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वो तीन मजबूरियां जिसकी वजह से चीन को पीछे खींचने पड़े कदम

Mon, 06 Jul 2020 02:11 PM IST
अनवर अंसारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Mon, 06 Jul 2020 02:11 PM IST
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India China border news: Three reasons that led china and PLA to step back in galwan valley on LAC
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

आखिरकार ड्रैगन काबू में आता दिख रहा है। पिछले दो महीने से भी ज्यादा समय तक एलएसी पर तनाव की स्थिति पैदा करने वाली चीनी सेना ने सोमवार को अपने कदम पीछे खींच लिए। चीन की वजह से सीमा पर बीते कुछ हफ्तों से काफी तनाव की स्थिति थी। 

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यहां तक कि 14-15 जून को चीनी सेना की घुसपैठ को रोकने के प्रयास में हुई हिंसक झड़प में हमारे 20 जवान भी शहीद हो गए। चीन की चालबाजियों के बावजूद भारत डटा रहा और लगातार ड्रैगन पर दबाव बनाना जारी रखा। अब उसके कदम पीछे होने को भारत की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। 
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चीन पर दबाव बनाने के लिए भारत ने चौतरफा घेरे बंदी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक लद्दाख पहुंचे और उन्होंने जवानों में जोश भरा। सीडीएस जनरल बिपिन रावत समेत तीनों सेनाओं के प्रमुख भी समय-समय पर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। इसके अलावा भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बनाने में कामयाबी हासिल की। इसके अलावा लद्दाख का प्रतिकूल मौसम भी चीन की अकड़ तोड़ने में एक अहम हथियार साबित हुआ। 

आइए आपको बताते हैं, चीन की वो तीन मजबूरियां जिसकी वजह से उसे भारत के आगे झुकना पड़ा है।

(1) भारत का कूटनीतिक प्रयास

भारत और चीन के बीच जब सीमा विवाद शुरू हुआ तो नई दिल्ली ने इसका समाधान बातचीत के जरिए करने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर पर बैठकें हुई, लेकिन ये बैठकें बेनतीजा निकलीं। इसके बाद भी अतंरराष्ट्रीय समुदाय ने भारत और चीन को वार्ता के जरिए इस समस्या का समाधान करने की सलाह दी। 

भारत ने भी अपनी कूटनीति का प्रयोग करते हुए उन देशों को अपने साथ लिया, जिनसे चीन का तनाव है। चीन पर पहले से ही कोरोना वायरस को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव था। भारत को सीमा विवाद पर अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का साथ मिला। इन देशों ने चीन के विस्तारवादी रवैये का खुलकर विरोध किया और भारत को समर्थन दिया। 

इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक लेह के दौरे पर पहुंचे और उन्होंने वहां सेना के जवानों से मुलाकात कर उनका मनोबल बढ़ाया। पीएम मोदी ने थलसेना, वायुसेना और आईटीबीपी के जवानों से मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौजूदा स्थिति की पूरी जानकारी दी।

पीएम मोदी ने भारतीय जवानों को संबोधित किया और चीन को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि लेह, लद्दाख से लेकर करगिल और सियाचिन तक, यहां की बर्फीली चोटियों से लेकर गलवां घाटी की ठंडे पानी की धारा तक। हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा-जर्रा, हर कंकड़, पत्थर भारतीय सैनिकों के पराक्रम की गवाही दे रहा है। 

मोदी ने आगे कहा कि विस्तारवाद की जिद किसी पर सवार हो जाती है तो उसने हमेशा विश्व शांति के सामने खतरा पैदा किया है और यह न भूलें इतिहास गवाह है। ऐसी ताकतें मिट गई हैं या मुड़ने को मजबूर हो गई है। 

इससे पहले, सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे भी लद्दाख पहुंचे थे और हालात का जायजा लिया था। वह सबसे पहले लेह स्थित सैनिक अस्पताल पहुंचे जहां घायल जवानों का इलाज चल रहा था। उन्होंने फॉरवर्ड स्थानों का दौरा किया और कमांडरों के साथ हालात पर चर्चा की।

वहीं, सीमा तनाव के बीच वायुसेना प्रमुख आरकेएस भदौरिया ने भी लद्दाख का दौरा किया था। उन्होंने फॉरवर्ड बेस पहुंच कर अधिकारियों से स्थिति पर समीक्षा की। 

