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Indian Army: सेना के ये खास इनोवेशंस बचाएंगे करोड़ों रुपये, खूबियां जानकर देसी-विदेशी कंपनियों के भी उड़े होश!

Thu, 26 Sep 2024 01:41 PM IST
हरेंद्र चौधरी डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: हरेंद्र चौधरी Updated Thu, 26 Sep 2024 01:41 PM IST
सार

हिमटेक सिंपोजियम में रिमोट कंट्रोल यूजीवी सिस्टम लेकर मेजर अनिरूद्ध नायर ने अमर उजाला को बताया कि यह मानवरहित जमीनी वाहन (यूजीवी) है, जो एंफीबियस कैटेगरी का है और यह जमीन और पानी दोनों जगहों पर चल सकता है। यह न केवल रिमोटली हथियार फायर कर सकता है, बल्कि माउंट को हटा कर बतौर लॉजिस्टिक यानी सामान ढोने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 

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Indian Army Innovations to save Crores of Rupees Technology outshines many Domestic and Foreign Firms news and
भारतीय सेना के इनोवेशंस से बदल रही तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारतीय सेना केवल देश की सहरदों की रक्षा के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि वह आपदा या दुर्घटना होने पर  राहत और बचाव कार्यों को भी अंजाम देती है। लेकिन सेना का एक रूप और भी है, वह है कि आर्मी अपनी जरूरतों के मुताबिक इनोवेशन भी कर रही है। भारतीय सेना न केवल स्टार्टअप्स को इनोवेशन के लिए प्रोत्साहित कर रही है, बल्कि आर्मी के जवान खुद भी इनोवेशन करने में जुटे हैं। ऑपरेशनल एरिया की जरूरतों को देखते हुए सेना ने कई इनोवेशन किए हैं, जिन्हें हाल ही में लेह में हुई हिमटेक सिंपोजियम में डिस्प्ले किया गया। उनमें से कुछ इनोवेशन ऐसे थे, जो न केवल जवानों की जान बचा सकते हैं, बल्कि विदेशी खरीद को घटा कर सरकार के करोड़ों-अरबों रुपयों की बचत भी कर सकते हैं। वहीं कुछ इनोवेशंस को लेकर देसी-विदेशी कंपनियों ने भी रूचि दिखाई है।  
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जहां नहीं जा सकता ड्रोन, वहां पहुंचेगा फ्रॉगमैन
हिमटेक सिंपोजियम में रिमोट कंट्रोल यूजीवी सिस्टम लेकर मेजर अनिरूद्ध नायर ने अमर उजाला को बताया कि यह मानवरहित जमीनी वाहन (यूजीवी) है, जो एंफीबियस कैटेगरी का है और यह जमीन और पानी दोनों जगहों पर चल सकता है। यह न केवल रिमोटली हथियार फायर कर सकता है, बल्कि माउंट को हटा कर बतौर लॉजिस्टिक यानी सामान ढोने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ऐसी जगहों पर आतंकी नालों और घने जंगलों की मदद से घुसपैठ करने में कामयाब रहते हैं। वहीं, घने जंगलों के चलते ड्रोन या दूसरी सर्विलांस डिवासेज उन्हें देख पाने में नाकामयाब रहती हैं, रिमोट कंट्रोल की मदद से इस यूजीवी पर लगी गन आतंकियों को मौत के घाट उतार सकती है। उन्होंने बताया कि यह 35 किग्रा का वजन ढो सकता है और छोटे हथियार इस पर माउंट किया जा सकते हैं। वहीं, घेराव और तलाशी ऑपरेशन में अहम भूमिका निभा सकता है। मेजर अनिरूद्ध ने बताया कि अभी तो यह प्रोटोटाइप है, और इसकी रेंज पांच किमी है। वहीं इसकी लागत भी मात्र 2 लाख रुपये आई है।
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बारूदी सुरंगों को ढूंढेगा पराशक्ति
आमतौर पर नक्सल रोधी अभियानों में नक्सली बारूदी सुरंगें बिछा देते हैं, इन्हें ढूंढने में जवानों की जान जाने का खतरा रहता है। वहीं कई बार ऐसे अभियानों में जवानों ने जान भी गंवाई है। जिसे देखते हुए सेना ने एक खास माइन क्लीयरेंस सिस्टम बनाया है, जो न केवल जवानों की जान बचाएगा, बल्कि बारूदी सुरंगों को ढूंढने में वक्त भी कम लगेगा। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रतीक मेहता ने अमर उजाला को बताया कि इस सिस्टम में एक रोवर और एक क्वाडकॉप्टर शामिल है। बारूदी सुरंग ढूंढने के लिए पहले क्वाडकॉप्टर को उड़ाया जाता है, जिसमें एक एक्सप्लोसिव ग्रिड सिस्टम को क्वाडकॉप्टर की मदद से माइन फील्ड पर बिछा देते हैं और फिर रिमोट से ब्लास्ट कर देते हैं। वहीं अगर लगता है कि कहीं कोई माइन रह गई हैं, तो उसके बाद रोवर सिस्टम को भेजा जाता है और माइन का पता लगते ही पीछे ऑपरेटर को सिग्नल दे देता है औऱ उसके बाद यह रोवर उस माइन पर एक रात में चमकने वाला तरल पदार्थ छोड़ देता है। लेफ्टिनेंट कर्नल प्रतीक के मुताबिक पुराने तरीके से जब बारूदी सुरंग को खोजा जाता था, तो 100 मीटर तक माइन तलाशने में हमें 6-7 घंटे लगते थे, लेकिन अब यही काम एक घंटे से भी कम समय में पूरा हो जाता है। उन्होंने बताया कि पराशक्ति को बनाने में ही दो-ढाई लग गए। वहीं इसे बनाने में लागत भी मात्र 2.5 लाख रुपये आई है। खास बात यह है कि IDEX कंप्टीशन में पराशक्ति टॉप 10 इनोवेशंस में शामिल रहा है। 
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दिव्यदृष्टि से आतंकियों को सरप्राइज देगी सेना
भारतीय सेना के मेजर प्रतीक श्रीवास्तव ने ऐसा प्रोडक्ट तैयार किया है जो रात के अंधेरे में आतंक रोधी अभियानों में कारगर भूमिका निभा सकता है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया कि यह प्रोडक्ट पूरी दुनिया में सबसे अनूठा है, और किसी ने भी अब तक इस पर काम नहीं किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से उन्होंने दिव्यदृष्टि के नाम से यह खास प्रोडक्ट बनाया है, जो सेना के काफिले को लाइट ऑन किए बगैर रात के अंधेरे में चलने में मदद करता है और वे आतंकियों की निगाह में आए बगैर अपने ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं। वहीं इसे किसी भी डिफेंस व्हीकल पर लगाया जा सकता है, जो न केवल विजिबिलिटी बढ़ाएगा, बल्कि नेविगेशन में भी मदद करेगा। प्रतीक श्रीवास्तव के मुताबिक इस सिस्टम में उन्होंने सड़कों की 27 हजार इमेज का इस्तेमाल किया है और रोड को मार्क किया है। वहीं इस सिस्टम को उन्होंने हाई एल्टीट्यूड पर भी टेस्ट किया है और इसने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। उनके इस प्रोडक्ट के लिए महिंद्रा डिफेंस और अंजनी टेक्नोलॉजी लिमिटेड ने इसे डेवलप करने को लेकर रूचि भी दिखाई है।

