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India Russia: भारत-रूस एक दूसरे के यहां तैनात करेंगे तीन हजार सैनिक, लड़ाकू विमान भी भेजने की तैयारी

Mon, 20 Apr 2026 06:37 AM IST
Nitin Gautam अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Mon, 20 Apr 2026 06:37 AM IST
सार

भारत ने रूस के साथ सैन्य सहयोग और रसद सहायता को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता किया था, जिसे रेलोस समझौते के नाम से जाना जाता है। इसी समझौते के तहत दोनों देशों के तीन हजार सैनिक एक दूसरे के यहां तैनात हो सकेंगे। फिलहाल यह समझौता पांच साल के लिए है, जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। 

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व्लादिमीर पुतिन और पीएम मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

भारत और रूस के बीच साल 2025 में हुआ RELOS सैन्य समझौता प्रभावी हो गया है। इस समझौते के तहत दोनों देश आपस में सैन्य सहयोग बढ़ाएंगे। दोनों देश एक दूसरे के यहां पांच युद्धपोत व 10 लड़ाकू विमान भी तैनात कर सकेंगे। भारत व रूस अब एक-दूसरे के यहां तीन-तीन हजार तक सैनिकों की तैनाती कर सकेंगे। इन सैनिकों की तैनाती थल व वायु सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों, स्टेशनों पर हो सकेगी। इस सिलसिले में दोनों देशों के बीच फरवरी 2025 में समझौता हुआ था जो अब प्रभावी हो गया है। भारत ने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक रूस के साथ सैन्य सहयोग और रसद सहायता को बढ़ावा देने के लिए भारत-रूस परस्पर रसद आदान-प्रदान समझौता पर हस्ताक्षर किए थे। 
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रूसी समाचार एजेंसी स्पुतनिक के अनुसार, इस समझौते के तहत भारत और रूस ने एक-दूसरे की धरती पर पांच युद्धपोत, 10 लड़ाकू विमान और 3,000 तक सैनिकों की तैनाती पर सहमति जताई है। यह समझौता पांच वर्षों तक प्रभावी रहेगा और इसे बढ़ाया भी जा सकता है। स्वीडन के थिंकटैंक स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (सिप्री) ने 2025 की रिपोर्ट में बताया था कि रूस, भारतीय सेना का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। वर्ष 2020-24 के बीच भारत दुनिया का दूसरे सबसे बड़ा आयातक रहा। भारत के कुल हथियार आयात में रूस 36 प्रतिशत योगदान देता है। 
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आर्कटिक क्षेत्र में भारतीय पहुंच का होगा विस्तार
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, द्विपक्षीय समझौते से आर्कटिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पहुंच का विस्तार होता है। रूस और चीन द्वारा विशाल समुद्री क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के कारण यह क्षेत्र तेजी से वैश्विक समुद्री हॉटस्पॉट बनता जा रहा है। भारत को रूस के मरमांस्क और सेवेरोमोर्स्क के विशाल बंदरगाहों तक पहुंच प्राप्त होगी।
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लंबी दूरी के अभियानों में समय और धन बचेगा
मॉस्को हिंद महासागर में भारतीय नौसेना से रसद सहयोग की उम्मीद कर रहा है। यह समझौता रूस को ईंधन भरने, मरम्मत, अतिरिक्त पुर्जों और आपूर्ति जैसी सहायता प्रदान करेगा। युद्ध और शांति दोनों समय में लागू होने वाला यह समझौता दोनों देशों को लंबी दूरी के अभियानों में धन और समय बचाने में सक्षम बनाएगा।

भारत का अमेरिका के साथ भी ऐसा समझौता
भारत ने अमेरिका के साथ इसी तरह का एक समझौता किया है। इसे लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) कहा जाता है। इसके तहत ईंधन भरने, आपूर्ति और रसद सहायता के लिए सैन्य सुविधाओं तक पारस्परिक पहुंच की अनुमति दी जाती है। हालांकि, सैनिकों की तैनाती के प्रावधान के कारण यह आरईएलओएस से अलग है। आरईएलओएस के तहत आवश्यकता पड़ने पर वस्तुओं के आदान-प्रदान की भी अनुमति है। आरईएलओएस के तहत, लागत प्रतिपूर्ति यानी भुगतान के बजाय वस्तु विनिमय भी संभव है। आरईएलओएस और लेमोआ भारत की बहुराष्ट्र संबंध नीति को रेखांकित करते हैं।

अतिरिक्त एस-400 प्रणाली को मिल चुकी है मंजूरी
रूसी रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने इसी साल 27 मार्च को दुश्मन के लंबी दूरी के हवाई हमलों का मुकाबला करने के लिए अतिरिक्त एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणालियों को मंजूरी दे दी है। यह लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली दुश्मन के मंसूबों को धूल चटाने में सक्षम है। माना जा रहा है कि भारत को पांच नई एस-400 बैटरियों की आवश्यकता है। 2018 के एक पूर्व अनुबंध के तहत भारत को अब तक तीन एस-400 बैटरी मिल चुकी हैं तथा इस साल दो और मिलने वाली हैं। यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध के कारण चौथी बैटरी की डिलीवरी में तीन साल की देरी हो रही है। बताया जा रहा है कि चौथी बैटरी का अंतिम परीक्षण चल रहा है और यह मई या जून में भारत पहुंच जाएगी। अंतिम एस-400 बैटरी 2026 के अंत तक मिलने की उम्मीद है।


ऐतिहासिक हैं भारत-रूस संबंध
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ, रणनीतिक और समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और कूटनीति के क्षेत्रों में मजबूत साझेदारी के साथ, दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ ही दोनों ब्रिक्स, एससीओ और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भी दोनों देश एक-दूसरे का पारंपरिक तौर पर सहयोग करते रहे हैं।

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