कूटनीति: क्या 'मसल पावर शो' के बाद अपनी-अपनी गलतियां सुधारेंगे भारत-पाकिस्तान?
- सितंबर-अक्तूबर से शुरू हुई बैक डोर चैनल डिप्लोमेसी दिखा रही है रंग
- नवंबर-दिसंबर तक दक्षेस (सार्क) शिखर सम्मेलन होने के बन सकते हैं आसार
- पाकिस्तान भी दे रहा है भूल सुधार का संकेत
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विस्तार
कहावत है ठोकर खाने के बाद वास्तविक ज्ञान होता है। सामरिक मामलों के जानकार मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक मेहता इसे भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के संबंध में एक हकीकत मान रहे हैं। उनका कहना है कि लद्दाख क्षेत्र में चीन की सेना के पैंगोंग, गलवां समेत अन्य क्षेत्र में आकर बैठने और दस महीने तक टिकने के बाद भारत को पड़ोसी देश के साथ रिश्ता, समझ और कूटनीति के मामले में नया ज्ञान हुआ है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ प्रो. एसडी मुनि काफी हद तक मेहता की राय से इत्तेफाक रखते हैं। उन्हें भी भारत-पाकिस्तान के बीच शुरू हुई बैक चैनल डिप्लोमेसी, कोविड-19 वैक्सीन डिप्लोमेसी तथा व्यवहारिक बदलाव में ऐसा ही संकेत नजर आ रहा है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी कहना है कि पाकिस्तान के साथ रिश्तों में सुधार आएगा।
शशांक के मुताबिक पहले हम पब्लिक सेंटिमेंट को महत्व देकर जरूरत से ज्यादा बोल गए थे। कूटनीति में इतना नहीं होना चाहिए था। अब उसे ठीक करने की आवश्यकता है। हालांकि इस मामले में पाकिस्तान को आतंकवाद के सवाल पर अपने वादे को पूरा करना होगा। सीमा पार से घुसपैठ, संघर्ष विराम उल्लंघन के मामले में प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
राजनयिक और कूटनीतिक समझ रखने वाले लोगों को भी लग रहा है कि भारत अब पाकिस्तान को वैश्विक परिदृश्य से अलग-थलग करने की रणनीति के बजाय इसमें संतुलन लाने पर ध्यान केन्द्रित करेगा। जम्मू-कश्मीर से लगती नियंत्रण रेखा से लेकर अन्य मामलों में दोनों देश नरमी का संकेत देंगे। पाकिस्तान को साढ़े पांच साल तक 'मसल पावर' दिखाने के बाद अब भारत इससे परहेज करेगा। वहीं पाकिस्तान को भी अपनी गलती का अहसास हुआ है। सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन बालाकोट के बाद पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भी आतंकवाद को शह देने के मामले में अपनी रणनीति में बदलाव का संकेत दिया है। इससे लग रहा है कि आने वाले दिनों में रिश्तों में संतुलन देखने को मिल सकता है।
'भारत और पाकिस्तान के बीच असली बाधा तो चुनाव और पब्लिक है'
प्रो. एसडी मुनि, शशांक और मेजर जनरल मेहता तीनों एक राय से 100 फीसदी इत्तेफाक रखते हैं। भारत और पाकिस्तान में दोनों देशों के बीच संबंध का मुद्दा यहां के आम लोगों के बीच हावी रहता है। बताते हैं कि भारत में राज्यों का चुनाव हो या लोकसभा का चुनाव, दोनों में पाकिस्तान को लेकर बयानबाजी तेज हो जाती है। इस मुद्दे से जन जुड़ाव राष्ट्रीय, द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों पर भारी पड़ने लगता है। इसके कारण भी कई बार चीजें सही रास्ते से भटक जाती हैं। पूर्व विदेश सचिव मानते हैं कि पाकिस्तान से संवाद प्रक्रिया पूरी तरह से रोकने के साथ-साथ हमने कई बड़ी गलतियां की हैं। पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज ने 20 साल पहले चीन को भारत का दुश्मन नंबर-1 बताया था। अब हम धीरे-धीरे चीन से इस तरह के खतरे को मानने के दौर में आ रहे हैं।
अमेरिका भी ले रहा है भारत-पाकिस्तान में संवाद शुरू कराने का श्रेय
प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि पाकिस्तान से संवाद बंद नहीं होना ठीक नहीं था। बातचीत से ही रास्ता निकलता है। यह बड़ी भूल थी। भारत ने यहां गलती कुछ ज्यादा की। अब अमेरिका इसका श्रेय ले रहा है कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच में संवाद शुरू करवा दिया है। मुनि कहते हैं कि खैर, कोई बात नहीं देर आए, दुरुस्त आए। प्रो. मुनि को लग रहा है कि पांच राज्यों की चुनाव प्रक्रिया खत्म होने के बाद भारत और पाकिस्तान अपने रिश्ते को सामान्य करने की तरफ कदम उठाएंगे। इस दिशा में प्रयास चल रहा है और कुछ पहल कर सकते हैं।
चीन की घुसपैठ से क्या मिला 'ज्ञान'
मेजर जनरल मेहता कहते हैं कि हमें चीन के लद्दाख क्षेत्र में 10 महीने तक टिकने के बाद 'ज्ञान' की प्राप्ति हुई है। सबसे पहले तो ये कि हम पाकिस्तान और चीन से एक साथ नहीं निपट सकते। वैसे भी इस तरह के हालात सर्जिकल स्ट्राइक, ऑपरेशन बालाकोट, कश्मीर से अनुच्छेद 370 की वापसी, पाकिस्तान से लगातार तल्ख हो रहे रिश्तों के कारण ही उपजे। नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ, संघर्ष विराम उल्लंघन दोनों की स्थिति भी बढ़ी। दूसरी बात, हमें खतरा चीन से है। भारत के पास पाकिस्तान से निबटने की पूरी क्षमता है, लेकिन भारत चीन और पाकिस्तान से एक साथ नहीं निपट सकता।
