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कूटनीति: क्या चीन घटा रहा है लद्दाख क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती, क्या कहती है रक्षा मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट
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भारत-चीन सीमा पर ड्रैगन बना रहा बुनियादी ढांचे
- फोटो : ANI
चीन की सरकार अब भारत से सीमा विवाद का एक साथ अंत चाहती है। उसकी यह मांग नेहरू के दौर है। हालांकि, भारत इसका हल राजनीतिक स्तर पर करना चाहता है। इस बीच रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट पर गौर करें तो एक बात साफ है कि चीन ने लद्दाख क्षेत्र में सैनिकों की संख्या घटाई है।
रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में यह साफ नहीं है कि चीन की तरफ कितने सैनिक तैनात हैं। हालांकि, भारत ने स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखते हुए लद्दाख क्षेत्र में अपने सैनिकों की रणनीतिक तैयारी कर रखी है। फिलहाल चीन की ओर से अपने सैनिकों को पीछे जाने की घटना और रक्षा मंत्रालय द्वारा इसकी स्वीकार्यता को एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में यह साफ नहीं है कि चीन की तरफ कितने सैनिक तैनात हैं। हालांकि, भारत ने स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखते हुए लद्दाख क्षेत्र में अपने सैनिकों की रणनीतिक तैयारी कर रखी है। फिलहाल चीन की ओर से अपने सैनिकों को पीछे जाने की घटना और रक्षा मंत्रालय द्वारा इसकी स्वीकार्यता को एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
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क्या है रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में
रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि चीन के 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड सैनिक तैनात हैं। इतने ही सैनिक पीछे सीमा से दूर चीन के पारंपरिक ट्रेनिंग क्षेत्र में मौजूद हैं। एक आकलन व्यक्त किया गया है कि पूरी एलएसी (चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चीन के करीब 40-50 हजार तैनात हैं, जबकि अक्तूबर 2024 में समझौते से पहले अकेले 60 हजार के करीब सैनिक केवल लद्दाख के इलाके में तैनात थे।
बता दें कि अक्तूबर 2024 में भारत और चीन के बीच में डेपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील और विवादित क्षेत्र से सैनिकों की तैनाती कम करने के लिए समझौता हुआ था। यह समझौता दोनों देशों के बीच में जारी कूटनीतिक प्रयासों के जरिए हुआ था। इसके बाद से भारत और चीन में लगातार कूटनीतिक, राजनयिक, सीमा विवाद का समाधान निकालने के लिए विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता का दौर चल रहा है। इसी के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पिछले महीने अपने समकक्ष वांग यी से वार्ता करके लौटे थे। इस वार्ता में शांति प्रयासों को नए चरण में ले जाने और सहयोग को दिशा देने पर सहमित बनी थी।
रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि चीन के 10 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड सैनिक तैनात हैं। इतने ही सैनिक पीछे सीमा से दूर चीन के पारंपरिक ट्रेनिंग क्षेत्र में मौजूद हैं। एक आकलन व्यक्त किया गया है कि पूरी एलएसी (चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चीन के करीब 40-50 हजार तैनात हैं, जबकि अक्तूबर 2024 में समझौते से पहले अकेले 60 हजार के करीब सैनिक केवल लद्दाख के इलाके में तैनात थे।
बता दें कि अक्तूबर 2024 में भारत और चीन के बीच में डेपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील और विवादित क्षेत्र से सैनिकों की तैनाती कम करने के लिए समझौता हुआ था। यह समझौता दोनों देशों के बीच में जारी कूटनीतिक प्रयासों के जरिए हुआ था। इसके बाद से भारत और चीन में लगातार कूटनीतिक, राजनयिक, सीमा विवाद का समाधान निकालने के लिए विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता का दौर चल रहा है। इसी के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पिछले महीने अपने समकक्ष वांग यी से वार्ता करके लौटे थे। इस वार्ता में शांति प्रयासों को नए चरण में ले जाने और सहयोग को दिशा देने पर सहमित बनी थी।
भारत के लिए मुश्किल, लेकिन चीन के लिए आसान
सीमावर्ती क्षेत्र में सैनिकों की संख्या घटाना, बढ़ाना चीन के लिए बहुत आसान है। इसका कारण वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार की भौगोलिक स्थिति, चीन की तरफ किया गया विकास, आधारभूत संरचना आदि है। चीन की तरफ से टैंक, सैन्य वाहन और अन्य फर्राटा भरते हुए आते हैं। जबकि भारत के लिए यह मुश्किल भरा और समय लेने वाला मामला है। इसका कारण सीमावर्ती क्षेत्र में भारतीय आधारभूत संसाधनों नें कमी, पहाड़ी रास्ते तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट की कमियां हैं। भारत के लिए लद्दाख क्षेत्र और समूची वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों की तैनाती काफी खर्चीली भी होती है। ठंड के समय में कपड़े, जूते, आवास, सुविधा को लेकर यह खर्च कई गुणा बढ़ जाता है।
25वें दौर की वार्ता में दिखाई पड़ी थी केमिस्ट्री
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल 25-26 अगस्त 2026 को चीन दोरे पर थे। मकसद था चीन के अपने समकक्ष वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद निपटारे के लिए 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता करना। दोनों शीर्ष इस बात पर सहमत हुए कि...
