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Mohan Bhagwat: भारत को जीवित रहना चाहिए, बढ़ना चाहिए..., संजीवनी समाधि के उद्घाटन समारोह में बोले मोहन भागवत
Tue, 17 Dec 2024 10:11 PM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: शुभम कुमार
Updated Tue, 17 Dec 2024 10:11 PM IST
सार
आरएसए प्रमुख ने भारतीय जीवनशैली को दुनिया के सामने पेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को जीवित रहना चाहिए, बढ़ना चाहिए और दुनिया को अपनी जीवनशैली दिखानी चाहिए ताकि अन्य लोग भी इसे अपनाकर सुख और समृद्धि पा सकें।
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मोहन भागवत
- फोटो : ANI
विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को भारत की जीवनशैली को दुनिया के सामने पेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की यह प्रमुख जिम्मेदारी है कि वह अपनी शानदार जीवनशैली को दुनिया के सामने पेश करे, ताकि अन्य लोग भी सुख और समृद्धि प्राप्त कर सकें।
बता दें कि पुणे के पास पिंपरी चिंचवाड़ के औद्योगिक क्षेत्र में मोरया गोसावी संजीवन समाधि समारोह के उद्घाटन के दौरान उन्होंने भारतीय लोकाचार पर भी बात की। जहां उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का सार सबकी भलाई में निहित है।
भारत को जीवित रहना चाहिए- भागवत
भागवत ने आगे कहा कि भारत को जीवित रहना चाहिए, बढ़ना चाहिए और दुनिया को अपनी जीवनशैली दिखानी चाहिए ताकि अन्य लोग भी इसे अपनाकर सुख और समृद्धि पा सकें।
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भारतीय संस्कृति की परंपरा का जिक्र
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विश्व व्यवस्था को संतुलित और धैर्यपूर्ण बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। भारतीय संस्कृति में हमेशा प्रकृति से जुड़ने की परंपरा रही है, जिसे आज के समय में वापस देना कहा जा सकता है। हमारे धर्म का आधार इस सिद्धांत पर है। भागवत ने यह भी बताया कि हमारे पूर्वजों ने संतुलन और शांति का पालन करते हुए सभी के लिए समृद्धि और प्रगति की दिशा में कार्य किया।
भगवान गणेश का दिया उदाहरण
इसके साथ ही भागवत ने भगवान गणेश का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान गणेश समावेशिता और संतुलन के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि उनके बड़े पेट को सहिष्णुता और उनके बड़े कानों को सभी की बात सुनने की क्षमता का प्रतीक बताया। साथ ही उनकी लंबी सूंड हर परिस्थिति को समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता का प्रतीक है।
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बता दें कि पुणे के पास पिंपरी चिंचवाड़ के औद्योगिक क्षेत्र में मोरया गोसावी संजीवन समाधि समारोह के उद्घाटन के दौरान उन्होंने भारतीय लोकाचार पर भी बात की। जहां उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति का सार सबकी भलाई में निहित है।
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भारत को जीवित रहना चाहिए- भागवत
भागवत ने आगे कहा कि भारत को जीवित रहना चाहिए, बढ़ना चाहिए और दुनिया को अपनी जीवनशैली दिखानी चाहिए ताकि अन्य लोग भी इसे अपनाकर सुख और समृद्धि पा सकें।
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भारतीय संस्कृति की परंपरा का जिक्र
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विश्व व्यवस्था को संतुलित और धैर्यपूर्ण बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। भारतीय संस्कृति में हमेशा प्रकृति से जुड़ने की परंपरा रही है, जिसे आज के समय में वापस देना कहा जा सकता है। हमारे धर्म का आधार इस सिद्धांत पर है। भागवत ने यह भी बताया कि हमारे पूर्वजों ने संतुलन और शांति का पालन करते हुए सभी के लिए समृद्धि और प्रगति की दिशा में कार्य किया।
भगवान गणेश का दिया उदाहरण
इसके साथ ही भागवत ने भगवान गणेश का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान गणेश समावेशिता और संतुलन के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि उनके बड़े पेट को सहिष्णुता और उनके बड़े कानों को सभी की बात सुनने की क्षमता का प्रतीक बताया। साथ ही उनकी लंबी सूंड हर परिस्थिति को समझने और उस पर प्रतिक्रिया करने की क्षमता का प्रतीक है।