एआई की रेस में कहां खड़ा है भारत?: सेमीकंडक्टर चिप्स से लेकर इंडियाएआई मिशन तक, क्या है पूरी तैयारी?
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विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्षमता में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है वह आने वाले भविष्य को पूरी तरह से बदलने वाला है। यह तकनीक धीरे-धीरे उद्योग, मेडिकल, शिक्षा, व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग, साइबर सिक्योरिटी समेत कई क्षेत्रों को बड़े स्तर पर प्रभावित करने वाली है। आज के समय एआई तस्वीरें और वीडियो बना सकता है, भाषाएं समझ सकता है, कोड लिख सकता है और बड़ी मात्रा में जानकारी का कुछ ही समय में विश्लेषण कर सकता है।
हालांकि, गौर करने वाली बात ये है कि एआई की असली कहानी सिर्फ उसकी मौजूदा क्षमता तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में एआई ज्यादा जटिल समस्याओं को समझने, खुद से कई चरणों वाले काम पूरे करने और इंसानों के साथ मिलकर ऐसे काम करने में सक्षम हो सकता है, जो आज काफी मुश्किल या समय लेने वाले लगते हैं। बढ़ते विकास के साथ एआई रिसर्च, नई दवाओं की खोज, वैज्ञानिक खोजों और नई तकनीक विकसित करने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि एआई सिर्फ एक टूल नहीं बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियादी तकनीकों में से एक बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में इस बदलाव में भारत की भूमिका भी काफी अहम हो सकती है। बड़ी डिजिटल आबादी, तेजी से बढ़ता टेक सेक्टर और बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग व सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स भारत को एआई की इस रेस में आगे बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
एआई आने वाले दशक में दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर बदल सकता है। नीति आयोग की रिपोर्ट की मानें तो एक अनुमान के मुताबिक अलग-अलग क्षेत्रों में एआई के बढ़ते इस्तेमाल से वैश्विक अर्थव्यवस्था में 17 से 26 ट्रिलियन डॉलर तक की अतिरिक्त आर्थिक वैल्यू पैदा हो सकती है। इस बदलाव में भारत के लिए भी बड़े अवसर दिखाई देते हैं। देश के पास बड़ी STEM (Science, Technology, Engineering And Mathematics) वर्कफोर्स, तेजी से बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम और मजबूत होता रिसर्च नेटवर्क है।
इसी आधार पर यह अनुमान है कि भारत ग्लोबल एआई से पैदा होने वाली वैल्यू का 10 से 15 फीसदी हिस्सा हासिल कर सकता है। भारत में एआई का असर मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। इसमें पहला है इंडस्ट्रीज में एआई के इस्तेमाल से उत्पादकता को बढ़ाना, दूसरा है एआई की मदद से रिसर्च और इनोवेशन को तेज करना और तीसरा है ज्यादा उन्नत टेक्नोलॉजी सेवाएं विकसित करना। हालांकि, यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि भारत की जो ये क्षमता है उसको वास्तविक आर्थिक फायदे में बदलने के लिए बेहतर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल कर्मचारियों, सरकार, कंपनियों व शिक्षा जगत के बीच मजबूत सहयोग की जरूरत होगी।
एआई को लेकर भारत के सामने चुनौतियां क्या हैं?
भारत के सामने एक बड़ी चुनौती ब्रेन ड्रेन की है। देश में तैयार हुए एआई स्किल्ड रिसर्चर और वर्कफोर्स नौकरी या अवसरों की तलाश में दूसरे देशों में जा रहे हैं। 2026 एआई इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार दूसरे देशों की तुलना में भारत से बड़ी संख्या में एआई रिसर्चर विदेश जाते हैं। एक तरफ भारत के पास एआई से जुड़ी बड़ी और तेजी से बढ़ती प्रतिभा है। वहीं दूसरी तरफ हमारी यही प्रतिभा देश के बाहर जाकर काम कर रही है। अगर देश अपने इन एआई स्किल्ड रिसर्चर और वर्कफोर्स को बेहतर रिसर्च सुविधाएं, अच्छी नौकरियां और इनोवेशन के अवसर प्रदान करता है, तो इस प्रतिभा को रोका जा सकता है।
इस प्रतिभा की मदद से भारत एआई रेस में आगे निकलनी की नई संभावनाओं की तलाश कर सकता है। खास बात ये है कि हमारे देश के छात्र जनरेटिव एआई टूल्स का इस्तेमाल अमेरिका के छात्रों की तुलना में ज्यादा करते हैं। इन सब के अलावा देश में एआई का इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को लेकर विदेशीं कंपनियों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है। माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन ने भारत में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन के लिए कुल 52.5 अरब डॉलर के निवेश करने की बात कही है। इन सब के अलावा गूगल ने विशाखापत्तनम में 15 अरब डॉलर का एआई हब बनाने का फैसला भी लिया है।
सेमीकंडक्टर चिप्स की रेस में आगे बने रहने के लिए क्या कर रहा है भारत?
