स्पेलिंग प्रतियोगिता में लगातार छा रहे हैं भारतीय
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अमरीका में 2016 स्क्रिप्स नेशनल स्पेलिंग बी प्रतियोगिता को भारतीय मूल के दो लडकों, 11 साल के निहार जंगा और 13 साल के जयराम हथवार ने जीता। पिछले हफ्ते आयोजित हुए इस प्रतियोगिता में जीतने वाले निहार टेक्सास के रहने वाले हैं जबकि जयराम न्यूयॉर्क से हैं।
राष्ट्रीय प्रतियोगिता के फाइनल में इस जोडी ने 25 राउंड तक लडाई लडी। इसका सीधा प्रसारण टीवी पर किया गया था। दोनों को प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया गया। इनाम के तौर हर विजेता को 40 हजार डॉलर के साथ कई अन्य इनाम भी दिए गए।
2015 में इस प्रतियोगिता के विजेता थे गोकुल वेंकटचेलम और वान्या शिवशंकर। वान्या की बडी बहन काव्या ने ये प्रतियोगिता 2009 में जीती थी। 2014 में विजेता अनसुन सुजोए और श्रीराम हथवार रहे। श्रीराम, इस साल के विजेता जयराम के बडे भाई हैं।
वहीं 2013 में भारतीय मूल के अरविंद महानकाली, 2012 में स्निग्धा नंदिपति, 2011 में सुकन्या रॉय और 2010 में अनामिका वीरामनी रहे थे।
भारतीय मूल के बच्चों के जीतने की औसत 80 से ज्यादा है
इस प्रतियोगिता के प्रतिभागियों पर नजर डालें तो इस साल फाइनल राउंड में जाने वाले 285 प्रतियोगियों में से 70 दक्षिण एशियाई नामों वाले थे। अमरीका में पिछले नौ सालों के स्पेलिंग बी प्रतियोगिता जीतने के अलावा भारतीय मूल के अमरीकी बच्चों ने पिछले पांच नेशनल जियोग्राफिक बी प्रतियोगिताओं को भी जीता जिसमें लाखों अमरीकी बच्चों के भूगोल के ज्ञान को परखा गया।
2005 से इन दो प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के बच्चों के जीतने की औसत 80 से ज्यादा है। लेकिन वो क्या कारण है कि अमरीकी स्कूली बच्चों में महज एक प्रतिशत से भी कम संख्या वाले इन बच्चों की जीत का दर इतना जबरदस्त है?
पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के देवेश कपूर और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी-सांताक्रूज के निरविकार सिंह के साथ संजय चक्रवर्ती की एक रिसर्च इस विषय पर कुछ रौशनी डालती है।
लेकिन म्यूजिक और एथलेटिक्स के क्षेत्र में उनकी भागेदारी ना के बराबर है
सबसे पहले देखना ये है कि स्कूल और कॉलेजों में बच्चों के लिए आयोजित दूसरी प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के अमरीकी बच्चे कैसे परफॉर्म करते हैं। शैक्षिक प्रतियोगिताओं, खासकर गणित और विज्ञान से जुडे प्रतियोगिताओं में भारतीय मूल के अमरीकी बच्चे बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हैं लेकिन स्पेलिंग और जियोग्राफिक बी के शानदार प्रदर्शन के बराबर नहीं, लेकिन अपनी जनसंख्या के दर से 5 से 20 गुना।
इन प्रतियोगिताओं में शामिल है सीमेंस विज्ञान प्रतियोगिता, इंटेल साइंस टैलेंट सर्च, मैथकाउंट्स और यूएस प्रेसिडेंशियल, रोड्स, ट्रूमैन, चर्चिल और मार्शल स्कॉलरशिप।
लेकिन म्यूजिक और एथलेटिक्स के क्षेत्र में उनकी भागेदारी ना के बराबर है।
लेकिन फिर भी स्थिति दयनीय
उदाहरण के तौर पर 2013 के ऑल नेशनल ऑनर एनसेंबल में ऑर्केस्ट्रा में 45 फीसदी म्यूजिशियन्स और बैंड में 13 फीसदी एशियाई मूल के अमरीकी थे जबकि महज दो और एक फीसदी क्रमश: भारतीय मूल के अमरीकियों ने ही इसमें हिस्सा लिया।
एथलेटिक्स और टीम के खेलों में भारतीय मूल के अमरीकी हाई स्कूल के स्तर पर बढ-चढकर भाग लेते हैं लेकिन कॉलेज और पेशेवर खेलों से ये लगभग नदारद हैं। कोई भी भारतीय मूल के अमरीकी ने पेशेवर खेल लीग जैसे अमरीकन फुटबॉल, बेसबॉल, बास्केटबॉल या आइस हॉकी ने भाग तक नहीं लिया।
बेसबॉल में भी दूर-दूर तक कोई उभरती प्रतिभा टॉप के 100 हाई स्कूल में नहीं है।
करीब 90 फीसदी डिग्रियां तकनीकी क्षेत्रों में है, बडा तबका इंजीनियरिंग के क्षेत्र में है।
इस खाई को समझना संभव है। म्यूजिक के क्षेत्र में ऐसा संभव है कि भारतीय मूल के अमरीकी माता-पिता अपने पारंपरिक म्यूजिक पर ही फोकस करना चाहते हैं। क्रिकेट के अलावा भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे खेलों में बहुत कम हिस्सा लेता है इसलिए ऐसा सोचना कि भारतीय मूल के अमरीकी इससे कुछ बेहतर करेंगे थोडा मुश्किल लगता है।
लेकिन सबसे अहम कारण है कि जो लोग भारत से आकर अमरीका में बसे हैं उनमें से कइयों ने अत्यंत उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त की है, एक तिहाई के पास स्नातकोत्तर डिग्रियां हैं जबकि एक तिहाई के पास कॉलेज डिग्रियां हैं। करीब 90 फीसदी डिग्रियां तकनीकी क्षेत्रों में है, बडा तबका इंजीनियरिंग के क्षेत्र में है।
अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों में एक तिहाई सूचना प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर संबंधी नौकरियों से जुडे हैं कई भारतीय अलग-अलग व्यवसायों से जुडे हैं जिनमें गैस स्टेशन, फास्ट फूड फ्रेंचाइजी और खास तौर पर होटल-मोटल व्यवसाय शामिल हैं।
इन प्रतियोगिताओं को जीतने वाले बच्चों के माता-पिता बेहद पढे-लिखे हैं और इसलिए वो शिक्षा को अहमियत देते हैं। शायद सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अगली पीढी को यही मूल्य वो आगे बढा रहे हैं।
सफलता के लिए आप्रवासी की भूख, व्यक्तिगत तौर पर और एक समुदाय के भी तौर पर।
मेहनत करने की लगन और जरूरत पडने पर अभाव भी झेलना, कुछ भी जो मुख्य धारा का हिस्सा बनने और एक शानदार उदाहरण बनने के लिए जरूरी है। (संजय चक्रवर्ती, फिलाडेल्फिया के टेंपल यूनिवर्सिटी में शिक्षक हैं। वो पांच किताबों के लेखक हैं, सबसे हाल में उनका पहला उपन्यास द प्रोमोटर के लेखक हैं)