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मंदिरों के शहर में दरगाहों पर भी जुटती है भीड़?

Mon, 04 Sep 2017 05:02 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Mon, 04 Sep 2017 05:02 PM IST
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In the city of the temples, there is mob gathering on the dargahs too?
जम्मू

भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर के जम्मू शहर को अकसर मंदिरों का शहर भी कहा जाता है, लेकिन मंदिरों के इस शहर की हर दूसरी-तीसरी गली में आपको मुसलमानों के किसी न किसी पीर फकीर की दरगाह जरूर मिलती है। हिंदू बहुल आबादी वाले इस शहर में दरगाहों की इस लोकप्रियता की क्या वजह हो सकती है? 

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अफाक काजमी जम्मू के पुराने शहर में रहते हैं और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनसे हम शहर के चर्चित पीर, पीर मीठा के मजार पर मिले। उनका कहना है कि यहां लोगों का विश्वास है कि दरगाहों पर, मजारों पर जाकर उनकी मन्नतें, मुरादें पूरी होती हैं। 
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इसलिए धर्म,समुदाय या फिरके की परवाह किए बिना लोग यहां आते हैं और अपनी मुरादें मांगते हैं। उनका कहना है कि यहां आप जितना नया काम देख रहे हैं ये सब गैर मुस्लिम लोगों ने कराया है, किसी मुसलमान ने नहीं।

हिंदुओं और सिखों का विश्वास

In the city of the temples, there is mob gathering on the dargahs too?
दरगाह

1947 में होने वाले बंटवारे से पहले जम्मू में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर थी, लेकिन अब शहर में करीब दस फीसदी मुसलमान ही रह गए हैं। ऐसे में ये दरगाहें हिंदुओं और सिखों के विश्वास की वजह से ही आबाद हैं। सतवारी में बाबा बूढ़न शाह की दरगाह पर हमें सरदार अमरवीर सिंह जी मिले जो स्वंय भी एक गुरुद्वारे में रागी हैं। 

बाबा के सामने हम कोई भी फरियाद करते हैं तो वो पूरी हो जाती है। मेरी बच्ची के बाजू में समस्या रहती थी, मैं कई डॉक्टरों के पास गया, वो दवा देते, लेकिन दवा बंद करते ही समस्या फिर लौट आती। फिर मैं अपनी बच्ची को यहां लेकर आया, इसके बाद किसी दवा दारू की जरूरत नहीं हुई। पुराने शहर के इलाके गोमठ में ठीक एक मंदिर के सामने सतगजे पीर की मजार पर हमें शशि कोहली मिलीं। 

हम ने उनसे जब ये पूछा कि वो मजार पर क्यों आती हैं तो उन्होंने कहा, यहां आकर दिल को सुकून मिलता है. मेरा भाई बेरोजगार था, मैं यहां आने जाने लगी तो मेरा भाई काम पर लग गया। बस उसी की मेहरबानी है। जहां एक तरफ़ कुछ विशेषज्ञ पूरे इलाके में कट्टरपंथी ताकतों की कामयाबी और मुसलमानों के खिलाफ बनने वाले माहौल पर चिंता व्यक्त करते हैं, वहीं एक सदियों पुरानी, मिली-जुली तहजीब के ताने-बाने आज भी साफ नजर आते हैं। 

1947 के खूनखराबे ने जम्मू शहर को बदल कर रख दिया और यहां तक कि हिंदू और मुसलमानों के बीच साफ तौर एक अंधेरी खाई पैदा कर दी। मगर जम्मू की दरगाहों को देखकर ऐसा लगता है कि इन अंधेरों में विश्वास के दिए अब भी रोशन हैं। 

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