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India vs Bharat: संविधान सभा की इस बैठक में मिला देश को नाम, इंडिया-भारत से संयुक्त राज्य भारत तक के आए सुझाव

Wed, 06 Sep 2023 05:33 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Wed, 06 Sep 2023 05:33 PM IST
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सार
India vs Bharat: 18 सितंबर 1949 को आजाद देश को एक के बजाय दो नाम देने के प्रस्ताव के बारे में चर्चा हुई। सदस्यों ने कई संशोधनों का सुझाव दिया लेकिन किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया। 
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India vs Bharat Debate in Constituent Assembly and suggestions for country's name
संविधान सभा में देश के नामकरण पर बहस - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

'कुछ नाम बस नाम रह जाते हैं, कुछ नाम इतिहास के पन्नों पर आ जाते हैं।' इस लाइन के आज के समय में कई मायने हैं। देश के नाम में 'इंडिया' के बजाय 'भारत' लिखने की शुरुआत हो चुकी है। पहले जी20 के निमंत्रण पत्र में 'प्रेजिडेंट ऑफ भारत' लिखा गया तो बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के कार्यक्रम में 'प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत' का उल्लेख हुआ। 


अब जब चर्चा हो रही है कि क्या आधिकारिक रूप से देश का नाम भारत हो जाएगा ऐसे में देश का संविधान लिखने वाली सभा की एक बहस का भी जिक्र हो रहा है। लिहाजा सवाल उठते हैं कि संविधान सभा ने देश के नाम को लेकर क्या कहा था? आखिर नाम को लेकर संविधान सभा की पूरी बहस क्या थी? भारत या इंडिया किसके पक्ष में थे सदस्य? फिर इंडिया नाम को तवज्जों कैसे मिली? 

संविधान सभा की तस्वीर
संविधान सभा की तस्वीर - फोटो : SOCIAL MEDIA
संविधान सभा ने देश के नाम पर क्या कहा?
संविधान का अनुच्छेद एक कहता है 'इंडिया, यानी भारत, राज्यों का एक संघ होगा।' हालांकि, मूल मसौदे में 'भारत' नाम का कोई जिक्र नहीं था। दरअसल, चार नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान का मसौदा पेश किया गया था। यह मसौदा डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। लगभग एक साल बाद 17 सितंबर 1949 को अंबेडकर ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें पहले उप खंड में 'भारत' नाम के संशोधन में बदलाव का सुझाव दिया गया।

18 सितंबर 1949 को हुई चर्चा में आजाद देश को एक के बजाय दो नाम देने के प्रस्ताव के बारे में सदस्यों के बीच भारी असहमति देखने को मिली थी। प्रारंभिक प्रावधान पर संविधान सभा में 'इंडिया' और 'भारत' के बीच संबंध पर काफी चर्चा हुई। 

सदस्यों ने कई संशोधनों का सुझाव दिया लेकिन किसी को भी स्वीकार नहीं किया गया। अंबेडकर के बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता एचवी कामथ ने पहले उप खंड के हिस्से को भारत या अंग्रेजी में इंडिया से बदलने का प्रस्ताव करते हुए पहला संशोधन पेश किया। कामथ यह प्रस्ताव आयरिश संविधान से प्रेरणा लेते हुए सामने लेकर आए थे। 

संविधान सभा में एचवी कामथ
संविधान सभा में एचवी कामथ - फोटो : SOCIAL MEDIA
एचवी कामथ ने भारत या इंडिया की पैरवी की
बहस के दौरान कामथ ने कहा था, 'आयरिश फ्री स्टेट आधुनिक दुनिया के उन कुछ देशों में से एक था जिसने आजादी के बाद अपना नाम बदल लिया। मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही सुखद अभिव्यक्ति है कि भारत या अंग्रेजी में इंडिया होगा और ऐसा होगा'। मैं विशेष रूप से अंग्रेजी भाषा कह रहा हूं क्योंकि सदस्य मुझसे पूछ सकते हैं आप अंग्रेजी भाषा में क्यों कह रहे हैं? क्या यह सभी यूरोपीय भाषाओं में एक जैसा नहीं है? नहीं, यह नहीं है। जर्मन शब्द इंडियन है और यूरोप के कई हिस्सों में देश को अभी भी हिंदुस्तान के रूप में जाना जाता है और इस देश के सभी मूल निवासियों को हिंदू कहा जाता है। चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, यह यूरोप के कई हिस्सों में काफी आम है यह प्राचीन नाम हिंदू से आया होगा, जो सिंधु नदी से निकला है।'

