India’s New Ambassador To China: चीन में भारत के नए राजदूत प्रदीप रावत चीनी मीडिया का इतना ध्यान क्यों खींच रहे हैं, समझिए वो पांच बड़ी वजह
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विस्तार
विदेश मंत्रालय ने सोमवार को बताया कि चीन की आधिकारिक मंदारिन भाषी जानने वाले राजनयिक प्रदीप कुमार रावत बीजिंग में भारत के अगले राजदूत के रूप में पदभार संभालेंगे। नीदरलैंड में भारत के राजदूत रावत विक्रम मिसरी का स्थान लेंगे, जिन्होंने इस महीने की शुरुआत में लगभग तीन साल का कार्यकाल पूरा किया है। रावत की नियुक्ति चीन में तब हो रही है जब दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध तनावपूर्ण है। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलओसी पर अप्रैल 2020 से ही दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने हैं। अब भी गतिरोध बना हुआ है आए दिन कुछ न कुछ तनाव भरी खबरें आती रहती हैं। दोनों देशों के बीच तनाव के बीच आश्चर्यजनक ढंग से पूरे चीनी मीडिया ने प्रमुखता से रावत की नियुक्ति को लेकर खबरें प्रकाशित की हैं।आखिर प्रदीप रावत की नियुक्ति को चीनी मीडिया ने इतना महत्व क्यों दिया है, इसे समझने के लिए हमने पिछले 12 सालों से चाइना मीडिया ग्रुप में कार्यरत वरिष्ठ भारतीय पत्रकार अनिल पांडेय से बातचीत की।
1.चीनी भाषा के ज्ञान से चीनी मीडिया खुश
अनिल पांडेय बताते हैं कि वैसे राजदूतों की नियुक्ति की खबरें प्रकाशित होना एक रुटीन काम है। यह भारत में भी होता है लेकिन प्रदीप रावत को लेकर जो महत्वपूर्ण बात कही जा रही है वह है उनके चीनी भाषा मंदारिन के ज्ञान को लेकर है। रावत धारा प्रभाव मंदारिन बोलते हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति के बाद उनके मंदारिन जानने वाली बात को सभी मीडिया आउटलेट्स ने प्रमुखता से कही है। यहां ग्लोबल टाइम्स के अलावा सभी प्रमुख मीडिया आउटलेट्स नेटईज, टेंसेंट, सिंहुआ, चाइना डेली, चाइना मीडिया ग्रुप आदि ने उनके बारे में खबरें प्रकाशित की हैं। ग्लोबल टाइम्स ने उनके बारे में एक लेख प्रकाशित किया है।
उनके चीनी नाम को लेकर भी उत्साह
अनिल पांडेय बताते हैं कि जब चीन में लोग आते हैं तो चीनी नाम रखते हैं, यह यहां की परंपरा है। प्रदीप कुमार रावत जब चीन में रहे थे तो उन्होंने भी अपने नाम का चीनी अनुवाद किया। उन्होंने अपना चीनी नाम लुओ गुंदोंग रखा है, जिसका मतलब 'पिलर ऑफ द नेशन' होता है। चीनी मीडिया प्रमुखता से कह रहा है कि उन्होंने चीनी नाम भी बहुत बेहतरीन चुना है। अनिल कहते हैं कि हो सकता है कि वे यह कहना चाहते हों कि मैं भारतीय राष्ट्र का स्तंभ हूं। नाम का विशेष मतलब उन्होंने चुन कर रखा है।
2.रावत के लिए चीन नया नहीं
रावत के लिए चीन कोई नया नहीं है। वे हांगकांग और चीन में रहे हैं। वे विदेश सेवा में 1990 में आए। विदेशी भाषा के तौर पर मंदारिन चुनी थी। अपनी पहली सेवा उन्होंने हांगकांग में दी। वे बीजिंग में 1992 से 1997 के बीच रहे। 1997 में दिल्ली लौट आए और तीन वर्षों से अधिक समय तक ईस्ट एशिया डिवीजन में सेवा की। वे इसके बाद उन्होंने मॉरीशस में भारतीय मिशन में प्रथम सचिव के रूप में कार्य किया।
रावत ने काउंसलर के रूप में 2003 में बीजिंग में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया और 2007 में मिशन के उप प्रमुख के तौर पर काम किया। इस दौरान भी रावत चीन के साथ सीमा विवाद पर बातचीत में शामिल रहे। प्रदीव रावत विदेश मंत्रालय में 2014 से 2017 तक ईस्ट एशिया के मामलों में संयुक्त सचिव थे और चीन को लेकर नीतियों का जिम्मा उनके ही पास था।
