{"_id":"635fa27d01549238ed653bbf","slug":"in-morbi-bridge-collapse-case-know-more-about-the-ndrf-and-other-rescue-agencies-work-news-in-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"Morbi Bridge Collapse: NDRF से पहले ही पहुंच गए ये 'देवदूत', रात में दो टीम हुई एयरलिफ्ट, ऐसे आगे बढ़ा ऑपरेशन","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Morbi Bridge Collapse: NDRF से पहले ही पहुंच गए ये 'देवदूत', रात में दो टीम हुई एयरलिफ्ट, ऐसे आगे बढ़ा ऑपरेशन
Mon, 31 Oct 2022 03:55 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
Published by: जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 31 Oct 2022 03:55 PM IST
सार
एनडीआरएफ के डीआईजी 'ऑपरेशन'/'ट्रेनिंग' मोहसिन बताते हैं, दूसरे ऑपरेशनों की तरह ये भी एक मुश्किल टॉस्क था। नदी में सीवरेज का पानी था, इसलिए वहां देख पाने में कुछ मुश्किल आई। साफ पानी के मुकाबले सीवरेज या किसी दूसरे सोर्स के जरिए आ रहे गंदे पानी में दृश्यता का स्तर काफी कम हो जाता है। उस स्थिति में उपकरण भी ज्यादा काम नहीं आते।
विज्ञापन
मोरबी पुल हादसे के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल एनडीआरएफ की टीमें।
- फोटो : Social Media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना पुल गिरने के कारण 130 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, सेना और लोकल पुलिस के पहुंचने से पहले स्थानीय लोगों ने गजब की फुर्ती दिखाई। उनके पास न तो उपकरण थे और न ही पर्याप्त लाइट का इंतजाम। सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचने वाले लोगों के पास अगर कुछ था तो बस 'हौसला'। इसी के बलबूते, जिन्हें थोड़ा बहुत भी तैरना आता था, वे डूबते लोगों को बचाने के लिए मच्छु नदी में कूद गए। आसपास के लोग, जो नदी में कूदे, वे किसी देवदूत से कम नहीं थे। एनडीआरएफ की पांच में से दो टीमों को एयरलिफ्ट किया गया। रात में 'ऑपरेशन' के दौरान एनडीआरएफ के गोताखोर लाइट लेकर कम दृश्यता वाले पानी में उतरे। सूरज निकलने से पहले लगभग 70 फीसदी 'ऑपरेशन' पूरा हो चुका था।
मोरबी में रविवार शाम करीब साढ़े छह बजे पुल टूटने की घटना हुई थी। एनडीआरएफ के एक अधिकारी के मुताबिक, घटनास्थल पर सुरक्षा बलों के पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर राहत बचाव कार्य शुरु कर दिया था। एनडीआरएफ की पहली टीम रात दो बजे मोरबी में पहुंची थी। उससे पहले सामान्य लोगों के साथ मिलकर लोकल एजेंसियां और निकटवर्ती क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बल, राहत बचाव कार्य में लगे हुए थे। पुल पर मौजूद बहुत से लोग ऐसे थे, जो एक दूसरे के परिचित थे। अनेक परिवार भी वहां पहुंचे थे। यही वजह रही कि पुल टूटने के बाद जिसे भी थोड़ा बहुत तैरना आता था, वे लोगों को बचाने के लिए नदी में कूद पड़े।
एनडीआरएफ के डीआईजी 'ऑपरेशन'/'ट्रेनिंग' मोहसिन बताते हैं, दूसरे ऑपरेशनों की तरह ये भी एक मुश्किल टॉस्क था। नदी में सीवरेज का पानी था, इसलिए वहां देख पाने में कुछ मुश्किल आई। साफ पानी के मुकाबले सीवरेज या किसी दूसरे सोर्स के जरिए आ रहे गंदे पानी में दृश्यता का स्तर काफी कम हो जाता है। उस स्थिति में उपकरण भी ज्यादा काम नहीं आते। इसके लिए एनडीआरएफ ने मैनुअल तरीका अपनाया। डीप गोताखोरों को लाइट से लैस कर पानी में उतारा गया। इसके बाद जैसे जैसे एनडीआरएफ की बाकी टीमें वहां पहुंचती गई, बचाव कार्य में तेजी आती चली गई। अंडर वाटर 'आरओबी' का इस्तेमाल किया गया।
विज्ञापन
