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क्या है लिपुलेख दर्रा: नेपाल ने क्यों जताई यहां से भारत-चीन के कारोबार पर आपत्ति, MEA ने क्यों फटकारा? जानें

Fri, 22 Aug 2025 06:39 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 22 Aug 2025 06:39 AM IST
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सार
यह लिपुलेख दर्रा क्या है और यह कहां है? इस दर्रे से जुड़ा इतिहास क्या रहा है? नेपाल ने इसे लेकर आपत्ति क्यों जताई है? और अगर भारत-चीन के बीच व्यापार लंबे समय से जारी था तो क्या नेपाल ने पहले भी इस मुद्दे को उठाया था? आइये जानते हैं...
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India rebuts Nepal claim over Lipulekh Pass Trade China MEA Boundary Issue Strategic importance explained news
लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत की नेपाल को खरी-खरी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत के विदेश मंत्रालय ने बुधवार को नेपाल की उन चिंताओं को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके तहत पड़ोसी देश ने लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन के बीच होने वाले कारोबार पर सहमति को लेकर आपत्ति जताई थी। दरअसल, भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रा लंबे समय से कारोबार का मार्ग रहा है। हालांकि, 2020 में पहले सीमा पर टकराव और फिर कोरोना महामारी के बाद से ही दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र से व्यापार रुका था। अब जब भारत-चीन ने लिपुलेख दर्रे से फिर कारोबार करने पर हामी भरी है तो नेपाल ने इस मुद्दे को उठाया है। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह लिपुलेख दर्रा क्या है और यह कहां है? इस दर्रे से जुड़ा इतिहास क्या रहा है? नेपाल ने इसे लेकर आपत्ति क्यों जताई है? और अगर भारत-चीन के बीच व्यापार लंबे समय से जारी था तो क्या नेपाल ने पहले भी इस मुद्दे को उठाया था? आइये जानते हैं...

पहले जानें- भारत ने लिपुलेख दर्रे पर नेपाल की चिंताओं को लेकर क्या कहा?
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने आपत्ति जताई और कहा कि लिपुलेख नेपाल का अविभाज्य हिस्सा है और इन्हें नेपाल के आधिकारिक नक्शे और संविधान में शामिल किया गया है। मामले में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार 1954 से चल रहा है और यह लंबे समय से प्रचलित है। हाल के वर्षों में यह व्यापार कोविड-19 महामारी और अन्य कारणों से बाधित हुआ था। अब दोनों देशों ने इसे फिर से शुरू करने पर सहमति दी है।

उन्होंने आगे कहा कि नेपाल के क्षेत्रीय दावे न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि इस तरह के दावे केवल बनावटी और एकतरफा बढ़ोतरी हैं, जो स्वीकार्य नहीं हैं। साथ ही जायसवाल ने ये भी कहा कि भारत नेपाल के साथ सीमा से जुड़े सभी मुद्दों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से सुलझाने के लिए हमेशा तैयार है।

अब जानें- लिपुलेख दर्रा क्या हैं और यह कहां है?
लिपुलेख दर्रा भारत की सीमा पर नेपाल से सटा हुआ क्षेत्र है। नेपाल लंबे समय से इस पर अपना दावा करता आ रहा है। इतना ही नहीं नेपाल सीमा पर सटे भारत के कुल 372 वर्ग किमी इलाके, जिसमें भारत-नेपाल-चीन ट्राई-जंक्शन पर लिंपियाधुरा और कालापानी भी शामिल हैं, पर भी दावा करता रहा है। यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले पर हैं। 

इनमें लिपुलेख दर्रे की खास अहमियत है। यह दर्रा हिमालय के पहाड़ों के बीच समुद्र की सतह से करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। भारत-चीन-नेपाल के बीच स्थित इस दर्रे को सदियों से भारत व्यापार के लिए इस्तेमाल करता रहा है। इतना ही नहीं चीन के दायरे में आने वाले कैलाश पर्वत रेंज और मानसरोवर तालाब तक जाने के लिए यह भारत का अहम मार्ग है। इससे भारत के उत्तराखंड में आने वाला कुमाऊं क्षेत्र और तिब्बत का तकलाकोट सीधे जुड़ता है। 

ऐसे में धार्मिक और कूटनीतिक दोनों ही कारणों से लिपुलेख दर्रा भारत के लिए अहम रहा है। धार्मिक इसलिए क्योंकि हिंदुओं, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों के लिए कैलाश मानसरोवर अलग अहमियत रखता है। कूटनीतिक इसलिए, क्योंकि भारत-चीन सीमा पर यह सड़क कनेक्टिविटी, सैन्य लॉजिस्टिक्स और व्यापार मार्ग के तौर पर अहम है। 

