पर्यावरण अपराध के 42 हजार मामलों में 70 फीसदी तंबाकू सेवन व धूम्रपान से जुड़े
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स्वास्थ्य के प्रति वैधानिक चेतावनी के बावजूद पर्यावरणीय अपराधों के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों की मानें तो 2016-17 के दौरान पर्यावरण से जुडे़ अपराधों में आठ गुना बढ़ोतरी हुई है।
हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण से जुडे़ अपराधों के करीब 70 फीसदी मामले सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पादों से संबंधित हैं। सिगरेट और दूसरे तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 के तहत सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करना अपराध है।
हाल ही में जारी एनसीआरबी के आंकड़ों के अध्ययन के मुताबिक, 2016 में पुलिस ने 4,732 पर्यावरणीय अपराध के मामले दर्ज किए गए, जो 2017 में बढ़कर 42,143 तक जा पहुंचा। इसमें से 29,659 मामले तंबाकू कानून के तहत दर्ज किए गए। वहीं, तुलनात्मक तौर पर देखें तो पुलिस ने वायु एवं जल प्रदूषण के सिर्फ 36 मामले ही दर्ज किए थे। वह भी तब, जब दुनिया के सबसे प्रदूषित 20 शहरों में से 14 अकेले भारत में ही हैं।
शोर भी एक बड़ी वजह
पुलिस ने पर्यावरणीय अपराधों के तहत दर्ज किए जाने वाले कुल मामलों के करीब 20 फीसदी (8,400) एक नई श्रेणी के तहत दर्ज किए थे। यह नहीं श्रेणी ध्वनि प्रदूषण की है। माना जाता है कि शोर के चलते जंगलों को बेतहाशा नुकसान पहुंचता है।
तमिलनाडु में पर्यावरणीय अपराध सबसे ज्यादा
तमिलनाडु में पर्यावरणीय अपराध सबसे ज्यादा दर्ज किए गए हैं। कुल 29,659 मामलों में से करीब 70 फीसदी यानी 20,640 मामले तमिलनाडु में दर्ज किए गए। वहीं, 23 फीसदी के साथ इस मामले में केरल दूसरे स्थान (6,743) पर है। पुलिस ने 3,842 मामले भारतीय वन कानून, पर्यावरण संरक्षण कानून और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज किए।
पर्यावरण संबंधित अपराध: 2016-2017
सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003- आंकड़े उपलब्ध नहीं - 29,659
ध्वनि प्रदूषण अधिनियम: आंकड़े उपलब्ध नहीं - आंकड़े उपलब्ध नहीं - 8,423
वन कानूनों: 3,715-3,016
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-859-826
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-122-171
वायु और जल प्रदूषण अधिनियम-36-36
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम- आंकडे़ उपलब्ध नहीं-12
पर्यावरण और प्रदूषण से संबंधित कानून-4,732-42,143