एआई की रेस में आगे बने रहने के लिए सेमीकंडक्टर चिप्स का एक महत्वपूर्ण योगदान है। यही वजह है कि रेयर अर्थ मिनरल्स और सेमीकंडक्टर चिप्स के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कई देश अभी से कदम उठाने लगे हैं। भारत भी इसमें पीछे नहीं है। भारत की जो सेमीकंडक्टर रणनीति है वो सिर्फ दुनिया की मौजूदा दौड़ में शामिल होने की नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाने की है।
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2035 तक भारत 120 से 150 अरब डॉलर की सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन तैयार करने का लक्ष्य रख सकता है। इसके लिए भारत का जोर केवल सबसे छोटे और अत्याधुनिक चिप्स बनाने पर नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों पर भी होगा जहां उसकी रणनीतिक जरूरतें और मौजूदा क्षमताएं मजबूत हैं।
इसमें मॅच्योर-नोड चिप्स, एनालॉग और मिक्स्ड-सिग्नल चिप्स, सिलिकॉन कार्बाइड और गैलियम नाइट्राइड जैसे कंपाउंड सेमीकंडक्टर शामिल हैं। इनका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, टेलीकॉम और औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। इसके साथ भारत सेमीकंडक्टर डिजाइन और सिस्टम आर्किटेक्चर में अपनी इंजीनियरिंग प्रतिभा का फायदा भी उठाना चाहता है।
लक्ष्य यह रखा गया है कि भारत, ओएसएटी (outsourced semiconductor assembly and test) और एडवांस्ड पैकेजिंग का दुनिया के शीर्ष तीन केंद्रों में शामिल हो और जरूरी सेमीकंडक्टर सामग्री की सप्लाई में मजबूत भूमिका बनाए।
भारत सरकार ने जुलाई महीने में कुल 1,27,500 करोड़ रुपये का भारी बजट के साथ सेमीकॉन 2 को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य सेमीकंडक्टर के विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना है। इन सब के अलावा देश में चिप डिजाइन को लेकर नए प्रोजेक्ट को मंजूदी दी गई है। इसके अलावा कंपनियों को इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन टूल्स ऑटोमेशन भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इडियाएआई मिशन
भारत सरकार ने एआई के क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए इंडिया एआई मिशन की शुरुआत की है। मार्च 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस मिशन के लिए पांच साल में 10,300 करोड़ रुपये से ज्यादा के बजट को मंजूरी दी थी। इसका उद्देश्य देश में एआई के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता, रिसर्च, स्टार्टअप और कुशल प्रतिभा का मजबूत आधार तैयार करना है।
इस योजना का एक प्रमुख हिस्सा भारतएआई कंप्यूट क्षमता है। इसके अंतर्गत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए 10 हजार से ज्यादा जीपीयू वाली एआई कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करने की योजना रखी गई थी। इससे स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को महंगे कंप्यूटिंग संसाधनों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।
मिशन में एआई स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग, भारतीय डाटा सेट्स तक बेहतर पहुंच और देश में एआई से जुड़े रिसर्च को बढ़ावा देने की योजनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा इंडिया एआई फ्यूचरस्किल्स के जरिए विश्वविद्यालयों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी डाटा और एआई की शिक्षा को विस्तार देने पर जोर है।