त्रिपुरा चुनाव: क्या भाजपा भेद पाएगी लेफ्ट का किला?
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अगर 1988 से 1993 तक कांग्रेस नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को छोड़ दें तो त्रिपुरा में 1978 से लेकर अब तक वाम मोर्चा की सरकार है। वर्तमान मुख्यमंत्री माणिक सरकार 1998 से सत्ता में हैं। इसी महीने 18 फरवरी को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा और भारतीय जनता पार्टी कम्युनिस्टों के इस मजबूत किले में सेंध लगाने का दावा कर रही है। भाजपा प्रमुख अमित शाह दो-तिहाई बहुमत से जीत हासिल करने का दावा कर रहे हैं। पिछले दो दशकों में यह पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के साथ प्रदेश की सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। त्रिपुरा के 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने 50 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था जिनमें से 49 की जमानत जब्त हो गई थी। आखिर पिछले पांच सालों में ऐसा क्या हो गया कि बीजेपी दो-तिहाई बहुमत से जीत का दावा कर रही है? वरिष्ठ पत्रकार परन्जॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''जहां तक हमारी जानकारी है तो उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में विकास को देखा जाए तो त्रिपुरा में ग्रामीण विकास, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण आदि में अच्छा काम हुआ है।''
परन्जॉय इसे अमित शाह का चुनावी जुमला मानते हुए कहते हैं कि देश भर में माणिक सरकार के कामों की तारीफ होती है, वे सबसे कम संपत्ति वाले मुख्यमंत्री हैं। साक्षरता दर के मामले में त्रिपुरा देश भर में अव्वल है। मानव विकास सूचकांक में भी बीजेपी शासित राज्यों से काफी आगे है। मनरेगा को लागू करने में भी त्रिपुरा पहले नंबर पर है। मुख्यमंत्री माणिक सरकार के बारे में कहा जाता है कि वो अशांत त्रिपुरा में शांति और सुरक्षा बहाल करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे में अमित शाह त्रिपुरा के पिछड़ने की बात क्यों कह रहे हैं। इस सवाल के जवाब में त्रिपुरा में भाजपा प्रभारी सुनील देव धर कहते हैं कि त्रिपुरा में विकास के तमाम आंकड़े गलत साबित हुए हैं। सुनील कहते हैं, ''शिक्षा के मामले में त्रिपुरा के आंकड़े गलत बताए जाते हैं। यहां आठवीं कक्षा में महज पंद्रह प्रतिशत बच्चे पास हो पाते हैं। सिर्फ नाम लिखना जानने से कोई शिक्षित कैसे हो सकता है।''
सुनील धर आगे कहते हैं, ''त्रिपुरा में 67 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे रहती हैं। यहां महिलाओं पर अत्याचार होता है। अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। मनरेगा के जो आंकड़े त्रिपुरा सरकार ने जारी किए वे फर्जी थे। यहां मनरेगा का पूरा पैसा भी नहीं दिया जाता।'' त्रिपुरा में वाम मोर्चा की सरकार ने अच्छे और बुरे दिन दोनों देखे हैं। वाम मोर्चा की सरकार को राज्य में उग्रवाद खत्म करने का श्रेय दिया जाता है और इसी आधार पर यहां से आफ्स्पा यानी आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को वापस लिया गया था। राज्य में आदिवासियों के एक धड़े की त्रिपुरा से अलग तिपरालैंड बनाने की मांग लंबे समय से रही है। इनका कहना है कि राज्य में आदिवासियों की पहचान खतरे में है। जब यूपीए सरकार ने आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा की थी तो एक बार फिर से तिपरालैंड की मांग को हवा मिली थी। अलग राज्य की मांग को लेकर राज्य में लंबे समय से अशांति का माहौल रहा है।
कहा जाता है कि माणिक सरकार ने इस पूरे विवाद को ठीक से हैंडल किया। माणिक सरकार पर भाजपा की जो राय है उसे किस रूप में देखा जाना चाहिए। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर प्रभात पटनायक कहते हैं, ''जिस विकास की बात अमित शाह करते हैं वह असल विकास नहीं है, विकास का असली अर्थ तो यही है कि आम आदमी के क्या हालात हैं, वहां शिक्षा व स्वास्थ्य के कैसी व्यवस्था है।'' 1940 के दशक से ही त्रिपुरा में आदिवासी और गैरआदिवासी आबादी के बीच टकराव की स्थिति रही है। भारत के विभाजन और बांग्लादेश बनने के बाद बड़ी संख्या में इस राज्य में पलायन हुआ था। त्रिपुरा में आदिवासियों के लिए विधानसभा की एक तिहाई सीटें रिजर्व हैं। भाजपा ने त्रिपुरा में आईपीएफ़टी से चुनावी गठबंधन किया है।
प्रभात पटनायक कहते हैं, ''अगर भाजपा जोड़तोड़ कर त्रिपुरा में सरकार बनाने में कामयाब हो गई तो डर है कि वहां बांग्लादेशी और आदिवासियों के बीच दोबारा टकराव उभर सकता है। त्रिपुरा एक संवेदनशील राज्य है। माणिक सरकार ने इस टकराव को नियंत्रित कर रखा है। अगर बीजेपी की सरकार आई तो डर है कि आदिवासियों को नजरअंदाज किया जाने लगेगा और इससे विद्रोह बढ़ने का खतरा है।'' वहीं, त्रिपुरा में भाजपा की मौजूदगी पर परन्जॉय मानते हैं कि मौजूदा वक्त में त्रिपुरा में वाम दल के सबसे बड़े विरोधी के रूप में बीजेपी उभरकर आई है और वह प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में आती हुई तो दिखती है। त्रिपुरा देश का तीसरा सबसे छोटा राज्य है। देश की राजनीति में त्रिपुरा का कोई खास हस्तक्षेप नहीं है। पर बीजेपी अगर यहां चुनाव जीतती है तो वामपंथी पार्टियों के लिए गहरा झटका होगा। भाजपा को कभी हिन्दी प्रदेश की पार्टी कहा जाता था लेकिन त्रिपुरा में अगर उसे कामयाबी मिली तो पूर्वोत्तर भारत में उसकी पकड़ और मजबूत होगी।