सीमावर्ती क्षेत्र में सैनिकों की संख्या घटाना, बढ़ाना चीन के लिए बहुत आसान है। इसका कारण वास्तविक नियंत्रण रेखा के उस पार की भौगोलिक स्थिति, चीन की तरफ किया गया विकास, आधारभूत संरचना आदि है। चीन की तरफ से टैंक, सैन्य वाहन और अन्य फर्राटा भरते हुए आते हैं। जबकि भारत के लिए यह मुश्किल भरा और समय लेने वाला मामला है। इसका कारण सीमावर्ती क्षेत्र में भारतीय आधारभूत संसाधनों नें कमी, पहाड़ी रास्ते तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट की कमियां हैं। भारत के लिए लद्दाख क्षेत्र और समूची वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा बलों की तैनाती काफी खर्चीली भी होती है। ठंड के समय में कपड़े, जूते, आवास, सुविधा को लेकर यह खर्च कई गुणा बढ़ जाता है।
25वें दौर की वार्ता में दिखाई पड़ी थी केमिस्ट्री
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल 25-26 अगस्त 2026 को चीन दोरे पर थे। मकसद था चीन के अपने समकक्ष वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद निपटारे के लिए 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि स्तरीय वार्ता करना। दोनों शीर्ष इस बात पर सहमत हुए कि...
- दोनों देशों के बीच में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखना पहली और अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।
- दोनों देश सीमा पर अगस्त 2024 से शुरू हुई सैनिकों की तैनाती में कटौती की प्रक्रिया को जारी रखें। तनाव कम करने की प्रक्रिया को मजबूत करने का प्रयास बढ़ाया जाए।
- इसके साथ-साथ सीमा पर बनी शांति और सौहार्द को दीर्घकालिक, स्थायी रूप देना। सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देश राजनयिक और सैन्य तंत्र(डब्ल्यूएमसीसी) की बैठकें और गहन संवाद जारी रखेंगे।
पैकेज सॉल्यूशन और पॉलिटिकल सेटलमेंट के तहत कोशिश जारी
दोनों देशों के सैन्य कमांडर्स मिल रहे हैं। सीमा विवाद के समाधान संबंधी प्रयास आगे बढ़ रहे हैं। एनएसए की चीन यात्रा के दौरान संयुक्त बयान भी जारी हुए थे। इन बयानों में मुख्य बिन्दुओं पर समानता थी। बस अंतर दो शब्द के थे। चीन ने अपने बयान में सीमा संबंधी विवाद के निपटारे में ‘पैकेज सल्यूशन’ का जिक्र किया था। भारत की तरफ से इसके स्थान पर ‘पॉलिटिकल सेटलमेंट’ का जिक्र। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि चीन को पैकेज सल्यूशन शब्द में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन भारत में इसे अच्छा नहीं माना जाता। इसलिए भारत ने पॉलिटिकल सॉल्यूशन शब्द का प्रयोग किया है।
दोनों देशों के सैन्य कमांडर्स मिल रहे हैं। सीमा विवाद के समाधान संबंधी प्रयास आगे बढ़ रहे हैं। एनएसए की चीन यात्रा के दौरान संयुक्त बयान भी जारी हुए थे। इन बयानों में मुख्य बिन्दुओं पर समानता थी। बस अंतर दो शब्द के थे। चीन ने अपने बयान में सीमा संबंधी विवाद के निपटारे में ‘पैकेज सल्यूशन’ का जिक्र किया था। भारत की तरफ से इसके स्थान पर ‘पॉलिटिकल सेटलमेंट’ का जिक्र। विदेश मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि चीन को पैकेज सल्यूशन शब्द में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन भारत में इसे अच्छा नहीं माना जाता। इसलिए भारत ने पॉलिटिकल सॉल्यूशन शब्द का प्रयोग किया है।
अब आगे क्या होगा?
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रवैया सहयोगात्मक, सकारात्मक रहा। द्विपक्षीय वार्ता के दौरान आपसी हित से जरूरी सभी मुद्दों पर बात हुई। भारत और चीन इस बात पर सहमत हैं कि दोनों में टकराव अच्छा नहीं है। भारत सीमा विवाद को भरोसा से जोड़ता है और इसके निबटारे को सीमा पर शांति और सौहार्द का मुख्य आधार मानता है। एनएसए डोभाल की एक अजमाई कूटनीति है। वह किसी स्थिति को तीन हिस्से में बांटते हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रवैया सहयोगात्मक, सकारात्मक रहा। द्विपक्षीय वार्ता के दौरान आपसी हित से जरूरी सभी मुद्दों पर बात हुई। भारत और चीन इस बात पर सहमत हैं कि दोनों में टकराव अच्छा नहीं है। भारत सीमा विवाद को भरोसा से जोड़ता है और इसके निबटारे को सीमा पर शांति और सौहार्द का मुख्य आधार मानता है। एनएसए डोभाल की एक अजमाई कूटनीति है। वह किसी स्थिति को तीन हिस्से में बांटते हैं।
- जहां लगभग सहमति है, उसे निर्णायक रूप दिया जाए। जैसे सिक्किम से लगती सीमा पर भारत और चीन में आम सहमति है। इसे अंतिम रूप देने पर सहमत हो सकते हैं।
- जिस विवाद को सुलझाया जा सकता है, उसे सुलझाने की ईमानदारी से पहल की जाए। जैसे लद्दाख के डेपसांग, डेमचोक समेत कुछ क्षेत्र को छोड़कर अन्य। इसी तरह से तवांग के कुछ क्षेत्र छोड़कर वास्तविक नियंत्रण रेखा के कम विवाद वाले क्षेत्र।
- जटिल विवाद वाले मुद्दे पर डब्ल्यूएमसीसी समेत विवाद निबटारे की ठोस प्रक्रिया( राजनीतिक, राजनयिक और सैन्य प्रबंधन तंत्र के गहन संवाद और प्रयास) से हल। माना जा रहा है कि भारत और चीन इस दिशा में आगे बढ़ते हुए पीपुल-टू पीपुल कांटैक्ट, व्यापार और कारोबार को गति तथा द्विपक्षीय व्यापार, कारोबार को संतुलित बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।