हेलीकॉप्टर के इंजन सस्ते में होंगे क्लीन
इस सिस्टम की अहमियत इतनी है कि यह सरकार के करोड़ों रुपये बचा सकती है। मल्टी एरो रिनसिंग इक्विपमेंट की मदद से न केवल खर्च कम हो सकता है, बल्कि अलग-अलग एयरक्राफ्ट के लिए एक ही इक्विमेंट से ही काम चल सकता है। इसे बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल अनुपम कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि आर्मी एविएशन के साथ सबसे बड़ी दिक्कत एरो इंजन को क्लीनिंग करने की होती है। भारतीय सेना के पास अपाचे, चीता, चेतक, चीतल और एलएलएच ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टर हैं, जिनके इंजन की सफाई में काफी खर्च होता है और सभी कॉप्टर्स के लिए अलग-अलग सिस्टम खरीदना पड़ता है। उन्होंने एएलएच का उदाहरण देते हुए बताया कि इसका क्लीनिंग सिस्टम फ्रांस से आता है, जिसकी कीमत 23 लाख रुपये पड़ती है, वहीं उनका सिस्टम यूनिवर्सल है और आर्मी एविएशन की फ्लीट के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है, वहीं उसकी मेंटेनेंस भी आसान कर सकता है। उन्होंने बताया कि इसकी लागत भी बेहद कम आई है और लगभग 75 हजार रुपये इसकी कीमत पड़ती है। उन्होंने बताया कि एक अमेरिकी कंपनी ने भी उनसे इस सिस्टम के लिए संपर्क करके उसके पेटेंट राइट्स भी मांगे है।  


एलएसी पर ही आतंकियों का खात्मा करेगा ये गन सिस्टम
भारतीय सेना इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर जमकर काम कर रही है। बॉर्डर इलाकों पर भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करने की योजना बनाई जा रही है। भारतीय सेना ने एआई तकनीक वाला ऑटोनॉमस वेपन सिस्टम (TAIWS) बनाया है, जो रात के अंधेरे औऱ दिन के उजाले में भी बेहतरीन तरीके से काम कर सकता है औऱ खास बात यह है कि इसे दूर से ऑपरेट किया जा सकता है। ऐसे बॉर्डर इलाके जहां नाले या घने जंगल हैं, और आतंकी घुसपैठ की फिराक में रहते हैं, वहां उन्हें यह सिस्टम पहचान करके शूट कर सकता है। डीप लर्निंग ने एक्सपर्ट लेफ्टिनेंट कर्नल प्रशांत अग्रवाल ने अमर उजाला को बताया कि उनका यह सिस्टम मानव, जानवर औऱ व्हीकल का पता लगा सकता है और यह केवल मनुष्यों को ही टारगेट करता है। इस पर एमएमजी, एलएमजी और राइफल लगाई जा सकती है। उन्होंने बताया अगर टारगेट नहीं भी दिखाई दे रहा है तो भी यह उसका पता लगा कर शूट कर सकता है। साथ ही, यह सिस्टम ऑल वेदरप्रूफ है, जो सर्दी, गर्मी और बारिश में भी काम कर कता है। जहां विदेशी कंपनियों के बनाए ऐसे सिस्टम की कीमत डेढ़ करोड़ रुपये तक होती है, जबकि उनके इस सिस्टम की लागत मात्र 15 लाख रुपये है।
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