जब पाकिस्तानी एयरबेस पर हमले से कुछ मिनट दूर थी भारतीय सेना
कारगिल युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया था जब महीनों तक चले युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान पर हमले की तैयारी कर ली थी। इसके लिए फाइटर पायलेट को तैयार रहने के निर्देश दे दिए गए थे।
जवानों के टारगेट तैयार थे, रूट मैप तय कर लिया गया था, जवानों ने अपने रिवाल्वर के लिए गोला और आपात स्थितियों के लिए पाकिस्तानी करेंसी ले ली थी। बस देर थी तो हमले के आदेश मिलने की, लेकिन यह आदेश नहीं आए। अगर भारतीय वायुसेना पाकिस्तान के युद्ध बेस पर हमला करती तो पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ चल रहा सेना का आपरेशन पूरी तरह युद्ध में तब्दील हो सकता था।
एनडीटीवी की खबर के अनुसार वायुसेना के युद्ध संबंधी कागजातों में यह समस्त सूचनाएं दर्ज हैं। जिसमें बताया गया है कि बार्डर पार कर पाकिस्तान पर हमले से भारतीय फाइटर पायलेट कुछ ही मिनटों की दूरी पर थे। जिन्हें बार्डर और उसके पार बम बरसाने के लिए कह दिया गया था।
असल में पाकिस्तानी युद्ध बेस पर हमला करने का यह प्लान दोनों देशों के बीच चली बातचीत के बेनतीजा निकलने के बाद तैयार किया गया था। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह और उनके पाकिस्तानी समकक्ष सरताज अजीज के बीच नई दिल्ली में युद्ध खत्म करने के संबंध में बातचीत हुई थी।
जसवंत सिंह और सरताज अजीज के बीच बातचीत हो गई थी विफल
जिसमें अजीज को साफ संकेत दिए गए थे कि कारगिल की चोटियों पर जमें पाकिस्तानी लड़ाकों को वापिस बुलाने, कश्मीर में नियंत्रण रेखा को नए सिरे से निर्धारित करने की मांग छोड़ने और कैप्टन सौरभ कालिया के साथ नृशंसता करने के दोषियों को सजा दिलाने संबंधी मांगों को पूरा किए बगैर पाकिस्तान से कोई समझौता नहीं हो सकता है।
दस्तावेजों के अनुसार 12 जून को पाकिस्तान से वार्ता बेनतीजा साबित होने के बाद वायुसेना के सभी पायलेट को गुप्ता की ओर से शाम चार बजे कॉल की गई। यह बुलावा गुप्ता की ओर से भेजा गया था जो CATO (Command Air Tasking Orders) थे।
इन आदेशों में सभी पायलेट को 13 जून को हमले के लिए तैयार रहने के लिए कहा गया था। यह बात एयरफोर्स के 17 स्क्वायड्रन की डायरी में दर्ज है जिसे गोल्डन एरोज के नाम से जाना जाता है। मिग 21 की यह स्क्वायड्रन यह श्रीनगर में स्थापित है।
डायरी में दर्ज सूचना के अनुसार चार एयरक्राफ्ट को शुरूआती हमले में पाक अधिकृत कश्मीर के चकलाला स्थित एयरबेस को निशाना बनाया जाना था। पहले मिशन के लिए टोनी, प्रदीप, चाऊ और डॉक को हमले की जिम्मेदारी दी गई थी। ढाली और गुप्ता पर दूसरे हमले की जिम्मेदारी थी।
उस मिशन के लिए तैयारी करने वाले एक पायलेट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, हम रात को वापिस लौटे और, विजनवास, गोला, नक्शा और पाक करेंसी इकट्ठा की। घडी की सुईयां आगे बढ़ रही थी और हमारा इंतजार भी। अगले कुछ घंटों में भारतीय वायु सेना 1971 के बाद अपने पहले हमले के लिए तैयार थी। जिससे परमाणु हथियार संपन्न दो देशों के बीच युद्ध के पूरे आसार थे।
13 जून को सुबह साढ़े चार बजे हमले के लिए सभी पायलेट तैयार होकर आदेशों के इंतजार में थे। लेकिन गो और नो गो का यह आदेश नहीं आया। सुबह और फिर दोपहर 12.30 बजे तक यह आदेश नहीं आया तब तक हम इंतजार करते रहे।