श्रीलंका में आर्थिक बदहाली: बुरे समय में काम आया पुराना दोस्त, युवाओं में चीन के विरुद्ध बढ़ा आक्रोश
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विस्तार
श्रीलंका की बदहाल अर्थव्यवस्था के बीच उसका पुराना दोस्त भारत ही काम आया है। भारत ने श्रीलंका को न केवल डीजल और अन्य पेट्रो पदार्थों की मदद उपलब्ध कराई है, बल्कि चावल और अन्य खाद्य सामग्री भी भेजी है। श्रीलंका को दो चरणों में एक बिलियन डॉलर और 1.5 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराई गई है। इससे श्रीलंका के जनसमुदाय के बीच भारत के प्रति समर्थन बढ़ा है। जबकि श्रीलंका में भारी निवेश करने वाले चीन के प्रति नाराजगी बढ़ी है।
भारत ने जहां मानवीय आधार पर मदद उपलब्ध कराई है, वहीं चीन अपने कर्ज के लिए भारी मुनाफा कमा रहा है। अनुबंधों के अनुसार श्रीलंकाई सरकार को 2026 तक प्रति वर्ष चीन को 6.5 बिलियन डॉलर का भुगतान करना है। जबकि श्रीलंका के पास इस समय डीजल-पेट्रोल खरीदने तक के लिए डॉलर उपलब्ध नहीं रह गया है। युवाओं में इस बात से नाराजगी बढ़ रही है कि चीन अपने एक कर्ज के भुगतान के लिए श्रीलंका को दूसरा नया कर्ज देने की पेशकश कर रहा है। इससे उनका देश कर्ज के जाल में उलझ गया है। श्रीलंकाई पोर्ट 99 साल के लिए चीन को लीज पर दिए जा चुके हैं। युवाओं को लग रहा है कि इन्हें श्रीलंका को वापस मिलने में उनकी तीन-चार पीढ़ी गुजर जाएगी। इस हालात में लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है।
चीन से ज्यादा लोगों की नाराजगी अपने ही देश की सरकार और प्रशासन से है। उन्हें लग रहा है कि देश को सही तरीके से न चला पाने, और बेहद महत्वपूर्ण मामलों में उचित निर्णय न लेने के कारण स्थिति गंभीर हुई है। कैबिनेट के इस्तीफे से भी लोगों की नाराजगी कम नहीं हुई है। 36 घंटे के कर्फ्यू के खत्म होने के बाद भी इमरजेंसी लगाई जा चुकी है। सरकार के विरुद्ध बोलने पर लोगों की गिरफ्तारी हो रही है। लेकिन इसके बाद भी लोग सड़कों पर उतरकर जबरदस्त प्रदर्शन कर रहे हैं। लोगों के तेज प्रदर्शन के बाद 13 घंटे के पॉवर कट को हटाकर छह घंटे का कर दिया गया है। लेकिन लोगों की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही है।
व्यापारियों की समस्या गंभीर
हिंदू इकोनॉमिक फोरम, श्रीलंका के उपाध्यक्ष अशोक कुमार जैन ने अमर उजाला को बताया कि वे राजधानी कोलंबो में रहकर टेक्सटाइल का व्यापार करते हैं। पिछले 30 वर्षों में श्रीलंका में इतनी महंगाई का कभी सामना नहीं करना पड़ा जितना इस समय करना पड़ रहा है। खाद्यान्न कीमतें इतनी अधिक हो गई हैं कि लोग अपनी पूरी आय खर्च करने के बाद भी अपनी भोजन की जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
चरम पर महंगाई
उन्होंने बताया कि जो चावल एक महीने पहले 90 से 95 श्रीलंकाई रुपये में मिल रहा था, आज उसकी कीमत 220 रुपये से ज्यादा हो चुकी है। दूध कीमतें 90 रुपये से बढ़कर 250 रुपये और चीनी 120 रुपये प्रति किलो से 280 रुपये तक हो चुकी हैं। 120 रुपये प्रति किलो वाली दाल अब 500 रुपये प्रति किलो तक हो गई है। हर घर में उपयोग होने वाले मिल्क पाउडर की कीमत 375 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 790 रुपये प्रति किलो तक हो गई है। इसी प्रकार अन्य खाद्यान्न वस्तुओं के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि हो गई है जो आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
देश के बीमार लोगों के लिए दवाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। लोग अपनी आवश्यक चेकअप और खराब हालत में भी अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं। भारत ने श्रीलंका को आवश्यक दवाओं को उपलब्ध कराया है, लेकिन इन दवाओं को लोगों तक पहुंचाने में भी बढ़ा आ रही है। लोगों के पास पैसा होते हुए भी खाना पकाने के लिए गैस तक उपलब्ध नहीं हो पा रही है।
चूंकि, देश में डीजल-पेट्रोल की उपलब्धता नहीं रह गई है, व्यापारी आवश्यक सामान भी नहीं मंगवा पा रहे हैं, इसलिए कोई पैसा देकर भी सामान खरीदना चाहे तो उसे सामान नहीं मिल पा रहा है। व्यापारियों के सामने बड़ी समस्या यह है कि विदेश से सामान मंगाने के लिए उनके पास डॉलर नहीं हैं। आवश्यक सामानों को मंगाने के लिए उन्हें तीन गुना से अधिक श्रीलंकाई रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है।
डॉलर की कालाबाजारी
श्रीलंकाई रुपये की लगातार कम होती कीमतों के बीच लोग अपना धन सोने या डॉलर में सुरक्षित कर देना चाहते हैं। यही कारण है कि डॉलर की कीमत 185 रुपये से बढ़कर 400 श्रीलंकाई रुपये तक हो गई है। घोषित मूल्य के बाद भी डॉलर नहीं मिल रहा है और इसकी जमकर कालाबाजारी हो रही है।
यदि किसी श्रीलंकाई कंपनी ने विदेश में अपने कर्मचारी नियुक्त किए हैं तो उनके मद में भी उन्हें तीन गुना से ज्यादा का भुगतान करना पड़ रहा है। कोलंबो एयरपोर्ट या बंदरगाह तक सामान आने के बाद भी उसे लाने में समस्या आ रही है क्योंकि व्यापारियों को परिवहन संसाधन नहीं मिल पा रहा है। अपना वाहन होने के बाद भी लोग आवागमन करने में समर्थ नहीं हैं।