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महाराष्ट्र चुनाव में मुद्दे हैं, पर विपक्ष के पास न स्वर है न धार, अनुच्छेद 370 बना भाजपा का हथियार

Thu, 17 Oct 2019 03:50 PM IST
Harendra Chaudhary विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, सतारा
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, सतारा Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 17 Oct 2019 03:50 PM IST
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In Maharashtra Assembly Elections 2019, opposition is silent and not raising the issues effectively
Amit shahm uddhav thakre, devendra fadanvis - फोटो : PTI

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में इस बार सिर्फ नेता बोल रहे हैं, मतदाता खामोश हैं। उनकी यह खामोशी क्या गुल खिलाएगी इसे लेकर हर दल के अपने-अपने दावे और प्रतिदावे हैं। दिलचस्प यह है कि भाजपा शिवसेना गठबंधन वाली देवेंद्र फडणवीस सरकार के पांच साल के राज में कभी दलितों का गुस्सा, तो कभी किसानों का असंतोष तो कभी अर्थव्यवस्था की लचर हालत भले ही मीडिया और राजनीतिक दलों के बीच मुद्दा रही हो।

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लेकिन अब जब मतदाताओं को अपना फैसला देना है, तब मतदाता तो खामोश हैं, लेकिन विपक्ष भी उन मुद्दों को पुरजोर तरीके से नहीं उठा पा रहा है या नहीं उठा रहा है, जिन्हें लेकर वह भाजपा शिवसेना सत्ताधारी गठबंधन को जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा कर सकता है।

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मजबूती से मुद्दे नहीं उठा पा रहे कांग्रेस-एनसीपी

पुणे में वरिष्ठ पत्रकार नंदिनी कहती हैं कि लोग चाहते हैं कि विपक्ष उन सारे मुद्दों को मजबूती से उठाए जिनसे भाजपा शिवसेना गठबंधन से सवाल किए जा सकें, लेकिन पता नहीं क्या मजबूरी है कि न राज्य स्तर पर और न ही स्थानीय स्तर पर कांग्रेस-एनसीपी के नेता पुरजोर तरीके से जनहित और जन असंतोष के मुद्दों को उठा ही नहीं रहे हैं। वहीं पांच साल से केंद्र और राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा शिवसेना के नेता न सिर्फ अपने मनमाफिक मुद्दे उठा रहे हैं बल्कि बेहद आक्रामक तरीके से विपक्षी कांग्रेस एनसीपी गठबंधन को इस तरह निशाने पर ले रहे हैं मानों वह सरकार में हों। जबकि राज्य के अधिकांश शहरों और इलाकों में विधायक और सांसद भाजपा और शिवसेना के ही ज्यादा हैं।

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खत्म हो गई शरद पवार की ठसक

पुणे में ही भाजपा के सांसद और सभी आठ विधायक हैं। लेकिन चुनाव जन समस्याओं पर नहीं अनुच्छेद 370 पर लड़ा जा रहा है। राज्य की आधुनिक राजधानी मुंबई से लेकर पेशवाओं की राजधानी पुणे हो या शिवाजी महाराज की एतिहासिक नगरी सतारा तक, रास्ते में कहीं भी रुक कर किसी से भी बात कीजिए चुनाव को लेकर एक अजीब किस्म का अनमनापन देखने को मिलता है। कोई इस मुद्दे पर ज्यादा बात नहीं करना चाहता पर ज्यादा कुरेदने पर लोग यही कहते हैं कि चुनाव हो कहां रहा है।


भाजपा-शिवसेना के सामने कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन के पास नेता ही कहां बचे हैं। एनसीपी की कमान संभाले अस्सी साल के शरद पवार भले ही मराठा दिग्गज रहे हों, लेकिन अब उनकी वो चमक और ठसक नहीं बची है जो दस साल पहले तक थी।