राजेंद्र प्रसाद और सेठ गोविंद दास
राजेंद्र प्रसाद और सेठ गोविंद दास - फोटो : SOCIAL MEDIA
सेठ गोविंद दास ने इंडिया नाम पर आपत्ति जताई 
इसके बाद बहस में मध्य प्रांत और बरार से आने वाले कांग्रेस नेता सेठ गोविंद दास शामिल होते हैं। दास ने सुझाव दिया कि 'इंडिया' नाम केवल विदेशों में प्रचलित नाम के रूप में किया जाना चाहिए। इस दौरान उन्होंने तर्क दिया कि देश के सबसे प्राचीन ग्रंथों में 'भारत' की तरह 'इंडिया' का उल्लेख नहीं किया गया है।

संविधान सभा में दास कहते हैं, 'हमारे देश में नामकरण का हमेशा से बहुत महत्व रहा है। हम हमेशा शुभ नक्षत्रों में नाम देने की कोशिश करते हैं और सबसे सुंदर नाम देने का भी प्रयास करते हैं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि हम अपने देश को सबसे प्राचीन नाम दे रहे हैं लेकिन डॉ. अंबेडकर मुझे क्षमा करेंगे। हम इसे उतने सुंदर तरीके से नहीं दे रहे हैं जितना यह आवश्यक था, इंडिया यानी भारत किसी देश के नाम के लिए सुंदर शब्द नहीं है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इंडिया शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। इसका प्रयोग तब शुरू हुआ जब यूनानी भारत आये। उन्होंने हमारी सिंधु नदी का नाम इंडस रखा और इंडस से इंडिया बना। इसके विपरीत यदि हम वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मणों और हमारे महान और प्राचीन ग्रंथ महाभारत को देखें तो हमें भारत नाम का उल्लेख मिलता है।'

कमलापति त्रिपाठी
कमलापति त्रिपाठी - फोटो : amar ujala
कमलापति त्रिपाठी ने 'भारत' को अधिक प्राथमिकता दी 
इसके बाद इस चर्चा में कांग्रेस के एक अन्य सदस्य कमलापति त्रिपाठी जुड़ते हैं। कमलापति ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को इंडिया से अधिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'यदि 'इंडिया दैट इज भारत' के अलावा किसी अन्य अभिव्यक्ति का उपयोग किया गया होता तो मैं सोचता हूं, यह इस देश की प्रतिष्ठा और परंपराओं के अधिक अनुरूप होता और वास्तव में इससे इस संविधान सभा का भी अधिक सम्मान होता।'

'यदि 'दैट इज' शब्द आवश्यक हैं तो जो प्रस्ताव हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है उसमें 'भारत दैट इज इंडिया' शब्दों का उपयोग करना अधिक उचित होता। एक हजार साल की गुलामी के दौरान हमारे देश ने भी अपना सब कुछ खो दिया। हमने अपनी संस्कृति खो दी, हमने अपना इतिहास खो दिया, हमने अपनी प्रतिष्ठा खो दी, हमने अपनी मानवता खो दी, हमने अपना आत्म-सम्मान खो दिया, हमने अपनी आत्मा खो दी और वास्तव में हमने अपना रूप और नाम खो दिया। 

आज एक हजार वर्ष तक परतंत्रता में रहने के बाद यह स्वतंत्र देश अपना नाम दोबारा हासिल करेगा और हमें आशा है कि यह अपना खोया हुआ नाम पुनः प्राप्त करके अपनी आन्तरिक चेतना तथा बाह्य स्वरूप को पुनः प्राप्त कर लेगा। मैं 'भारत' के ऐतिहासिक नाम से प्रभावित हूं। इस शब्द के उच्चारण मात्र से ही हमारे सामने बीती सदियों के सांस्कृतिक जीवन का चित्र उभर आता है...हजारों वर्षों के बाद भी हमारा देश आज भी 'भारत' के नाम से जाना जाता है। वैदिक काल से ही यह नाम हमारे साहित्य में आता रहा है। हमारे पुराणों में सम्पूर्ण भारत के नाम की स्तुति की गयी है। देवता स्वर्ग में इस देश का नाम स्मरण करते रहे हैं।'

गोविंद बल्लभ पंत
गोविंद बल्लभ पंत - फोटो : SOCIAL MEDIA
गोविंद बल्लभ पंत 'भारतवर्ष' के सिवाय कुछ नहीं चाहते थे
बहस का सिलसिला यूं ही चलता रहा और अब बारी आई देश के उत्तरी भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले संयुक्त प्रांत के प्रतिनिधि गोविंद बल्लभ पंत की। पंत देश का नाम 'भारतवर्ष' चाहते थे और इसके सिवाय कुछ नहीं। पंत ने बहस के दौरान कहा, 'भारत या भारतवर्ष हमारे प्राचीन इतिहास और परंपरा के अनुसार युगों-युगों से हमारे देश का नाम है और रहा है। 

वास्तव में यह शब्द उत्साह और साहस की प्रेरणा देता है, इसलिए मेरा निवेदन है कि हमें इस शब्द को स्वीकार करने में तनिक भी झिझक नहीं होनी चाहिए। यह हमारे लिए बहुत शर्म की बात होगी अगर हम इस शब्द को स्वीकार न करके अपने देश के नाम के लिए कोई और शब्द रखें।'

