बिना औपचारिक शिक्षा के सूर्य का अध्ययन कर रहा भारतीय वैज्ञानिक
परिवार के यह प्रयास पूरी दुनिया के लिए एक अजूबा हैं, लेकिन कोडाइकनाल स्थित सौर वैधशाला में काम करना पी. देवेंद्रन के लिए महज एक पारिवारिक परंपरा है। उनके दादा और पिता के बाद अब चौथी पीढ़ी भी इस जिम्मेदारी के लिए तैयार है। फर्क सिर्फ इतना है कि चौथी पीढ़ी के पास भौतिकी में पीजी की डिग्री है।
सुबह की धुंधली रोशनी में प्रतिदिन सौर वैधशाला जाना पी. देवेंद्रन के लिए कोई नया काम नहीं है। वैधशाला में शटर उठाने के लिए वह रस्सी खींचते हुए छह इंच के टेलीस्कोप को सेट करते हुए बताते हैं कि इसे 1899 से सूरज की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उपयोग में लाया जा रहा हैं।
यहां आज भी सूरज की हर चाल को नोट किया जाता है। देवेंद्रन ने खगोलशास्त्र की औपचारिक शिक्षा नहीं ली है, लेकिन अपने दादा और पिता के साथ यहां आकर वह 1986 से सूर्य का अध्ययन कर रहे हैं। वह सूर्य की हर चाल को नोट करते हैं।
बहुत करीब महसूस होता है सूर्य
देवेंद्रन के दादा पार्थसारथी इस वैधशाला के साथ वर्ष 1900 में जुड़े थे। यहां अपने पिता और दादा की ही तरह देवेंद्रन ने खगोलशास्त्र की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है। लेकिन अपने दादा और पिता के साथ यहां अक्सर आते रहने से उनकी रुचि इस विषय के प्रति बढ़ती रही और साल 1986 से वह सूर्य का अध्ययन कर रहे हैं।
उनका 23 साल का बेटा राजेश भी परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाएगा। हालांकि उसके पास भौतिकी में पीजी की डिग्री है। राजेश को भी लगता है कि सूरज को देखना और उसका अध्ययन करना उनके खून में समाया हुआ है।
देवेंद्रन के मुताबिक तारों की तरह सूरज की जिंदगी भी 10 अरब साल लंबी है इसलिए किसी छोटे से बदलाव की जानकारी तक लेने के लिए अधिक से अधिक डाटा की जरूरत पड़ती है। तीन दशकों से सूर्य पर नजर रखने वाले देवेंद्रन को अब सूर्य दूर नहीं, करीब महसूस होने लगा है।