार में होने वाले व्यापार घाटे को काफी हद तक नजरअंदाज कर देना चाहिए। क्योंकि इसके भरपाई दूसरे देशों को होने वाले निर्यात से पूरी हो जाती है। देश वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल भी चीन से कुछ मामले में द्विपक्षीय वायापार की शर्तों में ढील देने के पक्षधर हैं। डीआईआईपी के संयुक्त सचिव भी कहते हैं कि चीन से द्विपक्षीय कारोबार का घाटा-मुनाफा दोनों है। सीधे तौर पर घाटा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसके लाभ हैं।

दो ध्रुवीय या बहुपक्षीय दुनिया भारत जैसे देशों के हित में
अंतरराष्ट्रीय मामले के जानकारों का मानना है कि दुनिया में किसी देश की मोनोपोली (एकराग) नहीं होनी चाहिए। खाड़ी युद्ध के बाद से अमेरिका का दबदबा पूरी दुनिया पर है। 2015 में सीरिया युद्ध में रूस के आक्रामक रुख दिखाने के बाद अमेरिका को पहला झटका लगा। चीन के साथ शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिस्पर्धा ने इसे और बड़ा झटका दिया। यूक्रेन में रूस की सेना के प्रवेश और सैन्य संघर्ष तथा इस्राइल हमास युद्ध ने पूरी दुनिया की भू-राजनीतिक परिस्थिति को बदलकर रख दिया है। इसलिए रूस के राष्ट्रपति पुतिन क्षेत्रीय गठजोड़ पर बड़ा जोर दे रहे हैं। माना जा रहा है कि ब्रिक्स फोरम के सहारे वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को बड़ी चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। 

रूस, भारत और चीन के साथ आरआईसी (रूस-इंडिया-चीन) फोरम को लगातार मजबूत बनाने का प्रयास कर रहा है। रूस इसके लिए भारत और चीन दोनों के बीच में संवाद कर रहा है। इस त्रिपक्षीय फोरम में ब्राजील और 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह ब्रिक्स हो गया था। इस साल 2024 की जनवरी में सऊदी अरब, मिश्र, इथोपिया और ईरान भी इसके सदस्य बन गए हैं। भारत भी इसके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व को समझ रहा है। जब एस जयशंकर पश्चिम के देशों को जी-7 का नाम लेकर ब्रिक्स के क्षेत्रीय फोरम का ताना मारते हैं तो इसके निहितार्थ का संकेत मिलता है।

अमेरिका को लग सकती मिर्ची, लेकिन कोई बात नहीं
एशिया में इस तरह का रोडमैप तैयार हो रहा हो और अमेरिका को मिर्ची न लगे, भला यह कैसे संभव है। अमेरिका ने एशिया में चीन को चिढ़ाने के लिए ही भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वॉड फोरम की पहल की थी, लेकिन क्वॉड अभी तक अपनी शैशव अवस्था में है। रक्षा साजो-सामान, तकनीक हस्तांतरण समेत अन्य क्षेत्र में भी भारत को अमेरिका से खास उम्मीद थी। अपने गठन के बाद से अभी तक क्वॉड फोरम खास मजबूती नहीं पा सका है। इस साल 21 सितंबर को क्वॉड फोरम का भी शिखर सम्मेलन होना है। इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन, जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीज हिस्सा लेंगे। 


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्वॉड की बैठक में हिस्सा लेने के बाद रूस के कजान शहर में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव है। राष्ट्रपति बाइडन के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते भी थोड़ी कम ऊर्जा लिए हैं। कुल मिलाकर भारत के पास समय और अवसर दोनों है। भविष्य के रोडमैप का विकल्प भी पहले से ज्यादा है।

 
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