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भारत कैसे करेगा, चीन से बिगड़ते रिश्तों का सामना

Fri, 19 Jun 2020 09:57 PM IST
Jeet Kumar बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 19 Jun 2020 09:57 PM IST
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India-China Border Dispute: how will india face bad relations with china
India-China

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 2014 में अहमदाबाद की मुलाक़ात हो या 2019 में महाबलीपुरम में एक साथ सैर करना, तब दोनों देशों के बीच मधुर लगे रहे रिश्ते अब कड़वाहट और टकराव से भर गए हैं।

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चीन और भारत के बीच सीमा विवाद और प्रतियोगी भावना हमेशा रही है लेकिन बढ़ती आर्थिक निर्भरताओं के कारण ये भावना दबती नजर आ रही थी। लेकिन गलवान घाटी में हुई झड़प ने दोनों देशों के बीच फिर से वही कड़वाहट पैदा कर दी है।
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झड़प में 20 भारतीय सैनिक मारे गए हैं और चीन और भारत एक-दूसरे पर हमला करने के आरोप लगा रहे हैं। इधर भारत में चीनी विरोध लहर चल पड़ी है और चीनी सामान के बहिष्कार की मांग हो रही है।
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ऐसे में चीन और भारत के रिश्ते जल्द ही फिर से पटरी पर आते मुश्किल लग रहे हैं। लोगों में भावनात्मक उफान है और सीमा पर कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि जान देने वाले सैनिकों को नहीं भूला जाएगा।

इन हालात में चीन से बिगड़ते संबंधों के बीच भारत के पास संतुलन बनाने के लिए कौन से विकल्प हैं? भारत किस तरह दक्षिण एशिया में चीन का सामना करते हुए अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

रिश्ते सुधरने में लंबा समय लगेगा
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के चीनी अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली का मानना है कि भारत-चीन के बीच रिश्ते ठीक होना बहुत मुश्किल लग रहा है। सैनिकों की मौत होने से दोनों के संबंधों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। विश्वास बहाली के प्रयास भी कमजोर हुए हैं।

वो कहते हैं, “चीन के खिलाफ बनी एक राष्ट्रीय धारणा का भी कारोबार पर असर पड़ेगा। चीनी सामानों का बहिष्कार करने की अपील की जा रही है। ऐसे में संबंधों को सामान्य बना पाना आसान नहीं होता। हालाँकि, कूटनीति और कारोबार हमेशा चलते रहते हैं लेकिन बाहरी तौर पर गर्मजोशी नहीं रहती। कारोबारी निर्भरता बढ़ने से जो लोगों में संपर्क बढ़ा था और दूरी कम हुई थी, उसे वापस पाने में समय लगेगा।”

भारत और चीन आपसी सहयोगी भी हैं और प्रतियोगिता भी। ऐसे में अगर बिगड़ते संबंधों के साथ चीन भारत के लिए चुनौती बनकर आता है, तो भारत के लिए उसका सामना करने और संतुलन बनाने के लिए क्या विकल्प होंगे?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भले ही दोनों देशों के बीच रिश्ते कितने भी बेहतर दिखें लेकिन एक आंतिरक दूरी और प्रतियोगिता बनी रहती है। दोनों देशों की अपनी महत्वाकांक्षाएँ हैं। इसलिए भारत एशिया में चीन के साथ संतुलन बनाने के लिए पहले से ही प्रयास करता है।

अब उसे अपने प्रयासों में तेजी लानी होगी। इसमें दो मुख्य तरीके हैं- भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी और पश्चिमी देशों से चीन की दूरी और भारत की नजदीकी।

'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' पर फोकस
भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने शुरू की थी, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में बदल दिया। इसके तहत भारत ने एशिया के दूसरे देशों में आर्थिक विकास के अवसर खोजने पर जोर दिया।

लेकिन, आर्थिक फोकस वाली भारत की ये नीति धीरे-धीरे कूटनीतिक हो गई। भारत दक्षिण पूर्वी देशों से कनेक्टिविटी और व्यापार बढ़ाना चाहता है। मोदी सरकार ने कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए 2015 में एक अरब डॉलर की घोषणा भी की थी।

म्यांमार से भारत की सीमा लगती है, जो भारत के लिए दक्षिण पूर्व एशिया का गेटवे है। भारत, थाइलैंड और म्यांमार 1400 किमी. लंबे एक हाईवे पर काम कर रहे हैं।

दक्षिण एशियाई देशों जैसे थाइलैंड, वियतनाम, म्यांमार, वियतनाम, सिंगापुर, फिलीपिंस और कंबोडिया जैसे देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ करने की इस नीति को चीन के साथ संतुलन बनाए रखने की नीति के तौर पर भी देखा जाता है।

श्रीकांत कोंडापल्ली कहते हैं कि इस नीति में तीन चीजें हैं- कॉमर्स, कनेक्टिविटी और कल्चर। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इन तीन ‘सी’ का ज़िक्र किया था। भारत को पहले इन देशों के साथ संबंध मजबूत करके अपनी क्षमता बढ़ानी होगी. चीन के साथ संतुलन तभी बनेगा जब आप क्षमतावान होंगे।

एक्ट ईस्ट पॉलिसी में भारत सरकार अपना आधारभूत ढांचा विकसित करने की कोशिश कर रही है, जैसे सड़कें और हाइवे बनाना। साथ ही कारोबार बढ़ाने पर भी सरकार का फोकस है।