रावत सीमा पर तनाव से वाकिफ हैं। जिसे उन्होंने विभिन्न क्षमताओं से निपटा है। उन्हें नई दिल्ली में चीन की नीति को संभालने वाले वरिष्ठतम अधिकारियों में से एक माना जाता है। पांडेय के मुताबिक बीजिंग में भारत-चीन संबंधों के विशेषज्ञों को उम्मीद है कि चूंकि वे ईस्ट एशिया पॉलिसी को डील करते रहे हैं। इसलिए चीन को लग रहा है कि मोदी सरकार चीन के साथ अपने संबंध सुधराने चाहती हैं।
उनके मुताबिक बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास में पिछले कई दिनों से सांस्कृतिक कार्यक्रमों में चीन के लोगों को बुलाया जा रहा है ताकि उन्हें भारतीय संस्कृति से रुबरु कराया जा सके। पिछले एक महीने से इस तरह की गतिविधियां बढ़ी है। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कोई संदेश है कि भारत चीन के साथ अपने संबंध बिल्कुल खराब नहीं करना चाहता है। अनिल कहते हैं 'कहना आसान है कि चीन के साथ संबंध तोड़ लें, लेकिन उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है'।
चीनी मीडिया कह रहा है कि संभवत: गलवान और डोकलाम मामले में भी प्रदीप रावत की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। राजदूत रावत को भारत-चीन संबंधों के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने पहले चीन में भारतीय दूतावास में विभिन्न पदों पर कार्य किया है। इसलिए चीनी मीडिया उनकी नियुक्ति को बहुत उत्सुकता से देख रहा है। मीडिया को लगता है कि रावत काफी मैच्योर हैं। चीनी मीडिया ने उम्मीद जताई है कि भारत-चीन के संबंध सुधरेंगे।
ग्लोबल टाइम्स ने शिन्हुआ यूनिवर्सिटी के नेशनल स्ट्रैटेजी इंस्टीट्यूट में शोध विभाग के निदेशक किआन फेंग के हवाले से लिखा है ‘चीन और भारत के रिश्तों को लेकर प्रदीप कुमार रावत के पास व्यापक ज्ञान है। उनके पास दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में आई अड़चनों को सुलझाने का अनुभव भी है।'
हालांकि ग्लोबल टाइम्स से फुदान यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर लिन मिनवांग ने कहा है 'चीन को अच्छे से जानने का मतलब यह नहीं होता है कि वो चीन को लेकर मैत्री संबंध रखें। पहले के भी कई भारतीय राजदूतों ने आने से पहले सकारात्मक संकेत दिए थे, लेकिन चीन और भारत के रिश्तों को पटरी पर लाने में बहुत कम मदद मिली।'
पांडेय के मुताबिक विशेषज्ञों को यह लगता है कि एक राजदूत के आने से भारत-चीन के बहुत बिगड़े संबंधों को सुधारना मुश्किल है और यह तब तक संभव नहीं है जब तक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय पीएम नरेेंद्र मोदी आपस में नहीं मिलते नहीं है। दोनों शीर्ष नेताओं के मिले बिना रिश्तों में सुधार लाना मुश्किल है। फिर भी मीडिया प्रदीप रावत के चीन के राजदूत बनने को सकारात्मक कदम मान रही है।
अनिल पांडेय के मुताबिक प्रदीप रावत संभवत: 2010 से 2013 के बीच में ताइवान (चीन में थाइवान) में रहे हैं, लेकिन उनके रिज्यूमे में इस बात का जिक्र नहीं है। पांडेय बताते हैं चीनी मीडिया को यह बात पसंद आई है। चीनी मीडिया ने इस पर भी बात की है कि उनके रिज्यूमे में ताइवान का जिक्र नहीं करके भारत ने समझदारी का परिचय दिया है। चीनी मीडिया को लगता है कि ताइवान मुद्दे पर भारत उनकी चिंताओं को समझता है इसलिए उनके रिज्यूमे में उनके तीन साल के ताइवान के कार्यकाल का जिक्र नहीं किया गया है।