पंत सभा में उल्लेख करते हैं, 'मैं भारत के उत्तरी भाग के लोगों का प्रतिनिधित्व करता हूं जहां श्री बद्रीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री बागेश्वर और मानसरोवर जैसे पवित्र स्थान स्थित हैं। मैं इस हिस्से के लोगों की इच्छाएं आपके सामने रख रहा हूं। मुझे यह कहने की अनुमति दी जा सकती है कि इस क्षेत्र के लोग चाहते हैं कि हमारे देश का नाम भारतवर्ष होना चाहिए और कुछ नहीं।'

हालांकि, इनमें से किसी भी प्रस्तावित संशोधन को संविधान सभा का समर्थन नहीं मिला और यह गिर गया। दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने समय की सीमाओं की ओर इशारा करते हुए सुझाए गए नाम पर बहस में शामिल होने में अनिच्छा व्यक्त की। 

इतिहासकार और भाषाशास्त्री भारत नाम की उत्पत्ति में एकमत नहीं: कामथ 
चर्चा के दौरान कामथ ने सुझाए गए नामों की उत्पत्ति के बारे में जानने की कोशिश की। दोबारा बहस में शामिल हुए कामथ ने कहा, 'अब जो लोग भारत या भारतवर्ष या भारतभूमि के लिए तर्क दे रहे हैं उनका रुख है कि यह इस भूमि का सबसे प्राचीन नाम है।
 
इतिहासकारों और भाषाशास्त्रियों ने इस देश के नाम विशेषकर भारत नाम की उत्पत्ति के विषय में गहराई से विचार किया है। वे सभी इस भारत नाम की उत्पत्ति के विषय में एकमत नहीं है। कुछ लोग इसका श्रेय दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र को देते हैं जिन्होंने इस प्राचीन भूमि पर अपना राज्य स्थापित किया था। उनके नाम पर इस भूमि को भारत के नाम से जाना जाने लगा। शोध करने वाले विद्वानों के एक अन्य समूह का मानना है कि भारत का समय वैदिक काल का है।'

अंबेडकर
अंबेडकर - फोटो : facebook
अम्बेडकर ने कही ये बात 
इस बिंदु पर प्रारूप समिति के अध्यक्ष अम्बेडकर ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने पूछा, 'क्या यह सब पता लगाना जरूरी है? मुझे इसका उद्देश्य समझ नहीं आता। मेरे मित्र 'भारत' शब्द को स्वीकार कर रहे हैं। बात सिर्फ इतनी है कि उन्हें एक विकल्प मिल गया है। मुझे बहुत खेद है, लेकिन सदन के समक्ष सीमित समय को देखते हुए इसका कुछ एहसास होना चाहिए।'

भारत का संविधान
भारत का संविधान - फोटो : social media
संयुक्त राज्य अमेरिका की तर्ज पर संयुक्त राज्य भारत का सुझाव 
अंत में कामथ ने देश का नाम बदलकर 'भारत' करने का प्रस्ताव रखा लेकिन उन्हें ज्यादा समर्थन नहीं मिला। इसी बीच एक और दिलचस्प सुझाव पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व करने वाले संविधान सभा के सदस्य नजीरुद्दीन अहमद ने दिया था। अहमद ने सुझाव दिया कि देश का नाम बदलकर 'संयुक्त राज्य भारत' कर दिया जाए। हालांकि, कामथ अपने सहयोगी से सहमत थे और उन्हें देश का नाम संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम पर रखने का सुझाव अजीब लगा।

उन्होंने कहा, 'मेरे मित्र ने सदन के समक्ष जो संशोधन पेश किया है, उसका उद्देश्य पूर्व और पश्चिम के बीच ऐसा साझा विकास करना है। हम इस स्तर पर संदेह नहीं करना चाहते हैं, जब हम तटस्थ विदेश नीति अपना रहे हैं या ऐसा करना चाहिए। हम नहीं चाहते कि यहां इस सदन में कोई छोटा संकेत दिया जाए कि हम या तो सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ या संयुक्त राज्य अमेरिका की नकल करने जा रहे है, जहां तक यूएसएसआर का संबंध है, इस संविधान में कोई प्रभाव या असर नहीं है। जहां तक संयुक्त राज्य अमेरिका का संबंध है, ऐसा करने से संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान की नकल करने की बू आएगी। 

भारत का संविधान
भारत का संविधान - फोटो : social media
अंत में सभी संशोधन खारिज 
अंततः संविधान सभा ने मसौदा समिति के अध्यक्ष बीआर अंबेडकर द्वारा पेश किए गए संशोधनों को छोड़कर अनुच्छेद के मसौदे में सभी संशोधनों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अनुच्छेद-1 के प्रावधान 'इंडिया दैट इज भारत' को संविधान सभा ने 18 सितंबर 1949 को अपना लिया।
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