मोदी-शाह-फडनवीस का दौर

सतारा-पुणे हाईवे पर होटल चला रहे विजय यादव हंसते हुए कहते हैं कि हर नेता और पार्टी का वक्त और दौर होता है। कभी पवार साहब और कांग्रेस का वक्त था, तो आज मोदी- शाह-फडनवीस का वक्त और दौर है। सतारा के रहने वाले लक्ष्मण जाधव और उनके साथ खड़े लोग कहते हैं कि जब से महाराज सतारा उदयन राजे भोसले ने भाजपा का दामन थामा है तब से यहां भाजपा के मुकाबले कोई नहीं है। लेकिन वाही से सतारा के रास्ते में मिले ज्योतिषी नाना राव जोशी की राय कुछ अलग है।

वह कहते हैं कि जितना शोर है चुनाव उतना एकतरफा भी नहीं है। 2014 में भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग लड़कर जितनी सीटें जीती थीं, इस बार शायद उतनी न आ पाएं। लेकिन यह कहने पर अब दोनों की ताकत मिल गई है, तो ज्यादा सीटे क्यों नहीं आएंगी, इस पर जोशी कहते हैं कि कांग्रेस-राष्ट्रवादी भी तो साथ मिल गए हैं।

विलासराव देशमुख की मौत से कांग्रेस को नुकसान

लेकिन नाना राव जोशी जैसे लोग इक्का दुक्का ही मिलते हैं, जो भाजपा-शिवसेना की ताकत को कम करके आंकते हों, ज्यादातर लोग यही कहते हैं कि भाजपा-शिवसेना बड़ी जीत की तरफ बढ़ रहे हैं, क्योंकि राष्ट्रवादी का नेतृत्व बूढ़ा हो चुका है। अजित पवार के खिलाफ तमाम आरोप लगने के बाद वह बैकफुट पर चले गए हैं और शरद पवार अब थक चुके हैं। जबकि कांग्रेस के पास राज्य स्तर पर कोई एसा चेहरा ही नहीं बचा है, जिस पर राज्य की जनता भरोसा करके इस गठबंधन को वोट दे सके। इसकी पुष्टि करते हुए विजय यादव जो कभी कांग्रेस में बेहद सक्रिय थे, कहते हैं कि विलासराव देशमुख की मौत ने कांग्रेस को महाराष्ट्र में नेता विहीन कर दिया।

कांग्रेस के पास राज्यस्तरीय नेता नहीं

वहीं सुशील कुमार शिंदे बुजुर्ग हो गए। रंजीत देशमुख जैसे नेता पता ही नहीं कहां हैं। कभी पुणे के एकछत्र नेता रहे सुरेश कलमाणी को कॉमनवेल्थ घोटाला खा गया। 2014 में जिन विखे पाटिल को नेता विपक्ष बनाया गया था, वो पुत्र समेत भाजपा में चले गए। यही हाल शिवसेना से कांग्रेस में आए नारायण राणे का हुआ। अशोक चह्वाण शून्य को भर सकते थे, लेकिन मुंबई से लेकर दिल्ली तक की गुटबाजी और राजनीति ने उन्हें निपटा दिया। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण भले ही साफ सुथरी छवि वाले हैं, लेकिन राज्य में कभी भी उनका जनाधार नही रहा।



मुंबई कांग्रेस के नेता जाकिर भाई कहते हैं कि अगर पृथ्वीराज चह्वाण को नेता विपक्ष बनाया गया होता, तो शायद आज पार्टी के पास एक राज्य स्तरीय नेता होता। रही सही कसर कृपाशंकर सिंह के कांग्रेस छोड़ने, संजय निरुपम और मिलिंद देवड़ा जैसों की बयानबाजी ने पूरी कर दी। जबकि भाजपा शिवसेना के पास नरेंद्र मोदी, अमित शाह, देवेंद्र फडनवीस, उद्धव ठाकरे समेत अनेक नेता हैं, जो पूरे राज्य में घूम-घूम कर विपक्ष को रोज चुनौती दे रहे हैं।

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