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अफगानिस्तान संकट: चीन, रूस और पाकिस्तान का तालिबान को लेकर इशारा क्या है? क्या बढ़ेंगी भारत की मुश्किलें?

Thu, 19 Aug 2021 01:08 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 19 Aug 2021 01:08 PM IST
सार

रिसर्च एंड एनालिसिस विंग को सेवाएं दे चुके पूर्व मेजर जनरल कहते हैं कि तालिबान का हमेशा मकसद दारुल इस्लाम की स्थापना, इस्लामिक कानून के आधार पर कट्टर शासन रहा है। सुन्नी मुसलमानों का प्रभाव रहता है। उसके लिए मजहबी प्रावधान ही अहम हैं। सूत्र का कहना है कि कंधार विमान अपहरण कांड को हम इतनी जल्दी क्यों भूल जाते हैं?

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indian intelligence worried because of Haqqani network operating in Afghanistan which has connection with Jaish-e-Mohammed, Lashkar-e-Taiba, Lashkar-e-Janghvi terroriest organisation
तालिबान (फाइल) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

पड़ोस में आफत कभी अच्छी नहीं होती। विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी की एक लाइन काफी कुछ इशारा कर रही है। इससे बड़ा इशारा भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी कर रहे हैं। सुब्रमण्यम स्वामी का इशारा अफगानिस्तान के मुद्दे पर साथ आ रहे पाकिस्तान, चीन और रूस हैं। इस इशारे को विदेश मंत्रालय के अधिकारी गंभीरता से समझते हैं। खुफिया और सुरक्षा मामलों के जानकारों से लेकर विदेश मामलों के विशेषज्ञों की चिंता अफगानिस्तान में सक्रिय हक्कानी नेटवर्क बढ़ा रहा है। वह इसके तार पाकिस्तान से चलने वाले जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, लश्कर-ए-जांघवी जैसे आतंकी संगठनों से जोड़ते हैं।

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खुफिया मामलों के एक विशेषज्ञ का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया ऐजेंसी आईएसआई का आतंकी संगठनों से तालमेल कोई नई बात नहीं है। वह कहते हैं कि एब्टाबाद में ओसामा बिन लादेन का मिलना या फिर अब्दुल गनी बरादर का भी पाकिस्तान से गिरफ्तार होना तो बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए। अफगानिस्तान का दौरा करके लौटे एक अन्य सूत्र का कहना है कि जुलाई महीने से लेकर अगस्त 2021 तक जिस तरह से तालिबान और उसके लड़ाके चल रहे हैं, यह बिना किसी देश या उच्चस्तर के सहयोग के संभव ही नहीं है। उनका इशारा हक्कानी नेटवर्क की तरफ भी है। कहते हैं कि दुनिया में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से इसके रिश्ते जग जाहिर हैं। इसलिए यह मान लेना कि तालिबान का संबंध जैश या लश्कर से नहीं है, यह गले नहीं उतरता।

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खराब तो खराब है, अच्छा कैसे कह सकते हैं?

पिछले साल रिटायर हुए विदेश सेवा के एक अधिकारी तालिबान के बारे में पूछने पर कहते हैं कि संत लोगों का संगठन तो है नहीं। फिर खराब को अच्छा कैसे कहा जा सकता है? रिसर्च एंड एनालिसिस विंग को सेवाएं दे चुके पूर्व मेजर जनरल कहते हैं कि तालिबान का हमेशा मकसद दारुल इस्लाम की स्थापना, इस्लामिक कानून के आधार पर कट्टर शासन रहा है। सुन्नी मुसलमानों का प्रभाव रहता है। उसके लिए मजहबी प्रावधान ही अहम हैं। सूत्र का कहना है कि कंधार विमान अपहरण कांड को हम इतनी जल्दी क्यों भूल जाते हैं?

इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि संकेत बहुत अच्छे नहीं हैं। क्योंकि अफगानिस्तान हजारा कम्युनिटी हो या दोस्तम, हिकमतयार का गुट हो सब पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुके हैं। नॉदर्न अलायंस जैसे तालिबानी संगठन को जवाब देने वाले संगठन कहां हैं? वह एक बात और जोड़ते हैं। कहते हैं कि तालिबान से चीन और रूस सॉफ्ट कॉर्नर रखकर चल रहे हैं। यह तो तालिबान के लिए फायदे की बात है। यही पाकिस्तान के लिए भी फायदे की बात है। तालिबान के लिए भी फायदे की बात है कि उसे विश्व के कुछ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर की क्षमता रखने वाले देश मान्यता देने का लगातार संकेत दे रहे हैं, और यह हमारे लिए थोड़ा चिंता की गुंजाइश छोड़ती है।

अमेरिका में भी तालिबान का खौफ है

न्यू जर्सी में नीलेश सिंह रहते हैं। बताते हैं अफगानिस्तान में तालिबान के आने की खबर और खौफ दोनों अमेरिका में है। चर्चा के दौरान उनके अमेरिका के सहयोगी इसे अच्छा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि इससे इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरता को बढ़ावा मिल सकता है। आईएसआईएस या अल-कायदा जैसे संगठन आने वाले समय में परेशानी खड़ी कर सकते हैं। नीलेश सिंह पॉलिसी रिसर्च एंड डिप्लोमेसी से जुड़े विषय पर अध्ययन करने के बाद पिछले 15 सालों से अमेरिका में हैं। वह कहते हैं कि पहले पाकिस्तान के आतंकवाद से भारत को सावधान रहना पड़ता था। क्या पता आने वाले समय में उसकी चुनौती बढ़ जाए। नीलेश सिंह बताते हैं कि अमेरिका में लोगों को राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा बिना स्थिति की समीक्षा किए और अचानक लिया गया निर्णय कम रास आ रहा है। लोगों में भी यही चर्चा है कि अमेरिका अफगानिस्तान में हार कर भाग गया। दूसरी तरफ यूरोप में भी तालिबान को लेकर अलग तरह की चिंता है।

कश्मीर का राग क्यों अलाप रहे हैं लोग?

रक्षा और विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि इस समय पूरी दुनिया में एक अजीब सी हवा बह रही है। हमारे यहां भी जरूरत से ज्यादा हिन्दू-मुसलमान हो रहा है। रंजीत कुमार कहते हैं कि आप तालिबान के पिछले कार्यकाल को केंद्र में रखकर मत सोचिए। समय के साथ तालिबान, उसकी योजना, रणनीति में कुछ तो बदलाव आएगा ही। बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका की फौज के अफगानिस्तान में उतरने से पहले पाकिस्तान के भारत विरोधी आतंकी संगठनों से तालिबान का कोई बहुत गंभीर रिश्ते का संकेत नहीं था। अब इस तरह के संकेत मिल रहे हैं। तालिबान जब सत्ता में नहीं था, तब कई आतंकी संगठनों ने उसकी मदद की होगी। इसी आशंका के कारण लोग अफगानिस्तान में एक सरकार के स्थान पर तालिबान के शासन को लेकर चिंतित हो रहे हैं। एसके शर्मा कहते हैं कि इतनी चिंता करनी चाहिए और भविष्य को ध्यान में रखकर उपाय भी किए जाने चाहिए।

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