पिछले दिनों इस बारे में सैन्य अधिकारियों द्वारा भी जो कहा गया, वह दुरुस्त सोच नहीं थी। चीन 2013 से कुछ ज्यादा आक्रामक हो रहा है और पूरी आशंका है कि 2022 या इसके बाद वह लद्दाख में घुसपैठ की तरह मनमानी पर उतर आए। इसलिए चीन से मुकाबले की तैयारी रखनी चाहिए। यह तैयारी तकनीक, बाजार, व्यापार, सैन्य मामले, सीमा सुरक्षा हर स्तर पर होनी चाहिए। मेजर जनरल मेहता के मुताबिक इस 'ज्ञान' के प्राप्त होने के दो बड़े स्पष्ट संदेश हैं।
पहला, भारत ने सितंबर-अक्तूबर 2020 में पाकिस्तान से बैक चैनल डिप्लोमेसी शुरू की। दोनों देशों के डीजीएमओ ने भी बात की और इसका असर दिखाई दे रहा है। दूसरा बड़ा संकेत, पाकिस्तान की सीमा पर तैनात चार डिवीजन को हटाकर उसकी सैन्य तैनाती चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण सीमा पर की गई। अब हम एलएसी पर सैन्य तैनाती के महत्व को समझ रहे हैं और उस पर अमल कर रहे हैं।
नवंबर दिसंबर तक सार्क सम्मेलन हो जाए तो ताज्जुब नहीं
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि पहले उच्चायोग स्तर पर अधिकारियों की सक्रियता बढ़नी चाहिए। अभी सार्क सम्मेलन होना कुछ समय दूर की बात हो सकती है। इसके पहले जरूरी है कि पाकिस्तान, भारत के साथ रिश्तों को ठोस आधार देने का वातावरण बनाए। शशांक के मुताबिक पाकिस्तान के सैन्य हुक्मरान तो थोड़े अंतराल के बाद चाहते हैं कि भारत से वार्ता चलती रहे। इस संदर्भ में शशांक जनवरी 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपनी पाकिस्तान की यात्रा, उससे बने माहौल और पाकिस्तान के रुख को भी याद करते हैं। शशांक ने माना कि कूटनीति में ज्यादा बोलना मामले को गड़बड़ कर देता है। हम पाकिस्तान को अलग-थलग करने पर बोलने लगे और वह साथ में चीन, ईरान, टर्की, रूस को लेकर आ गए।
सार्क शिखर सम्मेलन के बारे में प्रो. एसडी मुनि कहते हैं कि ऐसा संभव है और हो सकता है कुछ समय भी लग जाए। क्योंकि सार्क सम्मेलन पाकिस्तान में होना है। इसको लेकर भारत और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को छोड़कर किसी सदस्य देश को एतराज नहीं है। अब देखना है कि प्रधानमंत्री मोदी कब पाकिस्तान जाना कुबूल करते हैं? क्योंकि सार्क के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई सदस्य राष्ट्राध्यक्ष सार्क में आने की मंजूरी नहीं देता, तो शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो सकता।
मेरी बात नोट करके रख लीजिए : मेजर जनरल मेहता
मेजर जनरल मेहता दावा करते हैं कि इसे नोट करके रख लीजिए। 7-8 पड़ोसी देशों ने सम्मेलन न हो पाने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया है। इसलिए नवंबर-दिसंबर 2021 तक सार्क सम्मेलन पाकिस्तान में आयोजित होने की संभावना है और भारत उसमें हिस्सा लेगा। मेहता के मुताबिक कूटनीतिक बदलाव से लग रहा है कि जल्द ही इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग सक्रिय हो जाना चाहिए। नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग में भी उच्चायुक्त या स्टाफ आना चाहिए। यह सार्क शिखर सम्मेलन की भूमिका बनाने में मदद करेगा। भारत का हमेशा से मानना है कि पड़ोसी देश के साथ द्विपक्षीय और संवाद के जरिए ही मुद्दे सुलझाने चाहिए। पाकिस्तान को भी ऑपरेशन बालाकोट और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद काफी कुछ समझ में आया है। उसे भी आतंकवाद से पीछा छुड़ाना पड़ेगा।
पहल जारी, लेकिन विदेश मंत्रालय मौन?
प्रो. एसडी मुनि और मेजर जनरल मेहता के इस विश्लेषण पर अभी विदेश मंत्रालय ने मौन साध रखा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव के पास इस मामले में पुरानी लाइन है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक बातचीत की प्रक्रिया शुरू होने की गुंजाइश नहीं है। अर्थ भी वही कि सीमा पर गोली और वार्ता की मेज पर बोली दोनों एक साथ नहीं चल सकती।
लेकिन कूटनीति बड़ी जटिल होती है। जहां सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, वहां कूटनीति की विधा में तमाम रास्ते खुले होते हैं। चीन के साथ लद्दाख में पहले चरण का मसला सुलझाने से लेकर भारत और पाकिस्तान की डीजीएमओ के स्तर पर लंबे समय बाद वार्ता इसी का संकेत है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला, सीडीएस विपिन रावत, सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवाणे, प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसर गोपाल वाग्ले इस मामले में करीब-करीब एक जैसी सोच पर हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को यह ठीक लग रहा है और प्रधानमंत्री मोदी की सहमति से ही भारत ने अपने रुख में एक बदालव शुरू किया है। अब दोनों देशों के रिश्ते गर्मी से बाहर आकर थोड़ा नरम हो सकते हैं।