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बढ़ते राजनीतिक दबाव का परिणाम हैं यूपी में दो पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई आत्महत्याएं

Sat, 29 Sep 2018 05:18 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 29 Sep 2018 05:18 PM IST
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increasing political pressure is main cause of suicides committed by police officers
देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश में पिछले पांच महीनों में दो पुलिस अधिकारियों ने विभिन्न कारणों के चलते आत्महत्या कर ली। दोनों ही अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर तैनात थे। आत्महत्या करने वाले अधिकारियों में एक कानपुर में एसपी (पूर्वी) के पद पर थे, तो दूसरे आतंकरोधी दस्ते में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात थे। इन घटनाओं ने उत्तर प्रदेश पुलिस के माथे पर लकीरें खींच दी हैं। 
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इन घटनाओं ने सवाल की शक्ल अख्तियार कर ली है। सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस के अधिकारी, सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा उनके व्यक्तिगत हितों को पूरा करने के लिए डाले जाने वाले दबाव के बीच, अपने कार्य और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन नहीं बना पाते? ऐसी घटनाएं स्पष्ट इंगित करती हैं कि कुर्सी पर काबिज तथाकथित जनसेवक न तो स्वयं ईमानदारी से कार्य कर रहे हैं और न ही इन अधिकारियों को करने दे रहे हैं। इसी ऊहापोह, क्या करें और कैसे करें, के बीच एक अधिकारी इतना पिस जाता है कि अपनी जान देने के सिवाय उसे कोई और रास्ता नहीं सूझता।  
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भारतीय पुलिस सेवा में उच्च अधिकारी और आतंकरोधी दस्ते (एटीएस) के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात थे राजेश साहनी। साहनी ने 29 मई को लखनऊ के गोमतीनगर में अपने ही कार्यालय में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। वहीं, 2014 बैच के आईपीएस अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास ने छह सितंबर को सल्फास खा लिया था। तीन दिनों बाद अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। दोनों अधिकारियों द्वारा ऐसा कदम उठाने के स्पष्ट कारण अभी तक नहीं पता चले हैं। हालांकि, अलग-अलग कारणों से दोनों के तनाव में होने की बात उनके साथी स्वीकार करते हैं। 

पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह यह बात मानते हैं कि पुलिस विभाग बेहद तनाव में है। यह स्थिति तब है जब लंबे समय से अधिकारी काम के ज्यादा दबाव और परिवार को समय न दे पाने और लालची मालिकों के बारे में व्यक्तिगत रूप से लगातार शिकायत करते रहे हैं। 

 

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि अब काम पहले से ज्यादा कठिन है। इसके लिए दबाव डाला जाता है और यही अनावश्यक दबाव आत्महत्या का कारण बनता है। जनता के सामने अपनी बेहतर छवि बनाने के लिए राज्य सरकार पुलिस पर बेहतर परिणामों के लिए दबाव डालती है। यह दबाव व्यक्ति को किस कदर प्रभावित करता है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुरेंद्र दास ने आत्महत्या का तरीका गूगल से खोजा। 

मायावती की सरकार में तीन साल तक सेवाएं देने वाले पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह भी मानते हैं कि बढ़ता राजनीतिक दबाव पुलिसकर्मियों को तनाव में जाने पर मजबूर कर देता है। उनके मुताबिक काम का दबाव और नेताओं की उदासीनता ने पुलिस अधिकारियों की सहनशक्ति को बहुत कम कर दिया है। सिंह बताते हैं कि उन्होंने प्रसिद्ध आईपीएस बीएस बेदी के साथ काम किया था। वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों के हितों की चिंता करते थे। सिंह कहते हैं कि पुलिस का संयुक्त परिवार अब टूट सा गया है। 
 
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पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता पुलिस को 'द्रौपदी' कहते हैं। वह ऐसा इसलिए कहते हैं कि पुलिस ही है जो सबके प्रति जवाबदेह है, फिर चाहे वह राजनेता हों, जनता हो, आरटीआई के सवाल हों, अदालतें हों या मानवाधिकार कार्यकर्ता हों। वह कहते हैं कि ये स्थितियां निश्चित ही चिंता का कारण बनती हैं। ये स्थितियां केवल कार्यक्षेत्र ही नहीं बल्कि, पारिवारिक विवाद का कारण भी बनती हैं। 

पूर्व डीजीपी श्रीराम अरुण कहते हैं कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव सबसे ज्यादा रहता है। चुटकी बजाते ही अधिकारी का तबादला कर दिया जाता है। उनका कहना है कि इन स्थितियों का समाधान पुलिसकर्मी ही कर सकते हैं। उन्हें गलतियों के विरोध में खड़ा होना होगा। वहीं, सत्तासीन लोगों को भी यह समझना होगा कि बेहतर पुलिस व्यवस्था दबाव बनाकर नहीं बनाई जा सकती। इसके लिए उन्हें पुलिस व उसके अधिकारियों के साथ बेहतर संबंध बनाने होंगे। 
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