आसियान (दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन) देशों के साथ भारत निवेश बढ़ा रहा है। वहीं, संस्कृति की बात करें तो कुछ दक्षिण एशियाई देशों के साथ भारत की संस्कृति मिलती-जुलती है। इस सामनता को उभारकर देशों के साथ घनिष्ठता बढ़ाई जा रही है।

आसियान का उद्देश्य ही है कि सदस्य देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता को कायम रखा जाए। साथ ही झगड़ों का शांतिपूर्ण निपटारा हो।

चीन के खराब संबंधों से कितना फायदा?
भारत और चीन दोनों ही एक-दूसरे के पड़ोसियों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें करते रहे हैं। लेकिन, चीन ने जिस तरह विवादित क्षेत्रों में आक्रामक रुख अपनाया है, इससे उस क्षेत्र के देशों की चिंताएँ बढ़ी हैं और भारत को इससे अपना असर बढ़ाने में मदद मिली है। विशेषज्ञ भारत के लिए इसे एक मौका मानते हैं।

दक्षिण चीन सागर के नटूना आइलैंड पर अधिकार को लेकर चीन का इंडोनेशिया के साथ सालों से विवाद चल रहा है। दक्षिण चीन सागर में ही पारसेल आइलैंड्स को लेकर चीन और वियतनाम आमने-सामने हैं।

दोनों देशों के बीच स्पार्टी आइलैंड्स को लेकर भी विवाद चल रहा है। दक्षिण चीन सागर में ही जेम्स शोल पर चीन और मलेशिया दोनों अपना दावा करते हैं।

चीन, दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है। इसके कारण आसपास के देशों के साथ इसका तनाव तो पहले से ही है। लेकिन अब अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत नौवहन का मुद्दा उठाकर चीन को चेतावनी दी है।

ये परिस्थितियाँ भारत के हक में कितनी जाती हैं इसे लेकर सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में रिसर्च फेलो और चीन मामलों के जानकार अतुल भारद्वाज कहते हैं कि भारत अकेला ही चीन के साथ संतुलन नहीं बना सकता।

ऐसे में उसे दूसरे देशों का साथ मिलने से मदद मिल सकती है। इसे लेकर भारत को अपने प्रयास तेज करने होंगे।

वहीं श्रीकांत कोंडापल्ली का कहना है कि भारत इन देशों से संबंध बेहतर करके ना सिर्फ़ चीन की चिंताएँ बढ़ा सकता है बल्कि खुद को मजबूत भी कर सकता है।

उदाहरण के तौर पर भारत और जापान के बीच तीन-चार क्षेत्रों में टू प्लस टू वार्ता बढ़ाने की कोशिश की गई। जापान भारत को अर्थव्यवस्था और तकनीक के स्तर पर मदद कर रहा है। जैसे बुलेट ट्रेन और दिल्ली-मुंबई इनवेस्टमेंट कॉरिडोर के लिए जापान ने भारत को कर्ज दिया।

वो कहते हैं, ''इसी तरह जापान एक समुद्री ताकत है जिससे भारत अपनी क्षमताएँ बढ़ा सकता है। तीसरा अंतरिक्ष में और चौथा बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस जैसे क्षेत्रों में भारत और जापान सहयोग कर रहे हैं। अगर आप इन देशों के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाएँगे तो इससे बाज़ार और अर्थव्यवस्था बढ़ेगी। इससे लोगों का संपर्क और परिवहन बढ़ जाता है।”

पश्चिमी देश और चीन
हाल ही में पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की ऑनलाइन शिखर वार्ता काफी चर्चित रही थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच सात समझौते भी हुए।

इसमें सामरिक गठजोड़ के स्तर पर साजो-सामान (लॉजिस्टिक) के क्षेत्र में सहयोग के उद्देश्य से एक-दूसरे के सैन्य अड्डों तक पहुँच सुगम बनाने को लेकर समझौता हुआ।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सहयोग पर संयुक्त बयान जारी किया गया। माइनिंग, क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग के फील्ड में सहयोग का करार हुआ।

ये सब ऐसे वक्त में हुआ जब अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देश चीन को कोरोना वायरस के प्रसार और गलत जानकारी देने के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। चीन पर जानकारी छिपाने से लेकर जैविक हथियार बनाने तक के आरोप लगाकर चीन को घेरने की कोशिश कर रहे हैं।

अब क्या भारत इस गठजोड़ का हिस्सा बनकर चीन पर दबाव बना सकता है। इस पर अतुल भारद्वाज कहते हैं, “रणनीतिक रूप से देखें तो भारत पहले से ही उस समूह का हिस्सा है। भले ही ये आधिकारिक नहीं है। चीन को नियंत्रित करने के लिए अमरीका भी भारत का साथ चाहता है।”


उन्होंने कहा, “हालाँकि, भारत कोरोना वायरस को लेकर चीन के खिलाफ उतना मुखर नहीं हुआ है। भारत हमेशा संतुलन बनाने की कोशिश करता है। अगर वो पूरी तरह पश्चिमी देशों के साथ चला जाएगा तो आगे चलकर इसका असर चीन के साथ कारोबार पर भी पड़ेगा। इसलिए भारत पश्चिमी देशों की तरफ झुकाव तो दिखाता है लेकिन उनके एजेंडे में पूरी तरह शामिल नहीं होता। उम्मीद है कि यही रुख़ भारत आगे भी अपनाएगा।”

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