क्या है लिपुलेख दर्रे का इतिहास, नेपाल क्यों जता रहा भारत के व्यापार पर आपत्ति?
नेपाल की तरफ से लिपुलेख दर्रे पर कड़ी आपत्ति जताई गई है। उसके विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख के क्षेत्र महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं और ऐतिहासिक रूप से नेपाल का हिस्सा हैं। लिपुलेख नेपाल का अविभाज्य हिस्सा है और इन्हें नेपाल के आधिकारिक नक्शे और संविधान में शामिल किया गया है। 

नेपाल ने भारत और चीन दोनों से लिपुलेख दर्रे के जरिए कारोबार न करने की अपील की है। हालांकि, भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। 

Lipulekh Dispute: भारत ने लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल की आपत्ति खारिज की, दावे को पूरी तरह से बताया बेबुनियाद

दोनों देशों के बीच लिपुलेख दर्रे पर विवाद के मुद्दे को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा। वह भी 100-200 साल पहले। दरअसल, अंग्रेजों और नेपाल के राजशाही शासन के बीच 1814-16 के बीच जंग हुई थी। बाद में सुगौली की संधि में नेपाल को अपना कुछ क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों गंवाना पड़ा। इस संधि के अनुच्छेद 5 के तहत नेपाल के शासकों से काली नदी (महाकाली नदी या शारदा नदी) के उत्तर-पश्चिम में स्थित जमीन का कब्जा हासिल कर लिया गया था। इसके बाद जब ब्रिटिश शासन ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया तो जो नक्शे छपे, उनमें काली नदी को भारत-नेपाल की सीमा की तरह दिखाया जाने लगा।

19वीं सदी के भारत सरकार के प्रशासनिक और राजस्व रिकॉर्ड्स के मुताबिक, कालापानी लंबे समय से भारत का हिस्सा रहा है और इसे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के ही हिस्से के तौर पर देखा जाता है। 1962 के बाद से भारत ने कालापानी पर इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) को भी तैनात किया है।  

कुछ और स्रोतों से जानकारी मिलती है कि 1962 में भारत-चीन युद्ध से पहले तक काली नदी के पूर्व में स्थित गांव- गुंजी, नभी, कुती और कालापानी में नेपाल सरकार जनगणना कराती थी और यहां राजस्व भी वसूला जाता था। हालांकि, भारत-चीन युद्ध के बाद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नेपाल के राजा महेंद्र के पास पहुंचे थे और उनसे कालापानी क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति मांगी। चूंकि यह क्षेत्र भारत-नेपाल और चीन के ट्राई-जंक्शन पर स्थित था और यहां भारतीय सेना का एक बेस भी यहां मौजूद था, इसलिए इसके इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई। 

इसके अलावा कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि बाद में नेपाल के राजा महेंद्र ने यह पूरा क्षेत्र भारत को तोहफे में दे दिया था, हालांकि नेपाल सरकार इसे अब भी अपना हिस्सा मानती है और क्षेत्र पर दावा करती रही है। 

भारत-चीन के बीच लंबे समय से जारी था व्यापार तो नेपाल ने आपत्ति क्यों नहीं जताई?
भारत का कहना है कि उसके और चीन के बीच व्यापार लंबे समय से जारी है और नेपाल की चिंताएं गलत हैं। इस बीच यह सवाल उठने लगे हैं कि अगर लिपुलेख से व्यापार काफी समय से चल रहा था तो नेपाल इसे लेकर अब क्यों चिंता जाहिर कर रहा है। हालांकि, सच्चाई यह है कि नेपाल समय-समय पर इस मुद्दे को भारत के सामने उठाता रहा है। 

दूसरी तरफ लिपुलेख पास से भारत और चीन के बीच व्यापार लंबे समय से जारी है। भारत सरकार का खुद कहना है कि भारत-चीन इस क्षेत्र से 1954 से यहां से व्यापार कर रहे हैं। यानी दोनों के बीच जमीनी व्यापार का यह सबसे पुराना केंद्र रहा है। हालांकि, नेपाल व्यापार को लेकर आपत्ति जताता रहा है। 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से व्यापार बढ़ाने की बात कही थी तो यह मुद्दा नेपाल की संसद से लेकर सड़कों तक पर उठा था। 

भारत ने 2020 में लिपुलेख पास तक एक सड़क भी बनाई है। 80 किलोमीटर लंबी इस सड़क का उद्घाटन तब खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से किया गया था। इस सड़क को चीन के खिलाफ किसी परिस्थिति में सैन्य लिहाज से भी अहम माना जाता है। तीन देशों के ट्राई-जंक्शन पर स्थित होने की वजह से चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी लिपुलेख कूटनीतिक अहमियत रखता है। 2020 में जब सड़क का निर्माण पूरा हुआ था तब भी नेपाल ने सड़क निर्माण पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह बातचीत के जरिए सीमा विवाद सुलझाने के द्विपक्षीय समझौते के उल्लंघन जैसा है। 
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