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ढाई घंटे चली चर्चा के बाद भी भारत-चीन के रिश्ते अनिश्चित
Fri, 11 Sep 2020 01:08 PM IST
Tanuja Yadav
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Tanuja Yadav
Updated Fri, 11 Sep 2020 01:08 PM IST
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भारत-चीन (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
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लद्दाख में चीन से लगी सीमा में पांच मई से जारी गतिरोध का कोई ठोस हल नहीं निकला है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के दस सितंबर को लगभग ढाई घंटे चर्चा हुई। बातचीत में दोनों देशों के नेताओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएएसी) पर शांति और सद्भाव के प्रयासों पर जोर दिया। भारत ने मई से लेकर अब तक चीन द्वारा की गई हरकत पर विरोध भी जताया। बातचीत के बाद पांच बिंदुओं पर सहमति भी बन गई है।
सैन्य तैनाती पर सवाल
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वांग यी से पूछा कि आखिर चीन ने एलएएसी के पास फौजी तैनाती क्यों बढ़ाई है। 1993 और 1996 में दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए सहमति बनी थी और समझौता हुआ था। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि चीन को लेकर भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव के पक्ष में भी नहीं है।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि एलएसी के तनाव का असर दोनों देशों के रिश्तों पर भी पड़ सकता है। इसलिए चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हुए अपनी फौज को पीछे बुलाना चाहिए।
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पांच बिंदु जिन पर भारत-चीन हैं राजी
लेकिन भविष्य क्या है?
अब जबकि दोनों देशों के विदेश मंत्री बात कर चुके हैं, देखना होगो कि चीन इसका कितना पालन करता है। 15 जून को हुई सैन्य झड़प के बाद भी दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने आपस में बात की थी। इसके बाद पांच जुलाई को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि (एनएसए अजीत डोभाल और स्टेट काऊंसलर वांग यी) की चर्चा भी हुई थी। इसी बातचीत के दौरान गलवां घाटी क्षेत्र में बफर जोन बनाने पर सहमति बनी थी तथा चीन और भारत की सेना कुछ पीछे हटी थी।
वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआडिनेशन (डब्ल्यूएमसीसी) अपना काम करता रहा। संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों में सहमति के बाद लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के सैन्य अधिकारी बैठक करते रहे। इसलिए जब तक चीन की सेना पीछे नहीं हटती तब कुछ नहीं कहा जा सकता है।
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सैन्य तैनाती पर सवाल
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वांग यी से पूछा कि आखिर चीन ने एलएएसी के पास फौजी तैनाती क्यों बढ़ाई है। 1993 और 1996 में दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए सहमति बनी थी और समझौता हुआ था। विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि चीन को लेकर भारत की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी तनाव के पक्ष में भी नहीं है।
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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि एलएसी के तनाव का असर दोनों देशों के रिश्तों पर भी पड़ सकता है। इसलिए चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करते हुए अपनी फौज को पीछे बुलाना चाहिए।
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पांच बिंदु जिन पर भारत-चीन हैं राजी
- दोनों विदेश मंत्रियों के बीच में सहमति बनी है कि आपसी रिश्तों में भिन्नता के मुद्दे को टकराव का रूप नहीं लेने देंगे।
- दोनों ने माना कि सीमा क्षेत्र के ताजा हालात किसी भी पक्ष के हित में नहीं हैं। शांति और सौहार्द बहाली के लिए विभिन्न स्तरों पर बातचीत की प्रक्रिया जारी रखेगी। यथाशीघ्र तनाव को दूर करने के लिए आपस में निश्चित दूरी बनाएगी।
- दोनों देश इस बात पर सहमत हुए हैं कि आपस में बनी सहमतियों, समझौतों और उसके प्रोटोकॉल का गंभीरता से पालन करेंगे।
- सीमा विवाद के समाधान के लिए विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता और संवाद प्रक्रिया को जारी रखा जाएगा। वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआर्डिनेशन की बैठकों का दौर जारी रहेगा और वह अपना काम करती रहेगी।
- स्थिति को सामान्य, परस्पर बनाए रखने के लिए भारत और चीन विश्वास बहाली की स्थापना की दिशा में नए कदम उठाने पर काम करेंगे।
लेकिन भविष्य क्या है?
अब जबकि दोनों देशों के विदेश मंत्री बात कर चुके हैं, देखना होगो कि चीन इसका कितना पालन करता है। 15 जून को हुई सैन्य झड़प के बाद भी दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने आपस में बात की थी। इसके बाद पांच जुलाई को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि (एनएसए अजीत डोभाल और स्टेट काऊंसलर वांग यी) की चर्चा भी हुई थी। इसी बातचीत के दौरान गलवां घाटी क्षेत्र में बफर जोन बनाने पर सहमति बनी थी तथा चीन और भारत की सेना कुछ पीछे हटी थी।
वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआडिनेशन (डब्ल्यूएमसीसी) अपना काम करता रहा। संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों में सहमति के बाद लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के सैन्य अधिकारी बैठक करते रहे। इसलिए जब तक चीन की सेना पीछे नहीं हटती तब कुछ नहीं कहा जा सकता है।