एनडीआरएफ की पांच टीमें (125 जवान) वहां पहुंची थी। आखिरी टीम, जो सुबह पौने पांच बजे नदी पर पहुंची, ने तुरंत राहत कार्य शुरु कर दिया था। नदी में सीवरेज का पानी था, इसलिए थोड़ी बहुत भी दिक्कतें आई। अगर नदी का बहाव तेज होता तो राहत एवं बचाव ऑपरेशन में कुछ समय लग सकता था।
बतौर डीआईजी मोहसिन, सबसे अच्छी बात यह रही कि इस घटना में लोगों एवं दूसरे बलों के बीच गजब का तालमेल रहा। आसपास के लोगों ने बहुत मदद की। इसके अलावा स्थानीय पुलिस और निकटवर्ती सुरक्षा बलों ने भी समय रहते, बचाव कार्य शुरु कर दिया था। नदी में गिरे 170 लोगों को तो लोकल पुलिस और आसपास रहने वाले व्यक्तियों ने ही बाहर निकाल लिया था। दरअसल, इस तरह के ऑपरेशन में सामुदायिक जागरूकता बड़ी कारगर साबित होती है। अगर आसपास में ही पचास सौ लोगों को ठीक से तैरना आता है तो वे इस तरह के संकट में बड़े मददगार साबित हो सकते हैं। आम लोगों के अलावा कई सिविल संगठन भी घटना स्थल पर पहुंचे थे। उन्होंने भी लोगों की मदद की। यह देखने के लिए कि वहां कोई शव तो नहीं फंसा है, पुल का मलबा खंगाला जा रहा है।
विज्ञापन
मोरबी में रविवार शाम करीब साढ़े छह बजे पुल टूटने की घटना हुई थी। एनडीआरएफ के एक अधिकारी के मुताबिक, घटनास्थल पर सुरक्षा बलों के पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर राहत बचाव कार्य शुरु कर दिया था। एनडीआरएफ की पहली टीम रात दो बजे मोरबी में पहुंची थी। उससे पहले सामान्य लोगों के साथ मिलकर लोकल एजेंसियां और निकटवर्ती क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बल, राहत बचाव कार्य में लगे हुए थे। पुल पर मौजूद बहुत से लोग ऐसे थे, जो एक दूसरे के परिचित थे। अनेक परिवार भी वहां पहुंचे थे। यही वजह रही कि पुल टूटने के बाद जिसे भी थोड़ा बहुत तैरना आता था, वे लोगों को बचाने के लिए नदी में कूद पड़े।
विज्ञापन
एनडीआरएफ के डीआईजी 'ऑपरेशन'/'ट्रेनिंग' मोहसिन बताते हैं, दूसरे ऑपरेशनों की तरह ये भी एक मुश्किल टॉस्क था। नदी में सीवरेज का पानी था, इसलिए वहां देख पाने में कुछ मुश्किल आई। साफ पानी के मुकाबले सीवरेज या किसी दूसरे सोर्स के जरिए आ रहे गंदे पानी में दृश्यता का स्तर काफी कम हो जाता है। उस स्थिति में उपकरण भी ज्यादा काम नहीं आते। इसके लिए एनडीआरएफ ने मैनुअल तरीका अपनाया। डीप गोताखोरों को लाइट से लैस कर पानी में उतारा गया। इसके बाद जैसे जैसे एनडीआरएफ की बाकी टीमें वहां पहुंचती गई, बचाव कार्य में तेजी आती चली गई। अंडर वाटर 'आरओबी' का इस्तेमाल किया गया।
विज्ञापन
एनडीआरएफ की पांच टीमें (125 जवान) वहां पहुंची थी। आखिरी टीम, जो सुबह पौने पांच बजे नदी पर पहुंची, ने तुरंत राहत कार्य शुरु कर दिया था। नदी में सीवरेज का पानी था, इसलिए थोड़ी बहुत भी दिक्कतें आई। अगर नदी का बहाव तेज होता तो राहत एवं बचाव ऑपरेशन में कुछ समय लग सकता था।
बतौर डीआईजी मोहसिन, सबसे अच्छी बात यह रही कि इस घटना में लोगों एवं दूसरे बलों के बीच गजब का तालमेल रहा। आसपास के लोगों ने बहुत मदद की। इसके अलावा स्थानीय पुलिस और निकटवर्ती सुरक्षा बलों ने भी समय रहते, बचाव कार्य शुरु कर दिया था। नदी में गिरे 170 लोगों को तो लोकल पुलिस और आसपास रहने वाले व्यक्तियों ने ही बाहर निकाल लिया था। दरअसल, इस तरह के ऑपरेशन में सामुदायिक जागरूकता बड़ी कारगर साबित होती है। अगर आसपास में ही पचास सौ लोगों को ठीक से तैरना आता है तो वे इस तरह के संकट में बड़े मददगार साबित हो सकते हैं। आम लोगों के अलावा कई सिविल संगठन भी घटना स्थल पर पहुंचे थे। उन्होंने भी लोगों की मदद की। यह देखने के लिए कि वहां कोई शव तो नहीं फंसा है, पुल का मलबा खंगाला जा रहा है।