प्रधानमंत्री और सेना प्रमुखों का दौरा चीन के लिए एक सबक था कि भारत किसी भी परिस्थिति में पीछे नहीं हटेगा और उसकी किसी भी चाल का मुंहतोड़ जवाब देगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर भी लगातार सीमा विवाद को लेकर रूस और अमेरिका के साथ चर्चा करते रहे। 

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और जयशंकर के बीच सीमा तनाव को लेकर कई बार चर्चा हुई। इसमें अमेरिका ने भारत के प्रति समर्थन जताया। इसके अलावा जयशंकर ने अपने रूसी समकक्ष से भी इस संबंध पर वार्ता की। रूस ने आश्वासन दिया था कि वह इस मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा है। रूस ने कहा कि वह भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान चाहता है। 

(2) अंतरराष्ट्रीय दबाव

चीन में पिछले साल दिसंबर महीने में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया। इसके बाद देखते-देखते यह वायरस पूरी दुनिया में फैल गया। अमेरिका समेत पूरा यूरोप इस वायरस से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कोरोना वायरस को लेकर चीन पर वैश्विक बिरादरी पहले से ही नाराज थी, ऊपर से भारत के साथ तनाव ने वैश्विक बिरादरी को चीन के खिलाफ एकजुट कर दिया। 

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो लगातार भारत का समर्थन करते हुए सीमा विवाद को लेकर चीन पर हमला बोलते रहे। पोम्पियो ने झड़प में शहीद हुए जवानों को लेकर कहा कि चीन के साथ हाल में हिंसक झड़प में सैनिकों के मारे जाने पर भारत के लोगों के प्रति हम गहरी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं। इस दुख की घड़ी में हम उन जवानों, उनके परिवार, उनके चाहने वालों और भारत के लोगों के साथ हैं। 

इसके अलावा वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को निशाने पर लेते हुए कह चुके थे कि ये दुनिया के लिए खतरा है। पोम्पियो ने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों से अमेरिका समेत कई देशों के नागरिकों की सुरक्षा को खतरा है। उन्होंने कहा, दशकों में ट्रंप प्रशासन पहला है जिसने इस खतरे को गंभीरता से लिया है। 

इसके अलावा अमेरिका ने चीन को चुनौती देते हुए यूरोप से अपने सैनिकों को कम करके एशिया में तैनात किया, इससे भी चीन पर दबाव बढ़ा। अमेरिका के विदेश मंत्री ने कहा, मैंने इस महीने यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत की, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी शांतिपूर्ण पड़ोसियों को लगातार धमका रही है, वहीं भारत के साथ यह टकराव की स्थिति में है। 

उन्होंने चीन को खतरा बताते हुए कहा, कुछ जगहों पर अमेरिकी संसाधन कम होंगे, क्योंकि उनकी तैनाती उन जगहों पर होगी जहां चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी आक्रामक सैन्य कार्रवाई को बढ़ा दिया है। हम अपनी सेना को भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण चीन सागर के उन जगहों पर तैनात करने जा रहे हैं, जहां चीन की सेना से सबसे ज्यादा खतरा है। हम यह तय करेंगे कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का मुकाबला करने के लिए हम सेना को सही जगह पूरी ताकत के साथ तैनात करें।  

(3) गलवां नदी में बढ़ा जलस्तर

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में गतिरोध के प्वाइंट पर पांच किलोमीटर की दूरी पर बड़ी संख्या में सैनिकों को एकत्र किया हुआ था। लेकिन बर्फ पिघलने की वजह से गलवां नदी का जलस्तर बढ़ने लगा, जिस कारण चीनी सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। 

एक वरिष्ठ सैन्य कमांडर ने बताया था कि बर्फ से ढकी गलवां नदी जो अक्साई चीन क्षेत्र से निकलती है उसका जल स्तर तापमान में बढ़ोतरी के कारण बढ़ रहा है। तीव्र गति से बर्फ पिघलने की वजह से नदी तट पर कोई भी स्थिति खतरनाक हो सकती है। उन्होंने कहा था कि उपग्रह और ड्रोन तस्वीरों से पता चलता है कि नदी किनारे स्थित चीनी टेंट बाढ़ की वजह से डूब सकते हैं। 

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